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सोमवार, 30 मई 2016

सियार क्यों करते हैं हुआ हुआ ?



कुत्तों और सियारों की दुश्मनी बहुत पुरानी है। सियारों का रात्री आलाप और गावं  नगर में प्रवेश करना कुत्तों को कतई रास नहीं।
सियारों के प्रलाप के पीछे एक बहुत बड़ी व्यथा छुपी है।  पहले सियार गावं  में रहते थे और कुत्त्ते  खेतों में।  सियारोंका जीवन बहुत सुखमय था वो ग्रामीणों के पालतू पशुओं के रूप में बढ़िया भोजन और आवास पाते थे। कुत्ते  खेतों में भटक भटक बहुत दुखी थे, उन्होंने सियारों के साथ एक मीटिंग की और संधि का एक प्रस्ताव रखा। इस संधि के अनुसार एक साल कुत्ते गावं  में रहेंगे और एक साल सियार गावं  में रहेंगे। दयालु सियारों ने ये प्रस्ताव मान लिया और वो साल के अंत में गावं  छोड़ कर खेतों में चले गए। कुत्ते सुखपूर्वक गावों में रहने लगे।

उधर सियार गावों को छोड़कर बहुत दुखी थे और एक वर्ष के वनवास की कष्टदायी जिंदगी इस उम्मीद में गुजार रहे थे की अगले साल उन्हें फिर से ग्राम्य जीवन का सुख मिलने वाला था। इधर कुत्तों का प्रधान गांवों  के सुख से इतना आसक्त हो गया कि वो गावं  छोड़ने का विचार सपने में भी जाता, तो चौंक पड़ता था। उसने सारे कुत्तों के साथ एक सम्मलेन आयोजित किया, और सभी कुत्तों को ये निर्देश दिया कि, अपने सैन्य बल बढावो हम गांवों  का सुख और गांव नहीं छोड़ेंगे। जरुरत पड़ी तो उन मजबूत सियारों से युद्ध करेंगे।
 
साल का अंत हुआ सियारों ने एक दूत के माध्यम से अपना सन्देश कुत्ते के सरदार के पास भेजवा दिया। कुत्ते के सरदार ने दूत से कहला भेज कि, गिनती से तो एक साल हो गए है लेकिन अभी हमारे सुख के एक साल नहीं हुए है। जिस दिन हमारे सुख के एक साल हो जायेंगे हम गांव छोड़ देंगे। अगर तुमलोग ज्यादा जिद करोगे तो हम कुत्ते तुमलोगों के साथ युद्ध करने को तैयार हैं। कुत्तों की युद्ध की धमकी से सियार डर गए। अब सियारों ने आपस में मत्रणा की,  गावं में रहने से कुत्ते बहुत मजबूत हो गए है। इनकी संख्या भी बढ़ गयी है, अतः हमलोग इनसे युद्ध में नहीं जीत सकते हम में से एक सियार जायेगा और सिर्फ इतना पूछ कर आएगा "हुआ"? एक एक कर सियार गावं  में आते और "हुआ, हुआ, हुआ" करते कुत्ते भो भो कर उन्हें भगा देते। तब से अब तक सियारों ने इतना हुआ, हुआ किया  कि  हुआ हुआ सियारों की जुबान बन गयी.         

मंगलवार, 24 मई 2016

देवदार वृक्ष की व्यथा - The Egony of Fir Tree

देवदार वृक्ष की व्यथा

एक जंगल में देवदार का एक वृक्ष था। उसके नुकीले कोणधारी पते उसे हीन भवन से ग्रसित किये रहते थे। उसको ये पत्ते कभी रास नहीं आते थे।
देवदार वृक्ष की व्यथा


इससे परेशान होकर उसने जंगल की देवी की प्रार्थना की जंगल की देवी ने उसकी प्रार्थना सुन ली और उससे वर मांगने को कहा।  नुकीले पत्तों से परेशान वृक्ष ने स्वर्ण से सुन्दर पत्ते की कामना की।  वन देवी ने एवमस्तु कहा और देखते देखते वृक्ष के सारे पत्ते विल्कुल सोने की तरह सुनहरे रंग  के हो  गए। देवदार तरु अब बहुत खुस था लेकिन, उसकी खुसी ज्यादा दिन नहीं रही।  एक दिन जंगल से एक डाँकू गुजर रहा था उसने जब देखा की इस बृक्ष के सारे पत्ते सोने के है , लालचवश वह पेड़ पर चढ़ कर सारे पत्ते तोड़ने लगा। देखते देखते दारु वृक्ष पत्रविहिन हो गया।
उसने फिर जंगल की देवी की स्तुति की, देवी प्रकट होकर वर मांगने को कही इस बार वो अपने लिए शीशे की तरह चमकते हुए पत्तों की कामना की।  वन देवी ने उसके सारे पत्ते कांच के हो जाने के वरदान दिए। अब देवदार वृक्ष फिर से प्रसन्न था उसके सारे पत्ते हिरे के तरह चमक रहे थे और उसके आस पास अत्यधिक प्रकाश रहता था।
एक बार जोर से आंधी आई और उसके सारे पत्ते तेज आंधी में हिल डुल कर चकनाचूर हो गए। वृक्ष ने फिर से प्रलाप करना सुरु किया और रुदन करते हुए वन देवी को याद किया। वन देवी ने इस बार सुन्दर कोमल पत्ते का वरदान दिया।  वरदान पाकर वृक्ष के सारे पत्ते हरे भरे हो गए और जंगल के जानवरों को लुभाने लगे। देखते देखते जंगल की भेड़ बकरिया पेड़ पर टूट पड़ी और वो फिर से पर विहिन हो गया।
इस बार वह बहुत दुःखी और लाचार था।  उसने वन देवी से फिर प्रार्थना कि, और अपने पुराने कटीले कोणधारी पत्तों की याचना स्वरुप वरदान माँगा। वन देवी ने उसे फिर से एवमस्तु कहा  और वृक्ष पर सुन्दर पत्ते लहलहाने लगे। इसबार वो समझे ज्यादा खुस था। उसे अपनी गलती का अहसास हो चूका था।
कहानी का सारांश ->
हमें जो भी चीज़ मिला है उसी में खुश रहना चाहिए, शायद विधाता ने इसे हमारी जरुरत समझी होगी।  

शुक्रवार, 20 मई 2016

दूसरों की मदद करना आपको भी सुख पहुंचता है

शंकर नाम का एक लड़का था। वह बहुत ही गरीब था।  एक दिन लकड़ी का बोझ लिए ओ जंगल से गुजर रहा था। उसने एक गरीब ब्यक्ति को देखा जो बहुत भूखा था। शंकर की इच्छा हुई को वो उस गरीब ब्यक्ति को कुछ खाने को दे लेकिन उसके पास खुद के भोजन के लिए कुछः नहीं था। निराश होकर अपने  रास्ते चलता गया। रास्ते में उसने एक भेड़  देखा जो  बहुत प्यासा था।  वह भेड़  को कुछ पानी देना चाहा। लेकिन वह खुद प्यासा था उसके पास पानी नहीं था पीने  को।  उसे भेड़  को मदद न कर सक्ने का दुःख हुआ।  इस बार फिर निराश हो वो अपने रास्ते चलता बना। कुछ दूर जाने पर उसे एक आदमी कैंप लगते हुए दिखा लैकिन उसके पास लकड़ियां नहीं थी , शंकर ने उसे कुछ  लकड़ियां देकर मदद की बदले में उस आदमी ने उसे खाना  पानी दिया।  अब वह वापस लौट पड़ा भेड़  और भूखे आदमीं को मदद करने। उन दोनों को 

मंगलवार, 10 मई 2016

विधवा विवाह सही या गलत

विधवा विवाह सही या गलत 

स्त्री पुरुष के बराबर नहीं बल्कि , वो पुरुष से कई गुना श्रेष्ठ है. ये उसकी श्रेष्ठातa ही है कि विधुर पुरुष की देखा देखि विधवा स्त्री विवाह नहीं करती दुबारा. 
पुरुष को भी चाहिए की वो स्त्रियों से अपने जीवन साथी के प्रति समर्पण सीखे . और vidhur हो जाने प
र दूसरी शादी न करें। 
स्त्री को सात फेरे के सात जन्म का साथ का दिया हुआ बचन याद रहता है। वो अगले जन्म में भी उसी की कामना रखती है। इसीलिए नहीं करती विधवा विवाह। जो स्त्री फेरे ले के शादी करी है और उसको फेरे का मतलब पता है और उस समय दिया हुआ वचन याद है वो कभी नहीं करेगी शादी।
अगर रोकना ही है तो विधुरों को शादी से रोको वो क्यों सात जनम के बचन को छोड़ कर कर लेटें हों शादी 
ऐसे समर्पित प्यार को मेरा शत शत नमन जो अगले जन्म तक अपने प्यार को पाने का इंतिजार करे .

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