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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

चार मित्र और शेर - Academic versus practical education

 किताबी शिक्षा बनाम व्यवहारिक शिक्षा

एक गांव में चार मित्र रहते थे। यह गांव बहुत दिनों से सूखा और अकाल से पीड़ित था। उनमे से तीन बहुत ज्यादा शिक्षित थे और अपने चौथे मित्र शिवानंद को आलसी अव्यवहारिक और मुर्ख समझते थे. शिवानंद को शैक्षणिक ज्ञान कम था लेकिन व्यावहारिक ज्ञान में  वो तीनो मित्रो से बढ़ कर था। अपनी  शैक्षणिक योग्यता पर शिवानंद के तीनो मित्र इतराते रहते थे।
चारो उच्च शिक्षा के लिए बिद्वानो के लिए मसहूर शिक्षा का केंद्र मनसा जाने का निश्चय किये। रास्ते में  एक जंगल पड़ता था।  रास्ता जंगल के बीच से होकर जाता था। जंगल में उन्होंने एक शेर की हड्डियां देखी। उनमे से एक मित्र सत्यानंद ने शेर के बिखरे हुए हड्डियों को चुन कर इकठ्ठा किये और शेर के हड्डी से शेर का ढांचा अपने मंत्र विद्या से तैयार कर दिया। दूसरे मित्र ने ऐसा देखकर सेर के हड्डियों के ऊपर मांस और खाल चढ़ाने का निश्चय किया और अपने मंत्र विद्या से ऐसा करने में सफल रहा। अब तीसरे मित्र विद्यानंद ने अपनी प्रतिभा दिखने की बात सोची।  वह अपने मन्त्र शक्ति से शेर में प्राण डालने को उद्यत हुआ।

शिवानंद यह देखकर बहुत घबरा गया उसने उन तीनो को ऐसा करने से रोक। उसने शेर के जीवित होने पर होने वाले गंभीर परिणाम से सभी मित्रों को अवगत करना चाहा।  सभी मित्र उसे हेय दृष्टि से देखते थे अतः शिवानंद के बातों का सभी मित्रों ने अवहेलना कर दिया। शिवानंद ने देखा की बहुत समझने पर भी ये हठी मुर्ख अव्यवहारिक मित्र नहीं मानेंगे तो उसने विद्यानंद से कहा की रुको तुम इस सेर के अंदर अपने मंत्र शक्ति से प्राण दाल दो लेकिन पहले मुझे पेड़ पर चढ़ जाने दो। शिवांनंद के पेड़ पर चढ़ते ही विद्यानंद ने सेर को जीवित कर दिया .
सेर जो भूख के मारे मार पड़ा था अपने सामने खड़े तीन शिकारों को जल्द ही मार कर खा गया.

अतः कहा गया है की "एक मन बिद्या के लिए नौ मन बुद्धि चाहिए"
शैक्षणिक ज्ञान से ज्यादा महत्व व्यावहारिक ज्ञान का है।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

ब्राम्हण, चोर और दानव - Thief Brahmin and Demon


एक शहर में एक ब्राम्हण रहता था जिसने अपने सभी भौतिक सुख सुबिधाओं को त्याग दिया था। उसका नाम द्रोण था वह किसी भी विलासिता संबंधी वस्तुओं सुन्दर वस्त्र और सुगंध आदि का उपयोग नहीं करता था।

वह ठंडे गर्मी और बरसात के मौसम के दौरान भी पूजा की कठोर प्रथाओं का पालन किया करता था। इसके कारण, उसका शरीर दुबला और कमजोर हो गया था। उसके बाल और नाखून भी लंबे समय से देख भाल  नहीं करने के कारण काफी बढ़ गए थे।
उसके एक भक्त ने बछड़ों की एक जोड़ी भेंट की। वह बछड़ों का बहुत ख्याल रखता था और उन्हें अच्छी तरह से खिलता पिलाता था। इसके कारण कम समय में ही वो मोठे तगड़े हो गए।

एक दिन, एक चोर ने बछड़ों को देखा और सोचा, "मैं इसके पास से इन मोटे बछड़ों की चोरी करूँगा।"


उसने योजना बनाई है और रात में बछड़ों की चोरी करने के लिए एक रस्सी के साथ में ले कर आया। रास्ते में उसे  बहुत ही घृणित उपस्थिति में एक चोर से मुलाकात हुई।


चोर उसे देखकर डर गया और पूछा, "तुम कौन हो?"

दानव ने कहा, "मैं एक दानव हूँ। मैं हमेशा सच बलता हूँ और झूठ बोलने वाले से नफरत करता  हैं। तुम अपना परिचय दो !"

चोर ने कहा, "मैं एक चोर हूँ और एक भक्त ब्राम्हण के दो बछड़ों की चोरी करने जा रहा हूँ। "

चोर ने सच बता दिया। सच सुनकर दानव बहुत खुश हुआ उसने चोर से मित्रता कर दी। उसने चोर से कहा की तुम ब्राम्हण के बछड़ो को चुरा लेना और मैं ब्राम्हण को खा लूंगा। इस प्रकार हम दोनों का प्रयोजन सिद्ध हो जाएगा.
वे दोनों ब्राह्मण के घर के अंदर घुस गए और खुद को छिपा लिया। वे ब्राह्मण के सो जाने का इंतजार करने लगे ताकि, उन्हें अपने अपने कार्यों को पूरा करने का अवसर मिल जाये।
जैसे ही ब्राह्मण सो गया, दानव जो छुपा हुआ था बाहर आया और उसने ब्राम्हण को खाने के लिए  दांत और नाखून तैयार किये।

चोर इस डर से की ब्राम्हण के जागने से कही मेरा उद्देश्य व्यर्थ न चला जाए। चोर ने दानव से कहा की तुम तब तक ब्राम्हण पर खाने के लिए हमला मत करना जबतक मई बछड़ो को रस्सी से न बाँध लूँ।

लेकिन दानव इस बात से असहमत था , कि अगर बछड़े की चोरी करते समय वो  जोर जोर से बोलने लगे तो ब्राम्हण जग कर भाग जाएगा और मैं उसे नहीं खा पाउँगा ।


इस के कारण वे एक दूसरे से बहस में उलझ गए, और उनके तर्क का शोर सुनकर ब्राह्मण जाग उठा।

चोर ने ब्राम्हण से शिकायत की कि दानव आपको खाने की योजना बना रहा था। इसपर प्रतिक्रिया स्वरुप दैत्य ने भी खा की यह चोर आपके बछड़ो की चोरी करना चाहता था।
यह सुनकर ब्राम्हण मंत्र पढ़ना शुरू किया।  मंत्र के प्रभाव से दानव भाग गया। फिर ब्राम्हण ने एक छड़ी लिया और छड़ी से मार मार कर चोर को भगा दिया

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

कपोतराज चित्रग्रीव, कबूतर और बहेलिया - kapotraaj chitragriw and Fowler

एक जंगल में बूढ़ा कबूतर था कपोत राज चित्रग्रीव वह कबूतर बहुत अनुभवी था. अपने कबूतरों की रक्षा किया करता था और समय समय पर उन्हें उचित परामर्श दिया करता था. कबूतरों को उनके मित्र और शत्रु के बारे में जानकारी देते रहता था. सभी कबूतर अपने राजा के बुद्धिमता का लाभ उठाते और सुख पूर्वक रहते थे.
एक दिन कबूतरों का झुंड उड़ते उड़ते जंगल के बीचो बीच पहुंच गया. उनके साथ उनका राजा कपोतराज चित्रग्रीव भी था. कबूतरों ने जंगल में चावल के दाने देखे. चावल के दाने देख कर सारे कबूतर लालच भरी निगाहों से चावल चुगने का मन बनना लगे. बूढ़ा कबूतर उनके मन की बात जान गया उसने कबूतरों को दाना चुगने से रोका .उसने कहा की इस निर्जन बन में चावल के कण कैसे सम्भव है. हमें इससे किसी अनहोनी घटना का अहसास हो रहा है.
भूख से ब्याकुल और लालच के बशीभूत कबूतरों ने चित्रग्रीव की बातों की अवहेलना कर दी और दाना चुगने सारे कबूतर उतर पड़े. जाल बिछाकर घात लगाए शिकारी इसी समय की  प्रतीक्षा में छुप कर बैठा था. कबूतरों को जाल पर बैठा देख वह बहुत खुश हुआ की बहुत सारे कबूतर एक साथ
सही नस्ल के मिल गए. कपोतराज चित्रग्रीव की अपने नादान बच्चों पर दया आ गयी चित्रग्रीव ने कहा देखो तुम लोगों ने मेरी बात नहीं मानी सो इस जाल में फँस गए हो. अब एक मत से सभी मेरी बात मनोज तो तुम शिकारी से बच सकते हो. पेड़ की वोट में छुप शिकारी  तुम लोगों की तरफ चला आ रहा है. तुम लोग सारे मिल कर जोर  लगावो और जाल को लेकर उड़ जावो. सारे कबूतरों  ने मिलकर जोर लगाया और जाल ऊपर उठने लगा. कबूतर जाल लेकर उड़ गए शिकारी कुछ दूर उनका पीछा किया पर निराश हो कर चला गया.
अब चित्रग्रीव ने कबूतरों से कहा कि तुम लोग मेरे पीछे पीछे आवो. मई अपने मित्र हिरण्यक के पास चल रहा हूँ. मेरा मित्र हिरण्यक चूहा है उसके बहुत तीक्ष्ण दांत है. वह तुम लोगो के जालको काट देगा. सारे कबूतर मूषक राज हिरण्यक के पास पहुंचे. जाल लिए हुए सारे कबूतर निचे उतर पड़े.


मूषक राज हिरण्यक १०० से अधिक बिल बनकर सुख पूर्वक रहता था. कपोतराज चित्रग्रीव ने बिल के पास जाकर अपने मित्र हिरण्यक को आवाज लगायी .मूषक राज ने अपने मित्र की जानी पहचानी   आवाज सुनी तो विवर के बाहर आया. कपोत राज चित्रग्रीव ने कबूतरों के नादानी की कहानी सुनाई. सारा वृतांत सुनाने के बाद हिरण्यक जाल को काट दिया.

कपोतराज चित्रग्रीव की होशियारी  से सारे कबूतर जाल से मुक्त हो गए. अतः हमें अपने बड़ों का आदर करना चाहिए इसीमे हमारी भलाई है.

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

Merchant Five Children Tuti, Fati, Jali, Ganda, Panchar- कंजूस सेठ - Hospitality -

सेठ की पांच संतान टूटी, फटी, जली, गन्दा, पंचर - अतिथि सत्कार  


एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।


एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।

एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।

एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

बुधवार, 13 जुलाई 2016

किसान की लड़की और साहुकार, दो कंकड़

दो कंकड़, किसान की लड़की और साहुकार

 

कई साल पहले एक छोटे से भारतीय गांव में, एक किसान दुर्भाग्य से एक साहुकार से पैसे की एक बड़ी राशि ले लिया था। साहुकार जो बूढ़ा और बदसूरत था किसान की सुन्दर बेटी पर लालच भरी नजर लगाया था। इसलिए वह किसान से एक सौदा का प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि मैं तुम्हारा  कर्ज माफ़ कर दूंगा अगर तुम अपनी सुन्दर बेटी से मेरी शादी करवा दो।

किसान और उसकी बेटी दोनों इस प्रस्ताव से भयभीत थे। अतः धूर्त साहुकार ने सुझाव दिया की वो अपने भाग्य का निर्णय करें। उसने उन्हें बताया कि वह एक खाली पैसे के बैग में एक काला और एक सफेद कंकड़ डाल कर देगा। लड़की को उस बैग में से एक कंकड़ चुनना होगा।

अगर उसने काले कंकड़ उठाया, तो वह उसकी पत्नी बन जाएगी और उसके पिता का कर्ज माफ कर दिया जाएगा। अगर वह सफेद कंकड़ उठाती है, तो उसे मुझसे शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का ऋण भी माफ किया जाएगा।

वे दोनों किसान के खेत में एक कंकड़ बिखरे पथ पर खड़े थे। वे बात कर रहे थे इसी क्रम में , साहूकार दो कंकड़ लेने के लिए झुका। साहुकार ने जैसे कंकड़ उठाया, तेज आंखों वाली लड़की ने देखा कि वह दो काले कंकड़ उठाया और उन्हें बैग में डाल दिया। इसके बाद उसने लड़की से बैग में से एक कंकड़ लेने के लिए कहा।
अब, कल्पना है कि आप मैदान में खड़े थे। आपने उस समय क्या किया होता, आप अगर उस लड़की की जगह होते ? आपको अगर उसे सलाह देना होता तो आप उसे क्या परामर्श देते ?

इस बात पर विचार करने के लिए कुछ समय निकालें। आप उस लड़की को क्या करने की सिफारिश करते ?

लड़की ने पैसे के बैग में हाथ डाला और एक कंकड़ उसमे से निकाला। उसने बिना इसे देखे, उसने टटोला और कंकड़ को कंकड़-बिखरे पथ गिरने दिया जहाँ यह दूसरे कंकड़ के साथ मिलकर खो गया।

उसने कहा ओह मैं कैसी अनाड़ी लड़की हूँ। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं अगर आप बैग में रखे दूसरे कंकड़ के रंग पर गौर करेंगे तो इस बात का पता चल जाएगा की मैंने कौन सा कंकर उठाया था।

साहूकार को अपनी बेईमानी को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं हुई। लड़की ने एक असम्भव परिस्थिति को अपने पक्ष में कर लिए जो किसी भी हालत में उसके पक्ष में नहीं था। क्योंकि साहुकार ने बैग में दोनों काले कंकड़ रखे थे।
ज्यादातर समस्याओं का समाधान है, कभी कभी हमें सिर्फ कुछ अलग तरह से सोचने की जरूरत है।

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

The Elephant Rope - हाथी की रस्सी

The Elephant Rope - हाथी की रस्सी

एक आदमी रास्ते से जा रहा था। रास्ते में उसे एक हाथी दिखा जो एक कमजोर रस्सी से बंधा हुआ था।  वह अचानक वहाँ रुक गया। उसे यह देख कर आश्चर्य हुआ की कैसे इतना बड़ा जानवर एक कमजोर रस्सी के सहारे ("जो उसके अगले पैर के साथ बंधी है") बंधा रह सकता है। नहीं कोई जंजीर, नहीं कोई पिंजड़ा। इस कमजोर रस्सी से सम्भव है हाथी कभी भी बंधन मुक्त हो सकता है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहा क्या कारण है इसका ?
उसने वहाँ एक हाथी का प्रशिक्षक देखा। उसने प्रशिक्षक से पूछा हाथी क्यों इस कमजोर रस्सी से बाधा हुआ खड़ा है और भागने का बिलकुल भी प्रयास नहीं करता ?

हाथी के प्रशिक्षक ने जबाब दिया जब यह हाथी बहुत छोटा था तब मैं इसी रस्सी के सहारे इसे बाँधा करता था। तब ये रस्सी इतनी मजबूत थी की इसको पकडे रहती थी। और यह रस्सी तोड़कर नहीं भाग पता था। इसने रस्सी को  तोड़ने के लिए बहुत प्रयास किया लेकिन इसका प्रयास बिफल रहा।  हारकर इसने रस्सी को तोड़पाना असम्भव मान लिया और रस्सी पर जोर लगाना भी छोड़ दिया। धीरे धीरे यह बड़ा होता गया। इसे अभी भी लगता था की यह रस्सी इसे बांधे रखने में समर्थ है। इसने रस्सी को तोड़ने का प्रयास नहीं किया। आज यह एक वयस्क बलवान हाथी है लेकिन इसने रस्सी से हार मान ली है। 
आदमी यह सुनकर हैरान था ।  यह जानवर किसी भी समय रस्सी को तोड़कर अपने बंधन से मुक्त हो सकता है। लेकिन क्योंकि वे लिया है, कि वह ऐसा नहीं कर सकता। अतः उसी कमजोर रस्सी के सहारे बंधन में है जिससे वह बचपन से बँधता आया था।

इस हाथी की तरह ही, हममे से कितने ही लोग ऐसे है जो यह मान लेते हैं को वो जीवन में ये काम नहीं कर सकते क्योंकि पिछली बार हमने प्रयास किया था तो विफल रहे थे।

पिछले बार आपका किसी काम में विफल होना ठीक उसी प्रकार  है जैसे अपने बाल्यावस्था में हाथी रस्सी को खींचकर तोड़ पाने में असमर्थ था।  लेकिन इस समय आप किसी काम को करने में समर्थ है लेकिन प्रयास नहीं कर रहे है यह जानकर की भूतकाल में आप विफल हुए थे। इस सोच को elephant rope "हाथी की रस्सी" की संज्ञा दी गयी है।    

सोमवार, 11 जुलाई 2016

हमेशा सावधान रहें - Always be Alert

हमेशा सावधान रहें -Always be Alert

एकबार की बात है। जंगली में एक शेर रहता था वह इतना बूढ़ा हो गया था की शिकार करने में असमर्थ था। इसलिए उसने अपने आप से कहा , मुझे कुछ करना चाहिए पेट के लिए नहीं तो मैं भूखा मर जाऊंगा।
वह यही सोचता रहा तभी उसके दिमाग में एक उपाय सुझा। उसने निर्णय लिया की वह बीमार की तरह अपने गुफा में लेटा रहेगा। इस तरह जो कोई उसके स्वास्थ्य के बारे जानकारी लेने उससे मिलने आएगा सेर उसकी शिकार आसानी से कर लेगा। बूढ़े सेर ने अपने कुटिल योजना को प्रयोग में लाना शुरू किया।  वह कई दिनों तक बीमार की तरह अपने गुफा में पड़ा रहा। जंगल के जानवर जब कई दिनों तक सेर को गुफा से बहार निकलते नहीं देखे तो उसे बीमार समाज  कर उससे मिलने जाने लगे। सेर की गन्दी कुटिल नीति काम आने लगी। वह अपने पास आये जानवरों का आसानी से शिकार करने लगा। उसके बहुत से शुभ चिंतक जो उसके बीमार होने की खबर सुनकर हाल-चाल पूछने  गए मारे गए। लेकिन बुराई का अंत होता है। किसी भी बुराई की बहुत अल्प आयु होती है। 


एक दिन सेर से मिलने एक लोमड़ी आई। जैसा कि लोमड़ियां स्वभाव से चतुर होती हैं, लोमड़ी गुफा के मुहाने पर कड़ी हो गयी और चारो तरफ देखने लगी। उसके छठी इंद्रिय की संवेदना काम किया और उसे सच्चाई समझते देर नहीं लगी। उसने देखा की गुफा के अंदर जाने के पद चिन्ह तो हैं, लेकिन गुफा से बाहर आने के पद चिन्ह नहीं दिख रहे।  अतः उसने सेर को गुफा के बहार से आवाज दिया और पूछा, महाराज आप कैसे हैं।

शेर ने कहा, मैं अच्छा महसूस नहीं कर रहा हूँ। लेकिन तुम अंदर क्यों नहीं आते?  
महाराज ! मैं अंदर आना चाहूंगी लेकिन मैं देख रही हूँ की जानवरों के गुफा के अंदर जाने के पैर के निसान तो हैं लेकिन गुफा से बहार निकलने का निसान तो नहीं दिख रहा। कही आपके साथ साथ अंदर जाने वाले जानवरों की तबियत भी ख़राब तो नहीं हो जा रही है। क्षमा करें मैं गुफा के  अंदर नहीं आ सकती। लोमड़ी ऐसे कह कर गुफा के द्वार से ही वापस चली गयी और सेर के छलपूर्ण योजना को जंगल के सारे जानवरों से बता दी।

सारांश -> हमेशा अपनी आँखें खुली रखें और किसी भी स्थिति में चलने से पहले सतर्क रहें।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

गलतियों से सबक सीखें - Learn Lesson From Failure

विफलता सबक सिखाती है - गलतियों सबक से सीखें

थॉमस एडिसन ने बिजली के बल्ब के अविष्कार के लिए फिलामेंट की खोज में हजारों धातुओं का परिक्षण किया। जब कोई पदार्थ संतोषजनक काम नहीं क्या तो उनके सहायक ने उनसे शिकायत की। आपका सारा परिश्रम व्यर्थ चला गया हम लोगों ने कुछ नहीं सीखा।
एडिसन ने दृढ़ता से जबाब दिया। अरे हमलोग इस अविष्कार के क्रम में बहुत लम्बी दुरी तय किये हैं और बहुत कुछ सीखे भी हैं। हम जान गए की २००० तत्व ऐसे हैं जिनका उपयोग हम प्रकाश बल्ब बनाने में नहीं कर सकते। We should learn Learn Lesson From Failure.


इस लघु कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमारा प्रयास कभी विफल नहीं जाता हमारा प्रत्येक प्रयास हमें कुछ न कुछ दे के जाता है।  हमारा प्रयास भले  ही हमें अपेक्षित परिणाम न दे लेकिन सीख तो दे ही जाता है। एडिसन ने अपने बल्ब के अविष्कार के क्रम में हज़ारों धातुओं / तत्वों का परिक्षण किया बल्ब के फिलामेंट के लिए कोई उपयुक्त तत्व नहीं मिला।  ("बल्ब का फिलामेंट बल्ब का वह भाग होता है जो जल  कर रोशनी प्रदान करता है।") लेकिन इस अविष्कार परिक्षण के क्रम में उन्हें बहुत से तत्वों के गन धर्म के बारे में जानकारी मिल गयी।  

बुधवार, 6 जुलाई 2016

पंचतंत्र की कहानियां कैसे बनी

एक समय की बात है अमरशक्ति नाम का राजा  महिलरोपयम के दक्षिण के प्रदेश में राज्य करता था। उसके पास तीन जिद्दी और मुर्ख शरारती  लड़के थे। उन बच्चों को पढ़ने से चिढ थी। राजा ने अपने लड़कों को पढ़ने के लिए कई अध्यापक नियुक्त किये। अध्यापक बच्चों को बहला फुलसला कर जैसे ही पढ़ना शुरु करते बच्चे सतर्क हो जाते और अध्यापक को मिलकर चिढ़ाने लगते और उसे भागने का नाना यत्न करने लगते। ऐसा जानकार की मेरे बच्चे कुछ नहीं सिख नहीं सकते राजा ने पुरे राज्य में घोषणा करवा दिया जो कोई मेरे इन जिद्दी जड़ बच्चों को पढ़कर शिक्षित कर देगा उस मुंहमांगा इनाम दिया जायेगा।
राजा के कर्मचारी यह फरमान पुरे राज्य में फैला दिए। इस घोषणा की खबर आचार्य विष्णु शर्मा के कान  में पड़ी। विष्णु शर्मा ने राजा के  जड़मति बच्चों को पढ़ना शुरू किया।

विष्णु शर्मा बच्चों को कहानिया सुनाने लगे।  बच्चे बड़ी तन्मयता से उनकी कहानी सुनाने  लगे। साथ ही वो शरारती बालक सतर्क भी थे की कही ये उपाध्याय भी धोके से और अध्यापकों की तरह पढ़ना न शुरू कर दे। बच्चों को जानवरों की कहानी  सुनाकर कहानी के माध्यम से विष्णु शर्मा नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ने लगा।  बच्चे बड़ी तन्मयता से उनकी रोचक कहानिया सुनते। विष्णु शर्मा कहानी के अंत में कहानी का सारांश सुनाते और बच्चों से कहानी से प्रेरणा के रूप में शिख लेने को बोलते।

इसी अध्ययन के क्रम में विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना की। जिसकी कहानियां बहुत ही रोचक है। कहानी के सारे पात्र मुख्यतः जानवर पशु पक्षी होने से यह बच्चों में काफी लोकप्रिय है। आज के समय में जैसे बच्चे कार्टून के प्रति ज्यादा आकर्षित होते है पंचतंत्र भी अब से पहले बच्चों में एक ख़ास आकर्षण था और आज भी है।  कई विद्वान तो पंचतंत्र के कहानियों का कार्टून में रूपांतरण किये हैं।
पंचतंत्र के पांच अंग हैं, जिसके कारण इसे पंचतंत्र की संज्ञा दी गयी है।
पंचतंत्र के पांच भाग 
   १) मित्रभेद (मित्रों में आपस में मनमुटाव एवं अलगाव)
   २)  मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र बनकर उससे लाभ लेना )
   ३) काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा)
   ४) लब्धप्रणाश (मृत्यु या विनाश के आने पर; यदि जान पर आ बने तो क्या?)
   ५) अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; हड़बड़ी में क़दम न उठायें)

यहाँ पढ़े मत्रभेद की कहानी -> मित्रभेद  

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

आलसी और कामचोर गधा

आलसी और कामचोर गधा - Lazy Donkey and Honest Master

 भोला के पास कर्मठ नाम का एक गधा था। भोला बहुत ही दयालु और सहिष्णु मालिक था। गधा   अपने नाम के प्रतिकूल स्वभाव का था। वह बहुत अलसी और कामचोर था हरदम काम नहीं करने के नए नए बहने बनाते रहता था।
भोला नमक का व्यापर करता था और उसी नदी के रास्ते नमक गधे पे लाद कर शहर से गाँव लाता था। नदी पर पुल नहीं था लेकिन पानी काम होने के कारण लोग उसे पार कर जाया करते थे। एक बार जब वह नमक की बोरी अपनी पीठ पर लिए नदी से होकर गुजर रहा था तो अचानक नदी में गिर गया। उसने महसूस किया की उसके गिरने से पीठ पर लदे भार का वजन कुछ कम हुआ है, क्योंकि कुछ नमक पानी में घुलकर बह गया था।
आलसी और कामचोर गधा


इस दिन के बाद कर्मठ जानबूझकर नियम से नदी के पानी में बैठने लगा ताकि उसके पीठ पर का भार कुछ काम हो जाये। कर्मठ के इस ब्यवहार से भोला बहुत असंतुष्ट था, क्योंकि नमक के व्यापार में उसे घाटा लग रहा था। उसने कर्मठ को सबक सीखने के लिए निश्चय किया।

अगले दिन नमक के बोरी के बदले कर्मठ के पीठ पर उसने कपास से भरी बोरियां लाद दी। कर्मठ इस बदलाव से अनभिज्ञ था। उसे अपने मालिक के दयालुता और भोलेपन पर इतना विश्वास था की इस प्रकार की किसी तरह की अनहोनी की वो कल्पना भी नहीं करता था। उसे वजन लदने की परवाह नहीं होती थी।  क्योंकि शहर से कुछ दूर निकलते ही गाँव के रास्ते नदी पड़ती थी। वह नदी में बैठ कर थोड़ी सी वजन कम कर लेता था फिर मटकते मटकते अपने मालिक का घर पहुंचता था।

मालिक अपने दूसरे गधों पर कीमती सामान लेकर उन गधो पे लदे सामान की  निगरानी करते जाता था। नमक चुकी कम कीमत का था इसलिए ये गधा अक्सर दूसरे गधो से पीछे छूट जाता था। अपने मालिक की नजर से दूर होने के कारण वो नदी में थोड़ा सा अपने शरीर को झुक लेता और वजन कम कर लेता। 
कपास का वजन लिए गधा नदी के करीब पहुंचा। अपनी रोज की योजना के अनुसार वो आज भी भार के वजन को काम करने के लिए नदी में थोड़ा सा झुका। उसके ऐसा करने से कपास भीग गया और वजन बढ़ने लगा। वजन इतनी तेजी से बढ़ने लगा की वह अपने को संभल नहीं पाया और नदी में गिर पड़ा। उसका मालिक बहुत देर तक इस आलसी गधे की प्रतीक्षा किया लेकिन जब बहुत देर हो गयी तो एक डंडा लिए वो गधे के खोज में निकला। गधे की हालत देखकर भोला को गधे की योजना के बारे में पता चल गया।

भोला ने  गधे की खूब पिटाई की। इस हालात से और मालिक के डंडे की मार से गढ़ सबक सिख चूका था। अब वो अपने  नाम के अनुरुप यथा नाम तथा गन कर्मठ गधा बन चूका था। 

सारांश-> हमें ईमानदारी और निष्ठा से अपने काम करने चाहिए, आलस और कामचोरी हमें बर्बाद कर देती है। 

यहाँ देखें और अधिक ->>शिक्षाप्रद कहानियां

सोमवार, 4 जुलाई 2016

झगड़ालू बिल्ली और धूर्त बन्दर

झगड़ालू बिल्ली और धूर्त बन्दर - Quarrelsome Cat and Cunning Monkey

एक जंगल में पेड़ के  नीचे दो बिल्लोयों ने घर बना  रखा था। जंगल किनारे एक समृद्ध गावं होने से बिल्लियां पास के  गांव से कभी कभी स्वादिष्ट भोजन लय करती थी।  उनके दिन अच्छे से कट रहे थे।  कभी कभी ग्रामीणों से नजर बचा के वो दूध दही का भी मजा चख लिया करती थी।  ग्रामीण लोगों के अनाज का भंडार उनके आहार का मुख्य स्रोत था। अनाज के भंडार के पास प्रचुर मात्र में चूहे पाए जाते थे। बिल्लियां उन चूहों का शिकार कर मजे से जीवन यापन करते थे।
बिल्लियां जिस पेड़ के नीचे घर बन रखी थी उस पेड़ पर एक बन्दर का आवास था।  बन्दर भी अपने आहार के खोज में कभी कभी पास के गांव में जाया करता था। एक ही जगह आवास होने से और गांव के मार्ग में आते जाते मिलने से बन्दर और बिल्लियों में मित्रता हो गयी थी। इस मित्रता के नाते अब बिल्लियां जब कुछ अच्छा आहार मिलता जिसे बन्दर भी खा सकता था तो बिल्लिया उसे बन्दर के लिए लेते आती थीं।  बन्दर भी बिल्लियों का ख्याल रखता था और जब किसी घर की गृहस्वामिनी गृहकार्य में ब्यस्त होती थी , तो बिल्लियों की उस घर के दूध दही के बारे में ख़ुफ़िया जानकारी दे देता था। जिससे बिल्लियों का दूध दही का शिकार आसान हो जाता था।
एक दिन बिल्लियां दूध दही के शिकार में एक ग्रामीण के घर में घुसी। वह उन्हें दूध ताहि तो नहीं मिला लेकिन घी में चुपड़ी हुए एक दिखने में अति स्वादिष्ट रोटी मिली।
एक रोटी अब कौन खाये कौन उपवास रहे। यदि दोनों खाये तो कौन कितना खाये इस पर बिल्लियों में विवाद हो गया। विवाद जब ज्यादा बढ़ गया तो बिल्लियों ने विचार किया की क्यों न हम इस विवाद को ऐसे मित्र से सुलझाने का प्रयास करने जो हम दोनों की हितैषी हो। यह विचार कर  बिल्लियां रोटी लिए बन्दर के पास  गयी। बन्दर ने बिल्लियों से पास के गांव से एक तराजू लाने को कहा।  झट से बिल्लिया गांव के बनिए से नजर बचा कर उसकी तराजू उठा लायी।

झगड़ालू बिल्ली और धूर्त बन्दर


अब बन्दर ने रोटी में बिल्लियों के लिए हिस्सा लगाना शुरू किया। बन्दर ने रोटी को दो भाग में तोड़ा  और तराजू के दोनों पलड़ो पर रख दिया।  तराजू के दोनों पलड़ो पर आसमान रोटी का भार होने से तुला संतुलित नहीं था। तुला को संतुलित करने के लिए बन्दर अधिक वजन वाले रोटी के टुकड़े से रोटी तोडता  और अपने मुंह में रख लेता।  उसके ऐसा करने से दूसरा पलड़ा भारी हो जाता।  अब बन्दर इस पलड़े से रोटी के टुकड़े में से कुछ टुकड़े तोडता और खा लेता। ऐसा करते करते बन्दर सारी  रोटी के टुकड़े खा गया अब तराजू के पलड़े भी संतुलित थे। बिल्लियों के आपस में झगड़ने से बन्दर को लाभ हो गया और बिल्लियां रही।
कहानी का भावार्थ :->
जब  हम आपस में लड़ते हैं तो फ़ायदा हमें नहीं होता , हमारे आपस में कलह से दूसरे को लाभ हो जाता है। अतः छोटे छोटे लाभ के लिए हमें आपस में नहीं लड़ना चाहिए।   

शनिवार, 2 जुलाई 2016

चालक खरगोश और मुर्ख सिंह

चालक खरगोश और मुर्ख सिंह - Clever Rabbit and Foolish Lion

एक जंगल में एक खूंखार सिंह रहता था।  वह अपने भूख की जरुरत से ज्यादा जानवरों की शिकार कर दिया करता था। जंगल में दूसरे जानवरों की संख्या कम होने लगी थी। सिंह के इस व्यवहार से जंगल के सभी जानवर बहुत दुखी थे। एक चतुर सियार के मध्यस्थता में उन्होंने सिंह के साथ एक बैठक बुलाई।

सिंह से सारे जानवरों ने निवेदन किया कि आप बिना जरुरत के निर्दोष जानवरों को न मारा करें। हम लोग आपकी सेवा में रोज एक जानवर भेज दिया करेंगे। ऐसे आपको अपने क्षुधा तृप्ति के लिए परिश्रम भी नहीं करना पड़ेगा। सिंह ने जानवरों के इस प्रस्ताव को मान लिया। लेकिन शर्त रखा कि जिस दिन तुम्हारे तरफ से कोई जानवर मेरे सेवा में नहीं भेजा गया उसदिन मैं और खूंखार हो जाऊंगा और ये संधि तोड़ दूंगा। सिंह  के  इस बात को सुनकर सभी जानवर उसे आश्वस्त किये की आप निश्चिन्त रहिेए आपकी   सेवा में रोज एक जानवर जायेगा.

अब जानवरों के वादे के अनुसार सिंह  के पास रोज एक एक जानवर भेजा जाने लगा। एक दिन खरगोश की बारी आई।  खरगोश देखने में छोटा था लेकिन था चालक। उसने जानवरों से विदा लेतेहुए  कहा कि आप सभी के इस दुःख से मैं छुटकारा दिलाने का प्रयास करूँगा।

खरगोश समय से घर से निकला लेकिन रश्ते में एक पेड़ की घनी छांव में आकर सो गया। सोकर उठने के बाद वो ऊंघता हुआ सिंह के पास जाने को तैयार हुआ। सिंह ने जब खरगोश को लेट से अपने तरफ आते देख तो निश्चय किया की मैं अपना प्राण तोड़ दूंगा और सारे जानवरों को मार दूंगा। खरगोश सिंह के पास पहुंचा।  सिंह ने उससे विलम्ब से आने का कारण पूछा इसपर खरगोश ने जबाब दिया.

महाराज ! क्षमा करें मैं घर से समय  से पहले निकला था। मार्ग में एक दूसरा सिंह मिल गया और मुझसे पूछने लगा की तुम कहा जा रहे हो। मैंने कहा कि में अपने स्वामी जंगल के  महाराज सिंह की सेवा में जा रहा हूँ।  इसपर उसने ब्यंग से हसते हुए कहा कौन जंगल का राजा। जंगल का  राजा मैं हूँ। किसी   तरह जान बचा के मैं आपके पास आया हूँ। उसकी बात सुनकर सिंह बौखला गया। उसने कहा दूसरा सिंह कहा है चले उसके पास।


अब खरगोश उसे एक कुँए के पास ले गया। खरगोश ने कहा की इस सिंह ने मुझे रुकने को कहा तथा और भोजन के पहले कुँए में स्नान करने के लिए गया है।  सिंह ने कुँए में झांककर देखा। सिंह को कुँए में अपना प्रतिबिम्ब दिखाई दिया। अब सिंह को लगने लगा की कुँए में सिंह है। उसे देख कर सिंह ने जोर से गर्जना की। बदले में कुँए से सिंह की अपनी प्रति ध्वनि सुनाई दी।  अब सिंह ने उसे युद्ध के लिए पास आने को ललकारा तब उसे  प्रतिध्वनि में कुँए से पास आने को ललकारने  की प्रतिध्वनि सुनाई दी। अब सिंह को पूरा यकीन हो गया की कुँए में सिंह है। वो झट  से कुँए मे कूद पड़ा।

अब जंगल के सारे जानवरों को क्रूर आतंकी सिंह से मुक्ति मिल गयी थी।

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