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शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

तीन साधु, प्रेम धन और सफलता - Three Sage

तीन साधु, प्रेम धन और सफलता

एक स्त्री के दरवाजे के बाहर तीन साधु बैठे थे। स्त्री अपने घर से निकली उसने अपने दरवाजे पर सफ़ेद लंबे दाढ़ी वाले तीनो साधुओं को बैठे देख। उत्सुकता बस साधुओं में नजदीक जाकर बोली। आप लोग मेरे दरवाजे के पास  क्यों बैठें हैं ?
साधू बोले हम सन्यासी हैं और भूखे हैं तुम्हारे घर भोजन करना चाहते हैं। स्त्री ने साधुओं के मुख से ऐसा सुनकर उन्हें भोजन करना अपना सौभाग्य समझा। स्त्री बोली आप मेरे घर के अंदर आ जाईये मैं आप तीनों को भोजन करातीं हूँ। स्त्री की बात सुन तीनों साधू उसके घर की भीतर जाने के लिए खड़े हुए। साधुओं ने पूछा तुम्हारे घर पर कौन कौन है। स्त्री ने जबाब दिया इस समय मई अकेली हूँ मेरे पति बाजार गए हैं। स्त्री से ऐसा सुनकर साधू लौट पड़े। उन्होंने कहा कि तुम्हारे घर  कोई पुरुष सदस्य नहीं है जो हमारा सत्कार कर सके अतः हम जा रहे हैं तूम्हारे घर  भोजन ग्रहण नहीं कर सकते।

तीनो साधू अभी कुछ ही दूर गए थे की स्त्री का पति आ गया। स्त्री ने पति से शीघ्र तीनो साधुओं की कहानी बता दी। पति ने कहा की द्वार से कोई साधू भूखा जाये ये गृहस्थ के लिए ठीक नहीं।  तुम तीनों सन्यासियों को शीघ्र बुलाओ.
पति की बात सुनकर पत्नी साधुओं की खोज में चल पड़ी। कुछ दूर चलने पर तीनो सन्यासी जाते हुए दिखे. स्त्री ने आवाज लगायी और तीनो साधू रुक गए।  स्त्री ने उनके समीप पहुंच कर कहा की मेरे पति घर आ गए हैं आप लोग चलकर भोजन  कर सकते हैं।
स्त्री से ऐसा सुनाने पर साधुओं ने कहा की हम तीन साधू एक साथ किसी के घर नहीं जा सकते बल्कि बारी बारी से जाते हैं भोजन के निमित्त। हम तीनो का नाम प्रेम धन और सफलता है। तुम बताओ तीनो में से पहले किसको जिमाना चाहोगी अपने घर। 
सन्यासियों से ऐसा सुनकर स्त्री अपने पति के पास आकर बोली हम किस साधु को पहले भोजन के लिए बुलाएँ।
पति ने जबाब दिया धन को पहले बुला लो धन के आ जाने से हमारी दरिद्रता सदा के लिए दूर हो जाएगी और हम सुखी हो जायेगे।
पत्नी ने कहा की क्यों न हम सफलता को बुलाये। सफलता के आ जाने से हमारे सारे काम सफल होंगे और निर्धनता भी दूर हो जाएगी।
दोनों पति पत्नी में आपसी सहमति नहीं बन पायी की किसको पहले बुलाया जाय। हारकर दोनों ने कहा की चलो बोलते हैं धन और सफलता नाम के साधू में से जिसका मन हो पहले वही हमारे घर भोजन करे.
उन दोनों के मुख से ये बात सुनकर तीनो साधु जाने लगे। स्त्री ने उन लोगों को रोकते हुए कहा. आप लोग सुनते क्यों नहीं।
इसपर एक साधु ने जबाब दिया।
देवी ये सही है की हम तीनो किसी के घर एक साथ नहीं जाते लेकिन जो कोई ज्ञानी ब्यक्ति सबसे पहले प्रेम को भोजन के लिए निमंत्रण देता है। पीछे से सफलता और धन दोनों क्रमशः आ जाते हैं लेकिन। लेकिन धन और सफलता को पहले बुलाने वाले के घर हममे से कोई भोजन के लिए नहीं जाता।

जहा प्रेम को जगह मिलता है धन और सफलता स्वतः पहुँच जाते हैं 

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

Do mitra aur bhaalu - Bear and two friends


दो मित्र और भालू
दो मित्र थे दोनों में काफी घनिष्ठता थी। दोनों को एक दिन शहर से कुछ समान खरीदने जाना था। गावँ से शहर का रास्ता एक घने जंगल से होकर जाता था। जंगल में हिंसक जानवर रहते थे। अतः जंगल का रास्ता सुगम नहीं था। दोनों मित्रों ने साथ साथ शहर जाने का निश्चय किया और प्रण किया की किसी भी संकट की स्थिति में एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ेंगे और हर विषम परिस्थिति का मिलकर सामना करेंगे। 

वे दोनों आपस में बातें करते हुए जंगल के रास्ते जा रहे थे तभी उनके सामेन एक जंगली भालू जाते दिखा। दोनों भालू को तो देख लिए थे लेकिन भालू उन दोनों को अभी नहीं देख पाया  था। उन दोनों की भालू से दुरी काफी कम थी अतः भालू का उनके पास आने का खतरा था।  तुरंत पहला मित्र जो फुर्तीला था तेज दौड़ता था दौड़ कर नजदीक के एक पेड़ पर चढ़ गया। लेकिन दूसरा मित्र जो थोड़ा शरीर से भारी था तेज नहीं दौड़ सकता था और उसे पेड़ पर भी चढ़ने नहीं आता था। उसने अपने दिमाग का उपयोग किया और जमीन पर मृतवत लेट जाने का विचार किया। दूसरा मित्र विपत्ति में संयम से काम लेकर सांस रोककर जमीन पर मुर्दे की तरह लेट गया।
संयोग बस भालू उसी रास्ते से आने लगा। जमीन पर लेते हुए आदमी के पास गया और वो उसे सूंघने लगा। लेटे हुए मित्र के कान के पास सूंघते हुए भालू को लगा की यह ब्यक्ति निष्प्राण है।  अतः वह उसे छोड़कर चला गया। जैसा की हम जानते है भालू मृत प्राणी का मांस नहीं खाते।

भालू के जाने के बाद पहला मित्र पेड़ से उतरा। जब वह पेड़ पर बैठा था तो भालू को अपने मित्र के कान में कुछ कहते हुए देखा था। पहले मित्र ने जमीन पर लेटे हुए मित्र के पास जाकर पूछ- भालू तुम्हारे कान में क्या कह रहा था। दूसरे मित्र नई अपने कपटी मित्र को जबाब दिया।  भालू बोल रहा था - प्यारे कभी भी किसी झूठे मित्र पर विश्वास नहीं करना।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

Tanaw Mukti ke Upaya - Just go of Your Stress


एक बार तनाव मुक्ति के उपाय के आयोजित क्लास में छात्रों में सम्मुख मनोविज्ञान की एक शिक्षिका उपस्थित हुई। वो अपने हाथ में एक  पानी का गिलास लिए हुए कड़ी थी जिसमे कुछ पानी था। उनके हाथ में पानी का ग्लास देख कर सभी छात्रों को इसके बारे में जानने की उत्सुकता हुई।  सभी छात्र अनुमान  लगा रहे थे की शिक्षिका "पानी का गिलास आधा भरा है या गिलास आधा खली है " के सम्बन्ध में प्रश्न पूछेंगी।  लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने एक मुस्कराहट के साथ सभी छात्रों से पूछा की पानी सहित गिलास कितना भारी है।
छात्र समूह से इस प्रश्न के कई उत्तर आये। छात्रों ने ८०० ग्राम से १५०० ग्राम तक पानी सहित गिलास का अनुमानित भर बताया।

छात्रों से जबाब सुनने के बाद शिक्षिका ने सहजता से जबाब दिया। गिलास के पानी का पूर्ण भार यहाँ मायने नहीं रखता।  यह इस बात पर निर्भर करता है की कितनी देर मैं इसे अपने हाथ से उठाये रखती हूँ। अगर मैं इसे कुछ मिनट तक उठाये रखती हूँ तो इसका वजन हमारे लिए कोई समस्या नहीं है। अगर मैं इसे एक घंटे तक उठाये रखती हूँ तो मेरा हाथ दर्द करने लगेगा। अगर मैं इसे पुरे दिन उठाये रखूं तो मेरा हाथ सुन्न  हो जायेगा और लकवाग्रस्त जैसा हो जायेगा। प्रय्तेक स्थिति में गिलास का वजन नहीं बदलता लेकिन लंबे समय तक इसे धारण करने से यह हमारे लिए भारी और धारण करने में दुष्कर प्रतीत होने लगता है।

मनोविज्ञान की शिक्षिका ने अपनी अपनी बात जारी रखते हुए कहा  जीवन में तनाव और चिंताएं पानी के इस गिलास की तरह हैं।  अगर  इनके प्रति कुछ क्षण के लिए सोचा जाये तो कुछ नहीं होता ये हमारा कुछ नहीं बिगाड़तीं। इनके प्रति  हम कुछ देर के लिए सोचते हैं तो ये हमें तकलीफ पहुँचाने लगतीं हैं। अगर हम इन तनाव और चिंताओं के प्रति दिन भर सोचने लगे तो ये हमारे मन और शरीर दोनों को लकवाग्रस्त कर देतीं हैं  और हम कुछ रचनात्मक करने की क्षमता खो बैठतें हैं।

अतः यह याद रखना आवश्यक है की हम तनाव को कुछ  क्षण से ज्यादा अपने पास नहीं टिकने दें। हमें चाहिए की दिन भर के भाग दौर की दिनचर्या में आये हुए तनाव को शाम को जितना जल्दी हो सके झटक कर फ़ेंक दें। जिससे आप रात तनाव रहित मष्तिस्क से निद्रा का  लाभ ले सकें।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

Guilty Mind is Always Suspicious - Chor ki Dadhi me Tinka

चोर की दाढ़ी में तिनका - अपराधी स्वयं सशंकित रहता है

एक बार की बात है दक्षिण भारत में कृष्णदेव नाम के राजा राज करते थे।   वे बहुत ही न्याय प्रिय थे। प्रजा को न्याय मिले और दोषी को सजा मिले इसके लिए वो सदैव तत्पर रहते थे। कानून की पेचीदगी से किसी निर्दोष को सजा न मिल जाये इसके लिए वो सर्वदा प्रयासरत रहते थे। कई बार तो वेश बदलकर वो राज्य से रात  में बहार निकल जाया करते थे सचाई का पता लगाने के लिए।
एक बार उनके राजदरबार से एक कीमती स्वर्ण जड़ित आसानी की चोरी हो गयी। राजा ने सभी दरबारियों का दरबार बुलाया और चोरी किये गए आसन और चोर का पता  लगाने को कहा। दरबारियों ने राजा को आश्वस्त कर सभा को स्थगित की। राजा अपने दरबारियों से ही इस समस्या का हल चाहते थे।  वो देखना चाहते थे की किस कुसलता से हमारे दरबारी काम करते हैं। राजा कृष्णदेव चाहते थे की  उनकी तरह उनके दरबार के कर्मचारी भी अपने कर्म निष्ठा से करें।
दरबार की दो बैठक बीत जाने पर भी चोरी का पता नहीं लग सका तो राजा ने अपने स्तर पर प्रयास करने का निश्चय किया।
राजा को पता था की राजदरबार से हुई स्वर्ण जड़ित बैठने के आसनी  की चोरी किसी दरबारी ने  ही की है।
राजा कृष्णदेव ने सभी दरबारियों को सामान लंबाई की एक एक छड़ी दी और कहा की जो आसन चुराया होगा उसकी छड़ी कल सुबह एक फ़ीट बढ़ जाएगी।  कल इस छड़ी को आप सभी को लेकर राजदरबार में उपस्थित होना है। राजा ने यह कह कर सभा स्थगित किया।  सभी दरबारी अपने अपने छड़ी के साथ राजदरबार से अपने अपने घर वापस होने लगे।  दरबारियों में उत्सुकता थी की छड़ी कैसे १ फ़ीट बढ़ जाती है और चोर किस तरह पकड़ा जाता है।

इधर आसान चुराने वाला दरबारी भी दरबार में आया था। उसने राजा को कोसते हुए कहा देखते है वो इस छड़ी के माध्यम से चोर राजा कृष्ण देव को कैसे ढूंढ पाते हैं। चोर की भी चौरासी बुद्धि होती है।
अगले दिन सभी दरबारी दरबार में अपने अपने छड़ी के साथ पहुंचे। सभी दरबारी उत्सुकता  के मारे अपने अपने धैर्य खो रहे थे। सभी दरबारियों को अपनी अपनी छड़ी अपने सामने रखने को कहा गया जिससे राजा की दृष्टि छड़ी पर पड़े।
राजा ने देखा की सभी छड़ियों में से एक छड़ी छोटी दिख रही है। राजा को चोर को पकड़ते देर नहीं लगी। चोर दरबारी ने अपने छड़ी को १ फ़ीट काट कर छोटा कर लिया था।

राजा की बुद्धिमानी से चोर पकड़ा गया। 

इसे कहते है चोर की दाढ़ी में तिनका "यानी अपराधी स्वयं ससंकित रहता है"।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

Four Candles and the Ray of Hope

चार मोमबतियां और आशा की किरण

एक कमरे में चार मोमबत्तियां जल रही थीं।  शान्ति विश्वास प्रेम और आशा नाम की मोमबत्तियों के रौशनी से कमर प्रकाशित हो रहा था।
कुछ देर बाद पहली मोमबत्ती "शान्ति " बोली मैं अब और ज्यादा नहीं जल सकती।  मुझे मानव द्वारा फैलाये गए अशांति ने इतना बाध्य कर दिया है की मेरा मन घुट रहा है।  मैं अब और ज्यादा नहीं जल सकती ऐसा कहते हुए वो अपने सखियों विश्वास प्रेम और आशा से विदा ले ली। पहली मोमबत्ती शांति बूझ गयी।
कुछ देर बाद दूसरी मोमबत्ती "विश्वास"  बोली। चरों तरफ फैले झूठ और अविश्वास के कारण  मेरा भी कोई कोई आस्तित्व नहीं रह गया है।  लोगों को एक दूसरे पर विश्वास ही नहीं। ऐसे में मेरे यहाँ रहने से क्या फायदा। मैं भी जा रही हूँ यह कह कर दूसरी मोमबत्ती विश्वास भी बुझ गयी।

शान्ति और विश्वास नाम की मोमबत्तियों को जाने के बाद तीसरी मोमबत्ती दुखी स्वर में बोली। मेरा नाम "प्रेम" है। मेरे पास जलते रहने की ताकत है लेकिन आज की भाग दौड़ की जिंदगी में किसी को प्रेम करने के लिए वक्त ही नहीं है। लोगों से गैरों से प्रेम करने की अपेक्षा क्या करें, लोग अपनों से भी प्रेम करना भूलते जा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में मेरा यहाँ जलते रहने का मन नहीं करता। घुटन सी हो रही है यह कहते हुए वह तीसरी मोमबत्ती भी चली गयी।
तीसरी मोमबत्त्ती बुझी ही थी की उस कमरे में एक भोला भाला एक लड़का प्रवेश किया।

मोमबत्तियों को बुझा देखकर वह बहुत परेशान हुआ। उसने मोमबत्तियों से असमय बुझने का कारण जानना चाहा।  उसने रोतो हुए मोमबत्तियों से पूछा तुम्हे तो अभी जलना था।  तुमलोग बीच में अभी मुझे क्यों छोड़ कर चली जा रही हो। मुझे अपने बुझने का कारण बताओ।
तभी चौथी मोमबत्ती बोली प्यारे बच्चे घबराओं नहीं।  मेरा नाम "आशा" हैं  मैं जबतक जलती रहूंगी तुम्हे आशा की किरण कमरे में बिखरी पड़ी मिलेंगी। इस आशा के बल पर तुम बाकी बुझी हुई मोमबत्तियों को जला सकते हो।
"आशा" से यह बात सुनकर लड़का अति प्रसन्न हुआ उसने आशा मोमबत्त्ती के शहर शान्ति विश्वास और प्रेम नाम की मोमबत्तियों को पुनः प्रकाशित कर दिया।

अतः कहा गया है की  लाख विपत्ति आने पर भी हमें आशा नहीं छोड़नी चाहिए। आप पर  घोर विपत्ति आने पर भी  आशा रूपी एक दीपक भगवान हरदम प्रज्ज्वलित रखता है। जरुरत है इस आशा रूपी दीपक से अपने जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों को दुबारा प्रकाशित करने की 

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

जादुई खिड़की - The Magic Window


एक बार की बात है एक छोटा लड़का था। एक बार बीमारी से वह बहुत कमजोर हो गया। वह चलने फिरने में असमर्थ हो गया उसे सारा दिन बिस्तर पर आराम कर बिताना पड़ता था। इसके कारण दूसरे बच्चे उसके पास नहीं आते थे अतः वह बहुत  अकेला महसूस करता था और उदास भी रहता था।
वह खिड़की से बाहर खेलते हुए अपने मित्रों को देखने के सिवा कुछ नहीं कर  सकता था। समय गुजरता गया और उसके एकाकीपन का अहसास बढ़ता गया। एक दिन वह खिड़की में एक अजीब आकार देखा। एक पेंगुइन सैंडविच खा रही थी। पेंगुइन खुली खिड़की से अंदर आयी और लड़के को गुड आफ्टरनून बोल कर फिर बहार चली गयी।

बेशक, लड़का बहुत हैरान था। वह अभी भी जानने की कोशिश कर रहा था कि क्या हुआ है।
जब उसने खिड़की के बाहर लंगोट में एक बंदर को देखा, जो एक गुब्बारा उड़ाने में व्यस्त था। सबसे पहले लड़का खुद से पूछा कि क्या संभव हो सकता है, लेकिन कुछ समय के बाद, अधिक से अधिक पागल दिखने वाले पात्र के रूप में एक चरित्र खिड़की के बाहर दिखाई दिया, वह फुट फुट कर हँस पड़ा और उसको हंसी रोकना मुश्किल हो रहा था।
एक सूअर को डफ खेलता देख कोई भी अपनी हंसी को रोक पाने में असमर्थ है। ठीक उसी तरह यदि ट्रैम्पोलिन पर एक हाथी कूद रहा हो या कुत्ता चश्मा पहन के राजनीती की बात कर रहा हो कोई अपनी हंसी नहीं रोक सकता।  छोटा लड़का इस बारे में किसी को भी नहीं बताया, क्योंकि किसी को भी उसके बात पर विश्वास नहीं होता। जबकि वो अद्भुत चरित्र अपने अभिनय से उस लड़के के  ह्रदय और शरीर दोनों रोमांचित कर दिए थे इस घटना को उसे  किसी से बताने की हिम्मत नहीं हो रही थी। लंबे समय बाद उसका शरीर और स्वस्थ में सुधार हुआ जिससे वह फिर से स्कूल जाने में समर्थ हो सका।

वहां उसे अपने मित्रों से बातचीत करने का अवसर मिला, वह उन्हें अपने द्वारा देखी गयी अद्भुत  चीज़ों की कहानी सुनाता था।  वह जब अपने सबसे अच्छा दोस्त से बात कर रहा था तभी वह अपने दोस्तों के स्कूल बैग से कुछ चिपके हुए देखा। लड़का अपने दोस्त से पूछा कि यह क्या है , और वह इतना आग्रहपूर्ण तरीके से पूछा कि आखिर उसके दोस्त को बैग में क्या था दिखाना पड़ा।

वहाँ, उनके बैग के अंदर, सभी फैंसी पोशाक सूट थे।  जिन्हें पहन कर अलग अलग रूप धर छोटे लड़के को खुश करने की कोशिश में उसके सबसे अच्छे दोस्त उपयोग किया करते  थे।

 और उस दिन से, वह छोटा लड़का यह प्रयास किया कि कोई भी दु: खी और अकेला महसूस नहीं करे !

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

Believe in Yourself



अपने आप में विश्वास रखे 

ऐसा भी दिन हो सकता है कि आप सुबह उठो और चीजें जिस तरह से आपने की उम्मीद थी, वे वैसी नहीं रहे।
तब आपको खुद को बताने की जरुरत है की सबकुछ आपके अनुकूल हो जायेगा। कभी कभी ऐसा समय आता है की लोग आपको निराश करते हैं और आपके विकास में बाधक बनते हैं।
यही समय होता है की आप अपने आप को याद दिलाएं और स्वयं पर भरोसा करें। आपके खुद के निर्णय और राय आपको निराशा से उबरने के लिए पर्याप्त है और आपको एक सफल व्यक्ति बनाता
है।
जीवन में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और बहुत  से परिवर्तन से गुजरना पड़ सकता है। यह आप पर निर्भर करता है की आप कितने दक्षता से उन चुनौतियों को स्वीकार करते हैं।
हमेशा अपने आप  को सही दिशा में अग्रसर होने दें। इस प्रगति के पथ पर हमेशा समय अनुकूल नहीं मिलेगा, लेकिन हाँ वो प्रतिकूल समय के साथ आप का किया गया संघर्ष आपको अपनी सही पहचान करने के लिए पर्याप्त होगा।

अतः जब ऐसा समय आये की आप के जीवन का कोई पल हताशा और अप्रत्याशित जिम्मेदारियों से भरा है। आप ऐसे समय में अपने आप में विश्वास और दृढ निश्चय रखे आप जो चाहते थे वही होगा

सोमवार, 1 अगस्त 2016

जीवन के वर्तमान क्षण का आनंद ले - Enjoy the Life Present Moment


एक बार समुद्र के किनार एक मछुआरा बैठा हुआ था। वह पेड़ की छावँ में बैठ कर बीड़ी पी  रहा था। रास्ते से गुजरते हुए एक धनी व्यवसायी ने उससे पूछा की तुम पेड़  ने नीचे बैठ कर बीड़ी क्यों पी  रहे हो कुछ करते क्यों नहीं। यह सुनकर मछुआरे ने जबाब दिया आज के लिए उसने ज्यादा मछलियां पकड़ ली हैं।
यह सुनकर वह धनि व्यक्ति क्रोधित हो गया और कहा। तुम पेड़  के नीचे बैठ कर अपने समय बर्बाद करने के बजाय और मछलिया क्यों नहीं पकड़ते।

मछुआरे ने पूछा : ज्यादा मछलियां पकड़  कर मैं क्या करूँगा ?
व्यपारी : तुम ज्यादा मछलियां पकड़ोगे तो उन्हें बेचकर ज्यादा पैसे कमाओगे, और  एक बड़ी नाव खरीद लोगे।
मछुआरा : तब मैं  क्या करूँगा ?
व्यपारी: तुम और भी अधिक मछलियों को पकड़ने के लिए गहरे पानी में जा सकते हो साथ ही और भी अधिक पैसा कमा सकते हो।
मछुआरा : तब मैं  क्या करूँगा ?
व्यपारी: तुम बहुत सारे नाव खरीद सकते हो और अपने यहाँ बहुत लोगों को काम पर रख सकते हो और ज्यादा पैसे कमा  सकते हो।
मछुआरा : तब मैं  क्या करूँगा ?
व्यपारी: तुम मेरे जैसे एक अमीर व्यापारी बन सकता है।
मछुआरा : तब मैं  क्या करूँगा ?
व्यपारी: तब तुम अपने जीवन शांति से सुखपूर्वक जी सकते हो।
मछुआरा : तो क्या मैं अभी सुखपूर्वक नहीं जी रहा हूँ ?

नैतिक शिक्षा : आपको खुस रहने के लिए और जीवन का आनंद लेने के लिए कल का इन्तजार नहीं करना चाहिए। जीवन में खुश रहने के लिए आपका ज्यादा धनिक होना ज्यादा ताकतवर होना कोई जरुरी नहीं है। जीवन के इसी वर्तमान  क्षण में खुश रहना सीखें।

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