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बुधवार, 2 मई 2018

अंधेर नगरी चौपट राजा


प्राचीन समय की बात है कोशी नदी के तट पर एक संत अपने शिष्य के साथ रहते थे।  दोनों का  अधिकांश समय भगवान के भजन कीर्तन में ही व्यतीत होता था। 

एक बार दोनों देश भ्रमण पर चल पड़े। घूमते घूमते वो एक अनजान देश पहुँच गए। वहाँ जाकर एक बगीचे में दोने ने अपना डेरा जमा लिया। गुरु जी ने शिष्य गंगाधर को एक टका देकर कहा बेटा बाजार जाकर कुछ सब्जी भाजी लावो।  

शिष्य गंगाधर जब बाजार पहुंचा तो उसे ये बाजार देख कर हैरानी हुई।  उस बाजार में सभी बस्तुए टके सेर के भाव बिक रही थी। क्या साग क्या पनीर क्या मिष्ठान सब एक टके में एक सेर के भाव से बिक रहे थे।

शिष्य ने सोचा सब्जियाँ तो रोज ही खाते हैं आज मिठाई ही खा लेते हैं। सो उसने टेक सेर के भाव से मिष्ठान ही खरीद लिए। मिठाई लेकर ख़ुशी ख़ुशी ओ अपने कुटिया पर पहुंचा। उसने गुरु जी को बाजार का सारा हाल सुनाया।  गुरु जी ध्यानमग्न होकर कुछ सोच कर बोले ! वत्स जितना जल्दी हो सके हमें ये नगर और देश त्याग देना चाहिए। शिष्य गंगाधर ये अंधेर नगरी है और यहाँ का राजा महा चौपट है।  यहाँ रहने से कभी भी हमारे जान को खतरा हो सकता है और हमें न्याय भी नहीं मिलेगा.

परन्तु शिष्य को गुरु जी का यह सुझाव बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। क्योंकि उसे यहाँ सभी महंगे महंगे खाद्य पदार्थ मिष्ठान आदि सभी सस्ते में मिल रहे थे। वह यहाँ कुछ दिन और रहना चाहता था।
गुरु जी को शिष्य के व्यवहार पर हंसी आ गयी। गुरूजी ने कहा ठीक है बेटा तुम यहाँ कुछ दिन और ठहरो और मिष्ठान आदि खा लो। और कोई संकट आये तो मुझे याद करना।  यह कह कर गुरु जी ने वह स्थान त्याग दिया।

गंगाधर रोज प्रातः भिक्षाटन को निकलता और भीख में जो एक दो रुपये मिलते उनसे अच्छी स्वादिष्ट मिठाईयाँ खरीद कर खाता। इस प्रकार कई मास गुजर गए। स्वादिष्ट मिठाई आदि खा पीकर वह काफी मोटा तगड़ा हो गया।
एक दिन गरीब विधवा कलावती की बकरी पंडित दीनदयाल की खेत की फसल चर रही थी। दीनदयाल ने बकरी को डंडे से मारा बकरी मर गयी।  कलावती ने राजा के सामने गुहार लगायी।  राजा ने फैसला सुनाया जान के बदले जान दीनदयाल को फांसी पर चढ़ा दो।
जल्लाद दीनदायल को फाँसी की फंदे पर चढ़ाने लगा।  दीनदयाल काफी दुबला पतला था सो उसके गले में फांसी का फंदा नहीं आ रहा था।  जल्लाद ने राजा से अपनी परेशानी जताई।  राजा ने कहा जिसके गले में ये फंदा ठीक बैठता हो उस मोटे व्यक्ति की तलाश करो। 
जल्लाद कोतवाल को लेकर ऐसे व्यकित की तलाश में निकल पड़ा। खोजते खोजते कोतवाल गंगाधर की कुटिया पर पहुंचा। संयोग बस फाँसी का फंदा गंगाधर के गले में फिट आ गया। अब कोतवाल राजा के दरबार में उसे पकड़ लाया।

फाँसी देने से पहले राजा ने गंगाधर से उसकी अंतिम इच्छा पूछा।  गंगाधर ने अपने गुरु से मिलने की इच्छा जताई। गंगाधर के गुरु को बुलाया गया।  गुरु अपने पोथी के साथ अपने शिष्य के पास आये। गुरु ने पोथी से कुछ देख कर बतया।  आज तो बहुत शुभ मुहूर्त है।  आज के दिन जो मरेगा वो स्वर्ग का राजा होगा स्वर्ग का सुख भोगेगा। 
मेरे प्यारे शिष्य गंगाधर अब तक मैंने तुमसे कुछ भी गुरु दक्षिणा में नहीं लिया।  आज मैं तुमसे ये गुरु दक्षिणा चाहता हूँ। तू मुझे स्वर्ग का राजा बनने का अवसर दो और फाँसी पर मुझे चढ़ने दो।  गुरु से ऐसा सुनकर शिष्य ने कहा गुरूजी दक्षिणा में आप कुछ और ले लीजिये लेकिन मैं स्वर्ग के सुख से बंचित नहीं होना चाहता। 


गुरु और शिष्य के बीच बहस को सुनकर राजा ने दोनों को अपने निकट बुलाया और बहस का कारण पूछा ?
गुरु के मुख से जब राजा ने सुना की आज मरने वाले को स्वर्ग का राज मिलेगा तो वह चौक गया। राजा सोचने लगा जल्लाद मेरे फांसी का फंदा मेरा और स्वर्ग में जाने की चाह गुरु चेले की। 

अरे वाह!  स्वर्ग का राज तो मुझे ही चाहिए !


ऐसा बोलकर वह खुद फांसी के फंदे पर चढ़ गया।  अब अंधेर नगरी का चौपट राजा सदा के लिए समाप्त हो गया था। 

गुरु जी ने शिष्य से कहा वत्स गंगाधर अब इस अंधेर नगरी के चौपट राजा नहीं रहे। अब यहाँ टेक सेर में भाजी और टेक सेर में खाजा मिठाई नहीं मिलेगी। हर किसी व्यक्ति वास्तु का उचित मूल्याङ्कन होगा।  इस राज के राज्य भार तुम संभाल लो और मैं  मंत्री के रूप में तुम्हे उचित मार्गदर्शन किया करूँगा. 


शनिवार, 31 मार्च 2018

तोता मालकिन और नौकर की कहानी - Parrot Landlord and Labour

एक औरत तोता पाल रखी थी. उसका तोता बहुत समझदार था. अपने मालकिन की आवाज सुन सुन कर उसे याद कर उसकी की नक़ल कर दोहराता था. मालकिन के रोज व्यवहार में आने वाले शब्दों को सुन सुन कर वो याद कर लिया था.
उस औरत के फार्म हाउस में काम करने वाले मजदूर काम ख़त्म हो जाने पर कृषि उपकरण आदि रखने उसके फार्म हाउस पर आते और दरवाजे खटखटाते।
दरवाजा खटखटाने की आवाज सुन कर फार्म हाउस की मालकिन घर के अंदर से ही "यह कौन है ", "यह कौन है"  की आवाज लगाती। इस आवाज को सुनकर उसका पालतू तोता अभ्यास करने का प्रयास करता।

एक दिन घर की मालकिन घर पर नहीं थी।  दोपहर में खेत पर काम समाप्त कर मजदूर मालकिन के फार्म हाउस पर फार्मिंग टूल्स रखने पहुंचा। उसने दरवाजा खटखटाया।

दरवाजे के पास टंगे पिंजड़े से तोते ने आवाज लगायी "यह कौन हैं ".



तोते ने रट लिया था दरवाजा खटखटाने की आहट पर "यह कौन है" कहना है।

मजदूर ने "यह मजदूर है" कहते हुए फिर से दरवाजा खटखटाया :

तोता फिर से  पूछा " यह कौन है "      

मजदूर ने "यह मजदूर है" कहते हुए फिर से दरवाजा खटखटाया :

रटा तोता फिर से  पूछा " यह कौन है "

तोता के  बार बार ऐसा पूछने से मजदूर  थक गया, और हार कर दरवाजे पर बैठ गया। अपने मालकिन का काफी देर इन्तजार करते करते उसकी नींद आ गयी और ओ वहीँ लेट गया। 

मालकिन जब घर लौटी तो अपने दरवाजे पर मजदूर को सोते हुए देखा।  उसे देखकर मालकिन बोली " यह कौन है ?


तोता मजदूर के मुख से बार बार "यह मजदूर है " सुनकर याद कर लिया था . 
मालकिन के मुख से "यह कौन है " सुनकर तोता बोल पड़ा "यह मजदूर है ".
मालकिन ने मजदूर को जगाया और तोते की प्रश्नोत्तरी सुनकर हँस पड़ी । 


शनिवार, 17 फ़रवरी 2018

जानिये देश के विभाजन के लिए कौन लोग जिम्मेवार थे !


यह सवाल गढे मुर्दे उखाड़ने लिये नहीं, बल्कि फिर ऐसी साज़िशे कामयाब ना हों इसलिये उठाना जरूरी समझता हूँ आखिर देश के बंटवारे के लिये कौन कौन दोषी थे और कौन नहीं, इस विषय में चर्चा करने के लिये जाहिर हैं बड़े बड़े नाम लेने पडेंगे, जो लोग इस दुनियाँ से जा चुके हैं फिर भी इतिहास से सबक लेना ही पड़ता है, इसलिये इतिहास का पुनरीक्षण करते हैं और नज़र डालते हैं उन नामचीन लोगों पर जिनका नाम आज़ादी की लड़ाई से जुड़ा हुआ था.यह सच है कि आम जनता विभाजन के पक्ष में नहीं थी और अधिकतर लोगों को ऐसा अंदाज़ा भी नहीं था कि देश के अहित में यह फैसला उनके नेता ले लेंगे. क्योंकि विभाजन से अगर किसी को फायदा हुआ तो वो थे अमरीका और रूस. एक और बात काबिले गौर है कि आज़ादी के समय पूरे संसार में ब्रिटिश राज्य का पतन होने लगा था और ब्रिटेन अमरीका का पिछलग्गू बनने की कगार पे आ चुका था. ऐसे में अमरीका का दबाव होना बहुत स्वभाविक था और अमरीका की मौकापरस्ती दुनियाँ को जाहिर हैं.

ब्रिटिश राज : यह तो जग जाहिर है कि अंग्रेज़ों की यह चाल थी और इसी लिये उन्होंने आज़ादी के लिये बंटवारे की शर्त रखी. लेकिन हमारे नुमाइंदे जो अंग्रेजो को बिक चुके थे इस बात को स्वीकार क्यों करने लगे. आज़ादी के लिये कुछ लोगों ने दलालों का काम किया, दलाल बेचने और खरीदने वाले दोनों से कमीशन खाता है, इन दलालों ने अंग्रेज़ों की हाँ में हाँ मिलकर सत्ता सुख भी लिया और आज़ादी का श्रेय लेकर आज़ाद भारत में अपनी सरकार में सीट भी पक्की की. इन लोगों के नाम पोस्ट की अगली कड़ी में आने ही वाला है. यह तो सच है बंटवारे की चाल ब्रिटिश राज की थी लेकिन यह चाल कभी कामयाब नहीं होती अगर घर के भेदी समझौते पर हस्ताक्षर ना करते, आज़ादी मिलना तो तय ही था, जल्दबाजी में यह फैसला लेने के कारण आज दक्षिण एशिया में जो अशान्ति, आतंकवाद का वातावरण है, उससे बचा जा सकता था और जो पैसा भारत और पाकिस्तान रक्षा बज़ट में खर्च करके अमरीका और रूस को मालामाल करते रहे उससे इस देश की खुशहाली में चार चांद लगते.
 कांग्रेस : जैसा कि सब जानते हैं, कांग्रेस का जन्म अंग्रेज़ों के साथ सत्ता में भागीदारी के लिये एक ब्रिटिश ने ही किया था. कांग्रेस ने अंग्रेज़ों के साथ सत्ता सुख भी भोगा, उस समय के अभिजात्य और महत्वपूर्ण लोगों के नाम पर, जिनका जनता पर प्रभाव था अंग्रेज़ों के राज्य में कांग्रेस के नुमाईंदों को वो सारे सुख साधन उपलब्ध थे जो अंग्रेज़ अफ़सरों को थे, उन सबका रहन सहन भी अंग्रेज़ों जैसा ही था और कांग्रेस ने ही बंटवारे के मसौदे पर हस्ताक्षर किये गये. इसका मुख्य विवरण इस प्रकार है इससे साफ जाहिर होता है कि मसौदे पर दस्तखत करने में प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस ( नेहरू) और मुस्लिम लीग ( जिन्ना ) थे.



रविवार, 28 जनवरी 2018

गर्व का पतन संभव है

PRIDE HAS A FALL

शरद ऋतु का समय था. एक जैतून का पेड़ और अंजीर का पेड़ एक दूसरे के पास खड़े थे. शर्दी में अंजीर के पेड़ ने अपने सभी पत्ते खो दिए और काफी नग्न हो गया. अपने पड़ोसी को ऐसी हालत देखते हुए, जैतून का वृक्ष गर्व के साथ फुसफुसाया.

जैतून के पेड़ ने अंजीर के पेड़ को ताना मरते हुए कहा, "यार तुम कैसे बदकिस्मत हो! आप अपने पत्ते हर शरद ऋतु में खोकर नंगे हो जाते हो। लेकिन मैं पूरे वर्ष के दौर में सदाबहार रहता हूं। '

अंजीर के पेड़ ने तर्क दिया, "दोस्त! मेरा सर्दियों में  नंगा (बिना पत्ते के हो जाना) और तुम्हारा  बर्ष पर्यंत सदाबहार रहना हमारे और तुम्हारे अधिकार क्षेत्र से बहार की बात है. आप और मैं इसके लिए कुछ नहीं कर सकते . लेकिन इसके बारे में छोटे या गर्व महसूस करना ये हमारे दोनों के बस में है. हम अपनी हीनता और दुर्बलता के लिए हीनभावना से ग्रसित नहीं होना चाहिए न ही किसी की दुर्बलता पर हमें हसना चाहिए .

एकबार शरद ऋतू में  कड़ाके की शर्दी पड़ी और उस साल भरी बर्फबारी हुई. एक दिन काफी बर्फ गिरा  जैतून के पेड़ों की पत्तियों गिरी बर्फ के भर से जैतून का पेड़ भारी होकर गिरने लगा. लेकिन अंजीर के पेड़ के लिए, बर्फ इसकी नंगे शाखाओं के माध्यम से जमीन पर गिर गई और यह बर्फ-तूफान से बच गया

बुधवार, 17 जनवरी 2018

धन जिसका कोई मोल नहीं

एक कंगाल ने अपने बगीचे में एक गुप्त जगह में अपना सोना दफनाया था। हर दिन वह वहां जाता, खजाना खोलता और टुकड़े टुकड़े गिन करके यह सुनिश्चित करने की चेष्टा करता की सभी धन सुरक्षित हैं . ऐसा उसने इतनी बार किया कि एक चोर, जो उसे बार बार ऐसा करते देख रहा था, अनुमान लगाया कि यहाँ जरुर कुछ खजाना छिपा है,  अतः एक रात चुपचाप खजाना खोला और इसे लेकर फरार हो गया ।

जब उस कंजूस ने अपने नुकसान के बारे में सुना, तो वह बहुत दुःखी हुआ और निराशा से भर गया रोने लगा. वह रोते हुए अपने बाल पकड़ कर खीच रहा था । एक यात्री ने उसे रोने कर कारण पूछा ।

"मेरा सोना! हे मेरे सोने! "कंजूस आदमी बुरी तरह से रोया," किसी ने मुझे लूटा है! "

"आपका सोना कहा रखा था ? उस गड्ढे में? तुमने वहाँ क्यों रखा? आप इसे घर में क्यों नहीं रखते , जहां आप चीजें खरीदने के लिए आसानी से इन्हें पा सकते थे? "

"खरीदें!" वह कंजूस गुस्से में चिल्लाया "क्यों, मैंने सोना कभी छुआ भी नहीं मैं इसे किसी भी खर्च के बारे में नहीं सोच सकता था। "

अजनबी ने एक बड़ा पत्थर उठाया और उसे गड्ढे में फेंक दिया। "अगर आपके साथ ऐसा हुआ है," उन्होंने कहा, "तो उस पत्थर को ढंकना। आप जितना खजाना खो चुके हैं यह उतना ही लायक है! "

नैतिक: सहेजना, बुद्धिमानी से और उचित तरीके से खर्च करना अच्छा संकेत है यदि आप इसे किसी अच्छे उद्देश्य के लिए करते हैं। अन्यथा, हमारे द्वारा उपयोग किए जाने वाले उपयोग के मुकाबले किसी अधिकार का अधिकार नहीं है।


शनिवार, 9 सितंबर 2017

सेठ और बन्दर की कहानी

एक सेठ जी थे. वे शौक से बन्दर पाल रखे था. बन्दर बहुत समझदार था. वह सेठ की नक़ल किया करता था. सेठ को गिलास से पानी पीते देख वह भी गिलास से पानी पीने लगा था. सेठ जी को पंखा झलता हुआ देख कर वह मर्कट भी पंखा झलना सीख गया था. वह कभी खुद को और कभी सेठ जी को पंखा झलता . अपने बन्दर के इस व्यवहार से सेठ जी अत्यंत खुश थे.
एक दिन सेठ जी के सो जाने के बाद वह बन्दर सेठ जी को पंखा झल रहा था. तभी एक मक्खी सेठ जी के नाक पर आकर बैठी और बन्दर उस मक्खी को बार बार भगाने लगा . जैसा कुत्ता कौआ और मक्खी का स्वभाव है वो बार बार भगाने के बाद भी पुनः वही आकर बैठते हैं, मक्खी भी बार बार नाक पर आकर बैठ रही थी. बन्दर मक्खी के इस व्यवहार से बहुत क्षुब्द होकर मक्खी पर बहुत क्रोधित हो गया. वह मक्खी को जान से मार देने के लिए कोई युक्ति सोचने लगा.

वह ऐसे किसी चीज़ की तलाश करने लगा जिससे प्रहार कर वह चंचला मक्खी की जीवन लीला समाप्त कर सके . खोजते खोजेते बन्दर को एक पत्थर मिला. वह बहुत खुश हुआ. उस समय मक्खी सेठ जे के नाक पर विराजमान थी. मर्कट शीघ्रता से पत्थर उठा कर मक्खी पर दे मारा. मक्खी तो उड़ गयी लेकिन सेठ जी के नाक के आकार विकृत हो गए.     



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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

शिक्षा का महत्व - Importance of education

एक अनपढ़ युवक  शाइन बोर्ड बनाने वाले कंपनी में काम करता था . बोर्ड बनाने वाले कंपनी में लोगों के अपने प्रोफाइल और बिज़नस के बोर्ड के रिक्वायरमेंट्स आते थे. बोर्ड बन जाने के बाद वह युवक लोगों तक उनका बोर्ड पहुँचाया करता था और उनकी पत्ते पर बोर्ड लगाया करता था. यही उसकी नौकरी थी .
उस कंपनी में 3 आर्डर पेंडिंग थे जिनके काम चल रहा था
१ बोर्ड एक डॉक्टर का था जिसपर स्लोगन था ”पेट दर्द से निराश न हो”
२) बोर्ड एक होटल चलने वाले का था जिसका स्लोगन था “कृपया पुनः सेवा का मौका दें.”
३) बोर्ड एक श्मशान घाट का था जिसका स्लोगन था “मृतक के परिजन भीड़ न लगाएं “

बोर्ड बन जाने के बाद उस युवक को सभी बोर्ड इन पतों पर पहुंचाने थे . कंपनी द्वारा बताये गए पते पर बोर्ड लगाने के लिए वह सभी बोर्ड्स को अपनी युक्ति से रखकर रिक्शे पर बैठ गया . वह युवक अनपढ़ था अतः उसने अपने बुद्धि से ३ बोर्ड्स क्रमवार रख लिए .

लेकिन गलती से उसके बोर्ड बदल गए और तीनो पाटों पर इस क्रम से बोर्ड लगा दिया
१)       श्मशान घाट -> “कृपया पुनः सेवा का मौका दें.”
२)       डॉक्टर ->”मृतक के परिजन भीड़ न लगाएं”
३)       ढाबा ->”पेट दर्द से निराश न हो”

अपनी अशिक्षा के कारण उस युवक ने बहुत बड़ी गलती की . इसका complain कंपनियों की तरफ से आया और उसे नौकरी से निकल दिया गया.

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