गुरुवार, 30 जून 2016

बृद्ध ब्याघ्र की कथा

बृद्ध ब्याघ्र की कथा - Old Tiger's Tale

एक जंगल में एक बुढा बाघ रहता था।  बृद्धा अवस्था के कारण उसके नख और दांत कमजोर पड़ गए थे, अतः वो शिकार नहीं कर पता था।  एक दिन उसे किसी तालाब के किनारे स्वर्ण कंगन ("सोने का कंगन") मिला। वह तालाब दलदल वाला तालाब था उसमे जंगली जानवर सावधानी से किनारे पर जाकर अपनी प्यास बुझ लेते  थे तालाब के अंदर दलदल के कारण कोई पैर नहीं रखता था।

शिकार कर अपनी उदर पूर्ति करने में असमर्थ बृद्ध ब्याघ्र ने सोचा की क्यों न मैं इस कंगन के लालच में अपने शिकार को फसांउं इससे मुझे शिकार को मारने में आसानी हो जाएगी।

अब बाघ सरोवर के किनारे बैठ कर किसी पथिक को देख कर जोर जोर से मनुष्य की बोली में आवाज़ लगता। कंगन ले लो ! कंगन ले लो ! ये कंगन मैं दान कर रहा हूँ कंगन ले लो। 
बाघ रोज ऐसा ही प्रयास करता रहा लेकिन जंगल के रास्ते आने जाने वाले लोग उसकी बात को अनसुनी कर देते और सावधान होकर चले जाते।

एक दिन दानवीर बाघ की आवाज़ किसी लालची पथिक के कान में पड़ी, लालच के वशीभूत होकर वो कुछ पल के लिए मार्ग में रुक गया, फिर बाघ से दान कैसे सम्भव ऐसा सोच अपने को सम्भाल कर चलने लगा। बाघ ने उसे फिर रोका पथिक ने प्रत्युत्तर में "बाघ आदमी को खाता है ऐसा कहा" और जाने  लगा।
अब बाघ ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा की अनेक गौ और मनुष्यों के वध करने से मेरे पुत्र और दारा ("स्त्री") दोनों मर गए। मैं बहुत दुखी था तब मुझे किसी धार्मिक व्यक्ति ने कहा की आप  दान धर्म का आचरण करे। अतः उन्ही के कहने पर मैं दानस्वरूप ये कंगन तुम्हे दे रहा हूँ।
संदर्भ संस्कृतोक्ति ->
"अनेक गो मनुषाणाम भक्षणात मम पुत्रः मृताः दाराश्च। ततः केनचित धर्मिकेन अहमादिष्टः दान धर्मदिकम चरतु भवान"

बाघ ने फिर कहा मैं अपने सफाई में कुछ भी कहूंगा, मुझे दान कर धर्म पुण्य अर्जित करना है।  लेकिन तुमे विश्वास नहीं होगा।

बाघ मनुष्य को खाता है ये लोकोक्ति और इस लोकभ्रन्ति का निवारण करना दुष्कर कार्य है। 
संदर्भ संस्कृतोक्ति ->
" व्याघ्रः मानुषं खादति इति लोकोपवादह दुर्निवार:"
बाघ ने कई कहानियों के माध्यम से पथिक ("उस रही") को दान लेने के लिए विवश कर दिया।
जब राही दान लेने को उद्यत हुआ तो बाघ ने कहा कि,  सरोवर में स्नान कर पवित्र होकर आवो और ये कंगन ग्रहण करो ताकि मुझे पुण्य लाभ हो। 

पथिक बाघ के कहे अनुसार सरोवर में स्नान के लिए जल्दी में कूद पड़ा और घोर दलदल में फस गया। वो दलदल से बाहर आने का जितना प्रयास करता उतनी ही गहरी दलदल में और फसता जाता। उसने कातर नजर से बाघ की ओर देखा।

बाघ ने उसकी ओर देखते हुए ब्यंग से कहा गहरे दलदल में फस गए हो मैं अभी तुम्हे इस दलदल से निकलता हूँ। यह कहते हुए सावधानी से दलदल से बचते हुए बाघ पथिक के पास गया और उसे मार कर खा गया।
इस तरह एक लालची पथिक के कारण बाघ अपनी योजना में सफल हुआ।  
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सोमवार, 27 जून 2016

वृद्ध गिद्ध और चालाक बिल्ली

वृद्ध गिद्ध जरद्गव और चालाक बिल्ली  - Aged Vulture a Cunning Cat

गोदावरी नदी के तट पर एक विशाल सेमल का पेड़ था। उसपर प्रत्येक दिशाओं से पक्षी आकर रात्रि में विश्राम करते थे। पक्षी दीं में सुबह सुबह अपने चारे के खोज में निकल जाते थे और रात्रि में अपने बच्चों के लिए ("जो अपनी चारा अभी नहीं चुन सकते") KUCHH CHARA लेते आते थे।  उनका दिन बहुत अच्छे से कट रहा था।  विशाल सेमल का पेड़ आवास जो था उनका।

वृद्ध गिद्ध

 

उस पेड़ पर एक बूढ़ा गिद्ध  भी रहता था।  गिद्ध बूढ़ा हो जाने के कारण शिकार करने में असमर्थ था। पक्षी उसे अपने बूढ़े पितामह की तरह आदर करते थे। शाम को लौटते समय सभी यथासम्भव आहार उस बूढ़े गिद्ध के लिए ले आने का नित्य प्रयत्न करते थे।  पक्षी संख्या में बहुत ज्यादा थे अतः उनका थोड़ा थोड़ा प्रयत्न भी उस बूढ़े गिद्ध के बड़े उदर की पूर्ति के लिए पर्याप्त था। बदले में सम्माननीय गिद्ध महोदय पक्षियों के बच्चों की रक्षा कर दिया करते थे। पक्षी दिन भर अपने बच्चों और अंडो की सुरक्षा की परवाह से निश्चिंत होकर आहार चुनते थे और रात में सुख से आकर अपने बच्चों के साथ रहते थे।


पेड़ के नीचे एक मार्जार अर्थात विडाल =>(बिल्ला ) रहता था।  बिल्ला पेड़ पर पक्षियों के अंडो और बच्चों को आहार बनाने के लिए सदैव प्रयत्न करते रहता था। लेकिन गिद्ध की चौकस रखवाली के कारण उसके बार बार के प्रयास बिफल हो जा रहे थे। अब उसने एक चाल चली। उसने गिद्ध से मित्रता कर छल से पक्षियों के बच्चों और अंडो को मारने की योजना बनाया। एक दिन वह पेड़ के निचे से गिद्ध की तरफ मित्रता की आग्रह भरे  निगाह से देखा, और मित्रता का आग्रह किया। बिल्ले ने मित्रता स्वरुप  बैठक के लिए गिद्ध को अपने पास पेड़ के निचे अपने आवास में आमंत्रित किया।  निश्छल हृदय गिद्ध ने उसके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और बिल्ले के पास पहुंच गया। बिल्ले ने गिद्ध को बहुत से  अदृष्टपूर्वं स्वादिष्ट भोजन से स्वागत किया। उससे बहुत सी चिकनी चुपड़ी बाते की तथा मित्रता के महत्व को बताया। इसके सन्दर्भ में उसने गिद्ध के समक्ष कई उदहारण प्रस्तुत किये। गिद्ध पूरी तरह से विल्ले के प्रपंच की बात से प्रभावित हो चूका था।  बिल्ला चुकी पेड़ पर चढ़ सकता था अतः जाते जाते गिद्ध बिल्ले  के अपने पास आने का निमंत्रण दे गया।
बड़ी चालाकी से बिल्ला गिद्ध के पास दिन में पक्षियों की अनुपस्थिति में आना जाना शुरू किया। वह आते जाते बड़े चालाकी से पक्षियों के अंडो और बच्चों को खाने लगा। चुकी विडाल (बिल्ला)  अब गिद्ध का मित्र था इस लिए गिद्ध ने उसपर कभी संदेह नहीं किया।
जब पक्षियों के अंडे और बच्चों की संख्या घटने लगी तो उन्हें इस बात की चिंता हुई। उन्होंने वृक्ष पर और कोई शत्रु न देखकर गिद्ध पर ही संदेह किया। अंडे और बच्चों के वियोग में क्रोधित पक्षियों ने उस बूढ़े गिद्ध को चोंचों की प्रहार घायल कर दिया। चोंच की आघात से घायल बूढ़े गिद्ध की अन्न और भोजन के अभाव में शीघ्र ही मृत्यु हो गयी।
अतः एक श्लोक के माध्यम से इस सन्दर्भ में जो उक्त है सो निम्नलिखित है। 
"अज्ञात कुलशीलश्य वासो देयो न कश्यचित।
मार्जारश्य ही दोषेण हतो ग्रीधो जरद्गव: । ।"
अर्थात जिसके कुल गोत्र और स्वभाव के बारे में जानकारी न हो उस व्यक्ति को अपने यहाँ वास नहीं देना चाहिए ("अर्थात नहीं ठहरने देना चाहिए") बिल्ली के दोष से ही बूढ़े गिद्ध की पक्षियों ने हत्या  कर दी।

जरद्गव अर्थात जो बूढ़ा हो गया है।        
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शनिवार, 25 जून 2016

एक उदर और दो ग्रीवा - भारुंड पक्षी की कथा

एक उदर और दो ग्रीवा - भारुंड पक्षी की कथा

एक सरोवर में एक भारुंड पक्षी रहता था। वो सरोवर के मधुर जल में विचरण करता था. सरोवर के किनारे फलों वाले वृक्ष थे जिनसे पके हुए मधुर फल सरोवर के जल में गिरते थे और भारुंड पक्षी उसे खाकर बहुत आनन्दित होता था।

एक दिन भारुंड पक्षी को एक अति ही  मधुर फल मिला। इस पक्षी  के एक  उदर  और  दो  ग्रीवा और  मुंह  थे।   वो पहले ग्रीवा से फल को पकड़ कर मुंह से निगलने के लिए तैयार हुआ। दूसरे मुख  ने उससे कहा की हर बार तुम्ही मधुर फल खाते हो। इस बारमुझे फल का स्वाद लेने दो . इस बात पर पहले मुंह ने कहा कि हम दोनों का एक ही उदर है।  फल चाहे  मैं  खाऊं या तुम खावो  वो तो एक ही उदर में जाने है। अतः तुम मुझे फल खा लेने दो मुझे मत रोको। यह कहते हुए पहले मुंह ने फल को निगल लिया .इस पर दूसरे मुंह को बहुत गुस्सा आया वह बहुत दुखी  हुआ . वो इस बात के लिए पहले मुंह से बदला लेने के लिए योजना बनने लगा।
एक दिन सरोवर में विचरते हुए दूसरे  मुंह  वाले ने विषैले फल देखा। उसने यह फल खाने का विचार किया . उसके इस विचार से  पहले मुंह  वाला  बहुत  डर गया  . उसने  उसे  फल भक्षण  करने  से  रोक . लेकिन  दूसरे  मुंह  ने  उसकी  एक  न  सुनी . पहले ग्रीवा  ने  उसे  समझते  हुए   कहा  ये  जहरीला  फल  है  इसके  खाने  से  इसका  जहर  हमारे  उदर  में  जायेगा  और  हम दोनों  मर  जायेगा.
लेकिन  दूसरे  मुंह  वाले  ने  जिद  में  आकर  वो  करील  फल  खा  लिए . उसके  ऐसा  करणे  से  शारीर  में  विष  फैल  गया . उन  दोनों  पृथक  ग्रीवा  के  गलती  से  भारुंड  पक्षी  की  मृत्यु  हो  गयी.
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शुक्रवार, 24 जून 2016

एकलव्य की गुरु भक्ति



एकलव्य की गुरु भक्ति - Eklavya Master of Devotion


यह एक बहुत-बहुत लंबे समय की कहानी है। भारत देश में, करीब पांच हजार साल पहले, एकलव्य नाम का  एक लड़का रहता था,  वह हस्तिनापुर राज्य के जंगलों में एक आदिवासी के मुखिया का बेटा था। एकलव्य एक बहादुर और सुंदर लड़का था। उससे सभी  प्यार करते  थे। लेकिन वह खुश नहीं था।

उसके पिता ने एकलव्य को कुछ परेशान  देखा। एक से अधिक बार उन्होंने पाया कि उनका बेटा गहरी सोच में खोया हुआ है, जबकि अन्य लड़के शिकार और खेल के सुख का आनंद ले रहे हैं । एक दिन पिता ने अपने बेटे से पूछा, एकलव्य तुम इतनी दुखी क्यों रह रहे हैं? तुम अपने दोस्तों में शामिल क्यों नहीं होते? क्यों तुम शिकार करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं?

एकलव्य ने कहा पिताजी ! मैं एक धनुर्धर होना चाहता हूँ, मैं हस्तिनापुर में तीरंदाजी के महान शिक्षक महान द्रोणाचार्य का शिष्य बनना चाहता हूँ। उनके गुरुकुल एक जादुई जगह है जहां साधारण लड़के भी   पराक्रमी योद्धाओं में बदल जाते  हैं।
एकलव्य ने देखा उसके पिता चुप थे। उसने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, पिताजी , मुझे पता है कि हम शिकारी जनजाति के हैं, लेकिन मैं एक मात्र शिकारी नहीं बल्कि एक कुशल योद्धा बनना चाहता हुँ।  
अतः मुझे घर छोड़ने के लिए अनुमति दें जिससे मैं द्रोणाचार्य  के शिष्य बन सकूँ ।
एकलव्य के पिता परेशान थे, क्योंकि वह जानता थे कि उनके बेटे की महत्वाकांक्षा इतना आसान नहीं था। कबीले के प्रधान एक  प्यारे पिता थे और वो अपने एकलौते बेटे के मन की इच्छा को ठुकराना नहीं चाहते थे। तो उस दयालु भील ने अपने बेटे एकलव्य  को आशीर्वाद दिया और द्रोण गुरुकुल के लिए रास्ते पर भेजा दिया । एकलव्य अपने रास्ते पर चल दिया। जल्द ही वह जंगल के उस हिस्से पर पहुंच गया जहां द्रोण हस्तिनापुर के राजकुमारों को सिखाया करते थे।
उन दिनों में, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय या हॉस्टल के रूप में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। एक गुरुकुल ही ऐसा जगह था जहां कुछ शिक्षा मिल सकता थी।  एक गुरुकुल (गुरू "शिक्षक" या "गुरु" को संदर्भित है, कुल, अपने डोमेन के लिए संदर्भित है संस्कृत शब्द कुल से विस्तारित परिवार अर्थ निकलता है ") प्राचीन भारतीय विद्यालय थे। जो आवासीय हुआ करते थे और यहाँ गुरु और शिष्य एक ही घर में एक साथ रहते थे। गुरुकुल एक ऐसा जगह था, जहां उनकी सामाजिक स्थिति की परवाह किए बगैर सभी छात्र एक साथ रहते थे, वह आमिर गरीब सभी बराबर होते थे। छात्रों गुरु से सीखा करते थे और  जीवन में दिन-प्रतिदिन के कार्यों में  गुरु की मदद भी करते थे।  इस तरह के मदद में  कपड़े धोने, खाना पकाने, आदि शामिल थे।


इतना कहने के बाद, अब हमें एकलव्य की और लौट का आते है । बालक एकलव्य जब द्रोणाचार्य  के गुरुकुल पहुंचा तो उन्होंने देखा कि यहाँ झोपड़ियों के एक समूह था, एक तीरंदाजी यार्ड था और यह चारो ओर से पेड़ से घिरा था। शिष्य अपने धनुष और तीर के साथ यार्ड में तीर शूट करने के लिए अभ्यास कर रहे थे। यह शानदार नजारा था। लेकिन एकलव्य की आँखे द्रोण को तलाशी रही थी । वह कहाँ है? क्या वह उनको देखने के लिए सक्षम हो जाएगा?
द्रोण के बिना, यहाँ आने के उसके सभी  उद्देश्य निरर्थक होंगे। लेकिन उसकी सभी चिंता जल्दी ही थम गयी । उसे लम्बे समय तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। वहाँ पेड़ के पास खड़ा एक आदमी एक लड़के को सीखने में व्यथा था, वह तीसरे पांडव राजकुमार अर्जुन के सिवा और कोई नहीं था, यह बात एकलव्य बाद में पता चला। हालांकि एकलव्य द्रोण को पहले कभी नहीं देखा था, वह इस काम में अपने अनुमान लगाया। वह द्रोण के पास गया और झुककर प्रणाम किया। ऋषि एक अजीब लड़का को देख कर हैरान थे उसे संबोधित करते हुए पुछे।  तुम कौन हो?
"द्रोणाचार्य, मैं एकलव्य, हस्तिनापुर के जंगलों के पश्चिमी भाग में आदिवासी के मुखिया का बेटा हूँ।" एकलव्य ने उत्तर दिया। "कृपया आप मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें और मुझे तीरंदाजी की अद्भुत कला सिखाएँ।"
द्रोण ने कहा "एकलव्य ... अगर तुम एक आदिवासी शिकारी हो, तो निश्चय ही तुम एक शूद्र हो, जो वैदिक जाति व्यवस्था के अनुसार सबसे नीची सामाजिक समुदाय में है। मैं राज्य में सबसे उंची जाति  का एक  ब्राह्मण हूं।
उन्होंने कहा कि मैं एक शूद्र लड़का को धनुर्विद्या नहीं सिखा सकता। राजकुमार अर्जुन ने बीच में कहा "और वह भी एक शाही शिक्षक है," । "हमारे गुरु को प्रधानों और कुलीन के बच्चों को प्रशिक्षित करने के लिए राजा द्वारा नियुक्त किया गया है। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई गुरुकुल के अंदर आकर आचार्य द्रोण से अनुग्रह करने की। अर्जुन ने उसे चले जाने को कहा, अपने ब्यवहार से ऐसा दिखते हुए जैसे उसके अभ्यास में एकलव्य से बाधा आ रही हो।

एकलव्य अर्जुन के व्यवहार पर दंग रह गया था। वह खुद अपने कबीले के प्रमुख का बेटा था, लेकिन वह कभी इस तरह से किसी का भी अपमान नहीं किया। वह अपने समर्थन के के लिए द्रोण की ओर देखा, लेकिन ऋषि चुप रहे। संदेश जोर से और स्पष्ट था। द्रोणाचार्य भी उसे छोड़ना चाहते थे। उन्होंने  उसे सिखाने के लिए मना कर दिया।
निर्दोष आदिवासी लड़के को द्रोण के इनकार से गहरी चोट लगी थी। "यह सही नहीं है!" वह दीनता से सोचा। "भगवान सभी को ज्ञान दिया है, लेकिन आदमी उसे किस तरह अलग करता है ।"

वह एक टूटे हुए दिल से और मुंह में एक कड़वा स्वाद के साथ लिए उस गुरुकुल को छोड़ दिया। लेकिन वह तीरंदाजी में जानने के लिए अपनी महत्वाकांक्षा को चकनाचूर नहीं कर सका। उसने कहा कि अभी भी रूप में तीरंदाजी में जानने के लिए निर्धारित किया गया था। उसने कहा की मुझे तो तीरंदाज बनना है।
"मैं एक शूद्र हो सकता है लेकिन यह कोई फर्क नहीं पड़ता ?" उसने सोचा। "मैं भी द्रोण के प्रधानों और शिष्यों की तरह मजबूत और जोश के साथ भरा हुआ हूँ। अगर मैं हर रोज अभ्यास करता हूँ , तो  निश्चित रूप से मैं एक धनुर्धर बन सकता है।"
एकलव्य अपने ही जंगलों में पहुंच गया और एक नदी के पास से कुछ कीचड़ लिया। उसने  जंगलों में एक सुनसान समाशोधन चयनित जगह पर द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बना दिया है। क्योंकि उसका ईमानदारी से मानना था कि अगर वह अपने गुरू के सामने अभ्यास करेगा तो वह एक सक्षम तीरंदाज बन जाएगा, एकलव्य ने ऐसा ही किया। इस प्रकार, हालांकि उसके गुरु ने उसे त्याग दिया था, फिर भी वह उन्हें उच्च सम्मान दिया और अपने गुरु के रूप में उनकी पूजा किया और शिक्षा प्राप्त की।

प्रत्येक दिन वह अपने धनुष और तीर ले लेता और द्रोण की प्रतिमा की पूजा कर अपना अभ्यास शुरू देता। समय पर विश्वास, साहस और दृढ़ता ने एकलव्य जैसे मात्र आदिवासी शिकारी को असाधारण तीरंदाज में बदल दिया। एकलव्य असाधारण कौशल का एक धनुर्धर बन गया, यहां तक कि वह द्रोण के सर्वश्रेष्ठ छात्र, अर्जुन से भी बेहतर धनुर्धर बन गया।

एक दिन जब एकलव्य अभ्यास कर रहा था, वह एक कुत्ते के भौंकने की आवाज सुना। सबसे पहले उसने कुत्ते को नजरअंदाज कर दिया, लेकिन कुत्ते के वजह से अभ्यास  में निरंतर अशांति उसे नाराज कर दिया। वह अपने अभ्यास बंद कर दिया और उस जगह गया जहां से कुत्ते के भौंकने की आवाज आ रही थी । इससे पहले कि कुत्ते का भोकना बंद होता और वो अपने रास्ते चला जाता , एकलव्य तेजी से कुत्ते को बिना घायल किये एक एक कर सात तीर उसके मुंह में भर दिया। परिणाम स्वरुप वह अपने मुंह खोले हुए जंगल में घूमने लगा।

लेकिन एकलव्य अपने अभ्यास में अकेला नहीं था। कहने का तथ्य यह है कि सिर्फ कुछ दूरी पर, पांडव प्रमुख भी जंगल के उस क्षेत्र में मौजूद थे, एकलव्य इस बात से अनजान था। भाग्य से उस दिन वे अपने शिक्षक द्रोण के साथ आये हुए थे। वो उन्हें खुले जंगल के वास्तविक जीवन की हालत में तीरंदाजी के कुछ बारीकियों के बारे में निर्देश दे रहे थे।

जैसा कि वो अपने अभ्यास में व्यस्त थे, वे अचानक तीर से भरे हुए मुख वाले कुत्ते को देखे कुत्ते को मुख्य से एक एक कर तीर खींचा जा सकता था। तीरंदाजी की ऐसी उपलब्धि देख कर उन्हें आश्चर्य हुआ। द्रोण भी चकित थ। "इस तरह के उत्कृष्ट धनुर्विद्या का प्रदर्शन केवल एक शक्तिशाली धनुर्धर ही कर सकता है।" उन्होंने पांडवों से कहा कि इस तरह के एक अच्छा तीरंदाज से वह निश्चित रूप  मिलना चाहेंगे। अभ्यास बंद कर दिया गया और इस तरह के अद्भुत उपलब्धि के पीछे कौन है इसके लिए जंगल की तलाश शुरू कर दी गयी। उन्होंने काले चमड़ी में काले परिधान में एक आदमी को पाया पाया उसके शरीर गंदे थे और बाल घुंघराले थे।  यह एकलव्य था। द्रोणाचार्य उसके पास चले गए।

"आपका निशाना वास्तव में अचूक और उल्लेखनीय है!" द्रोण ने एकलव्य की प्रशंसा की, और पूछा, "तुमने किससे तीरंदाजी सीखा?" एकलव्य द्रोण से प्रशंसा सुनने के बाद रोमांचित था। वह कैसे आश्चर्य करेंगे अगर वह द्रोण से कहा कि वही वास्तव में उसके गुरु हैं। "आपसे गुरुदेव!  आप मेरे गुरु हैं," एकलव्य विनम्रतापूर्वक जवाब दिया।

"तुम्हारा गुरु? मैं कैसे तुम्हारा गुरु हो सकता हूँ ? मैंने तुम्हे पहले कभी नहीं देखा!" द्रोण ने आश्चर्य में कहा। लेकिन अचानक उन्हें कुछ याद आ गया। कई महीने पहले एक उत्सुक लड़का अपने गुरुकुल का दौरा किया था उसके बारे में याद आ गया। "अब मुझे याद है," उन्होंने कहा। "तुम वही शिकारी लड़के हो जिसे कुछ महीनों पहले मैं अपने गुरुकुल में प्रवेश करने से इनकार कर दिया था?"

"लड़के ने कहा, हाँ, द्रोणाचार्य"। "आपके गुरुकुल छोड़ने के बाद मैं घर आया और आप की तरह एक मूर्ति बना दिया और हर दिन इसकी पूजा की। मैं आपकी छवि के सामने अभ्यास किया करता था। आपने मुझे सिखाने  से इनकार कर दिया, लेकिन अपनी मूर्ति ने इंकार नहीं किया। ऐसा करने के लिए धन्यवाद, मैं एक अच्छा तीरंदाज बन गया। "

यह सुनकर अर्जुन नाराज हो गया। द्रोण पर आरोप लगते हुए अर्जुन ने कहा "लेकिन आपने मुझसे वादा किया था कि आप मुझे दुनिया में सबसे अच्छा तीरंदाज बनाएंगे!" "अब यह कैसे हो सकता है? अब एक आम शिकारी मुझसे बेहतर हो गया है!"

अन्य प्रधान राजकुमारों ने अर्जुन की तारीफ करते हुए कहा कि उसमे अपार प्रतिभा थी और राज्य में सबसे बड़ा धनुर्धर होगा उनके गुरु अक्सर कहा करते थे। वे थमी हुई  सांस के साथ इंतजार कर रहे थे।  उनके शिक्षक अब क्या करेंगे ?

अर्जुन के सवाल का जवाब देने में असमर्थ, द्रोण चुप रहे। ऋषि भी परेशान थे कि राजकुमार अर्जुन को अपने किये गए वादे को पूरा किया जाना असम्भव प्रतीत हो रहा था।  वह अर्जुन की अवहेलना के लिए एकलव्य के साथ गुस्सा भी थे।  इसलिए ऋषि ने एकलव्य को दंडित करने की योजना बनाई।
"तुम्हारी गुरु दक्षिणा कहाँ है? ऋषि ने मांग की तुम्हे मुझे अपने प्रशिक्षण के लिए एक उपहार देना होगा," द्रोणाचार्य को आखिर में एकलव्य को उनकी आज्ञा मानने के लिए पीड़ित करने के लिए एक रास्ता मिल गया था।
एकलव्य बहुत खुश था। गुरु दक्षिणा एक स्वैच्छिक शुल्क या उपहार हुआ करती थी। यह अपने  प्रशिक्षण के अंत में अपने गुरु के लिए एक शिष्य द्वारा पेशकश थी। गुरु-शिष्य परम्परा है, यानी शिक्षक-छात्र परंपरा, हिंदू धर्म में एक पवित्र परंपरा थी। एक शिष्य के अध्ययन के अंत में, गुरु गुरु दक्षिणा लिए पूछता है 'गुरु दक्षिणा' के बाद से एक गुरु फीस नहीं ले सकता। गुरु दक्षिणा आश्रम छोड़ने से पहले गुरु के लिए एक छात्र से अंतिम पेशकश  थी। शिक्षक कुछ या कुछ भी नहीं मांग सकता था

"द्रोणाचार्य, मैं आप की सेवा करके पृथ्वी पर सबसे खुश व्यक्ति हो जाएगा। आप मुझसे अपने गुरु दक्षिना के रूप में कुछ भी मांगिये मई आपकी  सेवा में पेश करूँगा" उन्होंने कहा। "मैं तुमसे कुछ ऐसा मांग सकता हूँ जो तुम देना नहीं चाहोगे   द्रोणाचार्य ने चालाकी से पूछा क्या होगा जब मैं तुमसे कुछ मांग और तुम देने से इंकार कर दो।
एकलव्य चौंक गया था। यह एक गंभीर अपमान है और एक महान पाप माना जाता था,गुरु की दक्षिणा से इनकार कर देना। नहीं गुरुदेव ऐसा कैसे हो सकता है मई वैसा कृतघ्न नहीं हूँ। मैं वादा करता हूँ कोई चीज़ देने से इंकार नहीं करूँगा आप आज्ञा कीजिये।

द्रोण ने अब और इंतजार नहीं किया। "एकलव्य, मैं अपने गुरु दक्षिना के रूप में तुम्हारे  दाएँ हाथ के अंगूठे की मांग करता हूँ " उन्होंने घोषणा की। यह सुनकर सन्नाटा छा गया हर कोई चौंक गया था, यहां तक कि अर्जुन भी वह अविश्वास से अपने शिक्षक की ओर देखा। कैसे उसका शिक्षक इस तरह के एक क्रूर मांग कर सकता है? वो भी, एक लड़के से जो उनका शिष्य है?

एक पल के लिए एकलव्य चुप खड़ा था। अपने अंगूठे के बिना वह तीर फिर से शूट नहीं कर सकता था। लेकिन शिक्षक संतुष्ट होना चाहिए। "ठीक है गुरुदेव, जैसा आप चाहें" उन्होंने कहा। फिर, बिना थोड़ी सी झिझक के एकलव्य ने चाकू बाहर निकाला और अपने अंगूठे काट दिया।
राजकुमार एकलव्य के बहादुरी को देख कर स्तब्ध रह गए। लेकिन आदिवासी लड़के ने दर्द के कोई संकेत नहीं दिखने दिए, और द्रोणाचार्य के लिए अपने कटे अंगूठे को समर्पित किया।


"यहाँ है मेरे गुरु दक्षिणा, द्रोण ", एकलव्य ने कहा। "मुझे खुशी है कि आपने मुझे अपना शिष्य बना दिया है, यहां तक कि मैं एक मात्र शूद्र शिकारी हूँ।"
ऋषि आर्त थे। उन्होंने अप्रतिम साहस के लिए युवा तीरंदाज को आशीर्वाद दिया। "एकलव्य, अपने अंगूठे के बिना भी तुम एक महान धनुर्धर के रूप में जाने जावोगे मैं तुम्हें आशीर्वाद है कि तुम  हमेशा के लिए अपने गुरु के लिए अपनी वफादारी के लिए याद किये जावोगे," द्रोण ने घोषणाओं की और जंगलों में छोड़ कर उसे चल दिया। वह चले गए और अपने ही कार्रवाई पर दुखी थ। लेकिन वह इस बात से  संतुष्ट थे कि अर्जुन को अपना किया गया वादा नहीं तोड़ा गया था। देवताओं ने एकलव्य को अधिक से अधिक आशीर्वाद दिया।

लेकिन विकलांगता के बावजूद, एकलव्य तीरंदाजी का अभ्यास जारी रखा। वह ऐसा कैसे कर सकता है? जब एक आदमी समर्पित हो तो वह पहाड़ों को भी धनुष की तरह झुक सकता है अभ्यास के साथ, एकलव्य अपने तर्जनी और मध्यम उंगली के साथ तीर चलने में अभ्यस्थ हो गया और वह एक बड़ा धनुर्धर बन गया उनका यश दूर-दूर तक फैल गया। जब द्रोण को यह पता चला तो वह उसे आकर चुपचाप आशीर्वाद दिए और दिव्य माफी के लिए विनती की।
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