सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

राजू नाम का लड़का और धनी सेठ

राजू नाम लड़का एक धनी सेठ के यह काम करता था। लड़का बहुत मातृ भक्त था। वह अपने माँ से पूछ कर ही सब काम करता था। वह किसी बात के निर्णय के लिए अपने बुद्धि का प्रयोग नहीं करता था। अर्थात  उसमे प्रतिउत्पन्न मतित्व की कमी थी।

एक बार सेठ ने लड़के को मजदूरी में पैसे दिए। राजू पैसे हाथ में लिए सिक्कों को उछालते हुए घर पहुँचा। उछालने से बहुत से सिक्के रास्त में खो गए।  बच्चे खुचे सिक्कों के साथ घर पहुँचा तो माँ ने राजू से उदासी का कारन पूछा।  राजू ने बताया की सेठ ने मुझे दस सिक्के दिए थे लेकिन कुछ सिक्के रास्ते में गिर गए। माँ ने उसे समझते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा अब सेठ कोई भी चीज दे तो उसे जेब में रख कर लाना।
कुछ दिन बाद सेठ की गाय ने बछड़े को जन्म दिया। सेठ ने राजू को कहा की आज तुम गाय का दूध लेते जाना। राजू ने माँ के कहे अनुसार दूध जेब में रख लिया। जेब में दूध रखने से सारा दूध निचे गिर गया। उदास होकर राजू जब घर पहुँचा तो माँ ने उसे समझते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा अब से तुम जो कोई सामान लाना बाल्टी में लाना। मैं तुम्हे ये बाल्टी देती हूँ इसे अपने साथ ले जाना सेठ जब भी कोई सामान दे इसमें रख लेना।

राजू के सेठ के यहाँ मुर्गा बहुत हो गए थे।  सेठ ने सोचा क्यों न राजू को एक मुर्गा दे दूँ। सेठ ने राजू से कहा राजू शाम को जाते समय एक मुर्गा लेते जाना। राजू मुर्गा पाकर बहुत खुश  हुआ वह मुर्गे को अपने बाल्टी में रख कर अपने घर चला। कुछ दूर जाने के बाद मुर्गा बाल्टी में से उड़कर पेड़ पर बैठ गया। राजू चाहकर भी मुर्गे को नहीं पकड़ सका। उदास राजू खाली हाथ घर लौट गया।

इस कहानी का सारांश यह है की हमें समयानुसार अपने दिमाग से निर्णय लेना चाहिए।        

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ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है, बेईमान ग्वाला

एक दूधवाला बेईमानी का सहारा लेकर बहुत अमीर बन गया। उसे शहर जाने के लिए रोज रास्ते में एक नदी  पार करनी पड़ती थी। शहर में उसके ग्राहक रहते थे और वह रोज शहर जाकर अपने ग्राहकों को दूध देता था। नदी पार करने के लिए वह रोज अपने दूध के बर्तन के साथ नाव पर बैठ जाता था। नदी पार करते हुए वह दूध के बर्तन का मुह खोल कर दूध में पानी मिला लेता था। लाभ कमाने के लिए वह रोज इसी तरह दूध में पानी मिला देता था और ऐसा करके वह अच्छा लाभ कमाने लगा। एक दिन वह अपने बेटे के शादी का जश्न मानाने के लिए ग्राहकों से देय राशि वसूलने के लिए वह शहर गया।

इस प्रकार एकत्र बड़ी राशि से , वह सुन्दर कपड़े और शानदार सोने के गहने खरीदा।  अपने घर जाते समय जब वह नदी पर कर रहा था थो नाव नदी में डूब गयी। दूधवाला तैरना जनता था वह तैर कर नदी के किनारे पहुँच गया लेकिन उसके सभी कीमती कपडे नदी के तेज धार में बह गए। शानदार चमकते सोने के गहने नदी में डूब गए और वह चाह कर भी उन्हें नहीं बचा सका। दूध विक्रेता के दु:ख से अवाक था। उस समय वह नदी से एक आवाज सुना, "मत रोवो जो तुमने खोया है वह तुम्हारे ग्राहकों से अवैध रूप से कमाया हुआ लाभ ही है" तुम रोज अपने ग्राहकों के दूध में लाभ के लिए पानी मिलाया करते थे। आज पानी का पैसा पानी में मिल गया है इससे तुम दुखी क्यों हो रहे हो।  

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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

धनतेरस की कहानी - धनत्रयोदशी २०१६ २८ अक्टूबर शुक्रवार


धनतेरस धनत्रयोदशी पांच दिन तक चलने वाले दिवाली उत्सव का पहला दिन है। इस त्यौहार को धनत्रयोदशी या धनवन्तरि त्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। यह हिन्दू पंचांग( "calender") के कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष (२०१६) को धनतेरस  का त्यौहार २८ अक्टूबर दिन शुक्रवार  को है।

धनतेरस के अवसर पर धनवन्तरि की पूजा की जाती है।  धनवंतरी को सभी चिकित्सकों का शिक्षक और आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है।

इस उत्सव की विशेषता ->

धनतेरस धन के साथ जुड़ गया है और लोग इस दिन सोने या चांदी के गहने और बर्तन आदि खरीदते है,  हालांकि धनवन्तरि का धन और सोने का साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। धन्वंतरी धन के बजाय एक अच्छे स्वास्थ्य के प्रदाता है। 

धनतेरस से सम्बंधित कहानी 
धनतेरस  की कहानी

इस बारे में एक प्राचीन कथा में राजा हिमा के 16 वर्षीय बेटे के एक दिलचस्प कहानी  का वर्णन है। उसकी कुंडली ने शादी के चौथे दिन सांप के काटने से उसकी मौत की भविष्यवाणी की। उस विशेष दिन पर, उसकी नवविवाहिता  पत्नी ने उसे सोने के लिए अनुमति नहीं दी। एक ढेर में वह अपने सारे गहने और सोने और चांदी के सिक्कों को शयन कक्ष के बहार रख दी और सभी जगह पर दीपक जला दीया। फिर वह अपने पति को जगाये रखने के लिए पूरी रात कहानिया सुनाई और गीत गाती रही। जब मृत्यु के देवता यम एक नागिन की भेष में राजकुमार के दरवाजे पर पहुंचे, उनकी आँखें  लैंप और आभूषण की चमक से अंधी हो गयी। यम राजकुमार के कक्ष में प्रवेश नहीं कर सके, तो वह सोने के सिक्कों की ढेर के शीर्ष पर चढ़ गए। यमराज साँप के रूप में पूरी रात वहाँ बैठे कहानियों और गीतों को सुनते रहे, और सुबह होने पर , वह चुपचाप चले गए। इस प्रकार, युवा राजकुमार अपनी नई दुल्हन की चतुराई से मौत के चंगुल से बच पाया था। तब से यह दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा। इससे अगला दिन नरक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन यमदिपोदान के रूप में मनाया जाता है, घर की महिलाएं मिटटी के दिए जलती हैं, और यह दिया मृत्यु के देवता यम को प्रसन्न करने के लिए पूरी रात जलता रहता है। चुकी यह दिवाली से एक दिन पहले  मनाया जाता है अतः इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है  


एक अन्य लोकप्रिय पौराणिक कथा के अनुसार , जब देवताओं और राक्षसों ने मिलकर अमृत के लिए समुद्र मंथन किया तो, धनवंतरी (देवताओं के चिकित्सक और विष्णु  के अंश अवतार) धनतेरस के दिन अमृत का घड़ा ले प्रकट हुए।
धनतेरस की तैयारी
धनतेरस के दिन, व्यावसायिक परिसर का जीर्णोद्धार किया जाता है और सजाया जाता है। धन और समृद्धि की देवी के स्वागत के लिए प्रवेश द्वार को लालटेन और रंगोली डिजाइन के पारंपरिक रूपांकनों के साथ रंगीन बनाया जा ता है। देवी लक्ष्मी के लंबे समय से प्रतीक्षित आगमन का संकेत करने के लिए, छोटे पैरों के निशान, चावल का आटा और सिंदूर पाउडर से सभी घरों पर अंकित किया जाता है। पूरी रात दीपक जलाये जाते हैं।  



उत्सव समारोह
धनतेरस का त्यौहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। संध्या को लक्ष्मी पूजा होती है और अंधकार तथा बुरी आत्माओं को दूर भागने के लिए  मिटटी के दिए जलाये जाते हैं। देवी लक्ष्मी की प्रशंसा में भक्ति गीत और भजन गाया जाता है। देवी को पारंपरिक मिठाइयों का "नैवेघ अर्पण" किया जाता है। महाराष्ट्र में हल्के से सूखा धनिया बीज( मराठी में धनत्रयोदशी के लिए धन)  और गुड़ को नैवेद्य के रूप में अर्पण करने की एक अद्भुत प्रथा है।


गांवों में मवेशियों  को सजाया जाता है और किसानों द्वारा उनकी पूजा की जाती है, क्योंकि वे उनकी आय का मुख्य स्रोत के रूप माने जाते हैं ।

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गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी - प्रतिक्रिया में व्यक्तिगत भिन्नता

प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी
प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। एक ही बात का विभिन्न व्यक्तियों पर पात्रता के आधार पर भिन्न प्रतिक्रिया होती है। इस कहानी में तीन पात्र हैं जिनपे एक ही बात का अलग अलग असर हुआ है।

पुराने समय में राजा बलदेव  राय  राजा राज करते थे। वो बहुत ज्ञानी , न्याय प्रिय और समाज शास्त्री भी थे। व्यक्ति  के स्वभाव को वो देख कर ही पहचान लेते थे। उनके नयन करने की प्रक्रिया बहुत निराली थी। एक बार राजा के दरबार में चार चोर पकड़ कर लाये गए। चारों  का अपराध था चोरी। अलग अलग जगहों पर चारो व्यक्तियों पर चोरी का आरोप था। राजा के सिपाही इन अभियुक्तों  को दरबार में पेश  किया थे। अपराध सिद्ध होने पर इनको सजा मिलनी थी या आरोप झूठ साबित होने पर ये चारो मुक्त हो सकते थे।


राजा के समक्ष जब एक एक कर इन चारों अभियुक्तों को पेश किया गया तो राजा ने इन सभी को अलग सजा सुनाया जबकि अपराध सबका सामान था। यह देख कर सभी दरबारी चकित थे।

१) पहले अभियुक्त को राजा ने सजा सुनाई ने के क्रम में सिर्फ इतना कहा , तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " वह अभियुक्त चला गया

२) दूसरे अभियुक्त को राजा के समकक्ष पेश किया गया -
राजा ने उस अभियुक्त को ऊपर से नीचे  तक देखा और सिपाहियों से कहा की इसे ले जाओ अपमानित मर के छोड़ दो। राजा के सैनिक उसे अपशब्द कहकर  छोड़ दिए।
३) अभियुक्त को राजा ने चार कोड़े मारकर  छोड़ देने को कहा। चार कोड़े खाकर तीसरा अभियुक्त चला गया।
४) अब राजा के समक्ष चौथा अभियुक्त पेश हुआ। राजा बलदेव राय  ने कुछ देर तक चोर की तरफ देखा और उसे सजा सुनाया। इस चोर को सजा सुनाया गया कि "इसका मुंडन कर गधे पे बिठा कर सारे नगर में घुमाव" नगर के बच्चे इसपर कूड़ा और गन्दगी फेंके और ताली बजाएं।

राजा ने सजा सुनाने के बाद चारो अभियुक्तो के पीछे एक एक गुप्तचर लगा दिया। जो सजा के बाद इनपर हुई प्रतिक्रिया के बारे में राजा को खबर देंगे।

पहले अभियुक्त का गुप्तचर राजा के समक्ष आया और राजा से अनुमति प्राप्त कर बोला। राजन आपने जिस चोर को "तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " कहा था। वह वास्तव में चोर नहीं था उसपर चोरी का झूठा इल्जाम लगा था। वह आपके इस वाक्य से इतना आहत का की घर जाकर जहर कहकर आत्महत्या कर लिया।

 थोड़ी देर बाद दूसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया। उसने दूसरे अभियुक्त के बारे में बताया। महाराज आपने जिस अभियुक्त  को अपमानित करके भेज दिया तथा वो भी चोर नहीं था चोर चोरी का धन इसके कुटिया के पास रखकर भाग गए थे, और ये निर्दोष  पकड़ा गया था। जब आपने उसे अपमानित करके भेजा  तो वह इतना लज्जित हुआ की लज्जा के मारे ये शहर ही छोड़ गया।

दूसरे दिन राज दरबार में तीसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया।  गुप्तचर ने बताया महाराज आपने जिस चोर को ४ कोड़े मारकर छोड़ दिया था वो भी चोर था लेकिन उसके चोरी के अपराध भी छोटे थे। उसने अपने परिवार के भरण पोषण के लिए सेठ के बाग़ से फल चुराए थे। आपके सजा की उसपर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है। अब ये प्रायश्चित के तौर पर उसी सेठ के यहाँ फलों की रखवाली कर रहा है और खुश है।

तभी चौथा गुप्तचर आया जो सज़ा के बाद चौथे चोर के गतिविधियों पर नजर रख रहा था। गुप्तचर ने कहा  महाराज जिस दिन उसको नगर में गधे पे बैठा कर घुमाया जा रहा था तब से मैं इसपर नजर रखा हूँ।
उसके  शरीर पर बच्चे मिटटी गोबर फ़ेंक रहे थे।  अपने घर से गुजरते हुए रस्ते में उसे  अपनी पत्नी दिख गयी। पत्नी को जोर से आवाज लगते हुए कहा घर पर पानी तैयार रखना अभी इन बच्चों को नगर घुमा के आ रहा हूँ।

राजा ने अपने दरबारियों से कहा इन चार अभियुक्तों पर होने वाली प्रतिक्रिया अलग अलग इसलिए हुई क्योंकि मेरे द्वारा दी गयी सजा को सबने अलग अलग तरीके से समझने की कोशिश  की।

किसी आदमी के स्वभाव को बदलने के लिए सजा का सख्त होना उतना जरूरी नहीं जितना की प्रतिक्रिया का असरदायी होना है। मैंने पहले अभियुक्त को सिर्फ इतना कहा की ये काम तुम्हारे लायक नहीं तो वह आत्महत्या कर लिया जबकि मुंडन कराकर गधे पर घुमाने वाले पर सजा को उतना असर नहीं हुआ यानि चोरी करना नहीं छोड़ा
एक ही अपराध में अभियुक्त थे चारो अपराधी, लेकिन चारों  पर प्रतिक्रिया भिन्न भिन्न हुई। अतः कहा गया है की प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। जब तक आपपर किसी बात की प्रतिक्रिया नहीं होती।

इस कहानी में असली चोर कौन था

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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर है

सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर है

भारत में प्राचीन काल में शिक्षा व्यवस्था बहुत ही सरल और सर्व सुलभ थी। कोई निर्धन व्यक्ति धनाभाव के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रहा। छात्र गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। भिक्षाटन से आश्रम कर खर्च चलता था।  एक दिन गुरु जी सत्य और असत्य के सन्दर्भ में छात्रों को शिक्षा दे रहे थे। गुरु जी ने छात्रों को बताया की सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। गुरु जी के मुख से ऐसा सुन कर कुछ छात्रों को आश्चर्य हुआ की यह  कैसे हो सकता है।

गुरु जी नई फिर समझाते हुए कहा कि सत्य ही ईश्वर है और सत्य बहुत बड़ा तथा व्यापक है। सत्य के बोध के लिए सत्य के व्यापक स्वरुप को जिसने अनुभव नहीं किया वह सत्य के यथार्थ को नहीं जान सकता।  छात्रों का संशय अब भी नहीं दूर हुआ।


गुरु जी अब सभी छात्रों को हथिसार में ले गए जहा एक हाथी बंधा था। अब गुरु जी ने चार छात्रों को चुना जिन्हें ज्यादा संशय था, और उनके आँख बंधवा दिए। अब एक एक छात्र से हाथी के शरीर के एक एक भाग का स्पर्श कराया गया। और उनसे पूछा गया कि यह कौन सी वस्तु है।

१) पहले छात्र को हाथी का पूछ स्पर्श कराया गया और पूछा गया की क्या स्पर्श किये हो।
छात्र का उत्तरर तथा  ये कोई मोती रस्सी प्रतीत होती है।
२)अब दूसरे छात्र को हाथी का मोटा पैर स्पर्श कराया गया।
पूछने पर दूसरे छात्र ने बताया की वह एक पेड़ के मोटे तने का स्पर्श किया है
३) अब तीसरे छात्र को हाथी का पेट स्पर्श कराया गया और पूछा गया यह क्या है
छात्र का जबाब था  ये कोई दीवाल प्रतीत हो रहा है
४) चौथे छात्र को हाथी के कान का स्पर्श कराया गया , छात्र ने हाथी के सुपले जैसे कान को सूर्प( सुपला) समझा।

सभी छात्रों के आंख पर से पट्टी खोल दी गयी। छात्रों का संशय दूर हो गया था। गुरु जी ने छात्रों को समझते हुए कहा की सत्य का यथार्थ बोध नहीं होने से लोग संशय में एक दूसरे से बहस करते हैं। उदहारण के लिए अगर इन चरों छात्रों के आँख पर से पट्टी नहीं खोली गयी होती तो ये हाथी के बारे में अपनी अपनी राय व्यक्त कर एक दूसरे विवाद और तर्क करते।

ईश्वर के बारे में लोगों के अलग मत होंने का कारण भी लोगों  का अपना अपना इन्द्रिय सामर्थ्य और बोधगम्यता है। छात्रों  अपने को सामर्थ्यवान बनाओ अपने अंदर पात्रता लाओ  जिससे सत्य का बोध हो सके।

महाकवि तुलसी दास ने कहा था "नयन विहीन और मुकुर  मलीना, राम रूप देखहि किमी दीना " अर्थात
जिसकी दृष्टि कमजोर हो और वह चश्मा भी ऐसा लगा रखा हो जिसके शीशे गंदे हों तो वह सत्य के स्वरुप ईश्वर प्रभु राम को कैसे देख सकता है।

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सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

किसान और तरबूज की कहानी

एक छोटे से गाँव में एक बहुत ही मेहनती किसान रहता था। एक बार उसने अपने खेत में एक विशाल तरबूज उगाई। किसान अपने तरबूज का बहुत गर्व था और वह जानता था कि, यह सबसे बड़ी तरबूज जो कभी किसी ने देखा होगा। वह टकटकी लगाए अपने तरबूज की रखवाली किया करता था और उसके बारे में सोचा करता था की इस अद्भुत फल का क्या करना है।

पहले उसने सोचा कि इसे बाजार में बेच देना चाहिए, यह उसे अच्छा लाभ देगा। लेकिन फिर उसने सोचा की क्यों न इस तरबूजे को प्रदर्शनी में रखा जाए। वह इसी तरह उधेड़ बन में लगा रहा और अंत में निर्णय किया कि क्यों न इसे राजा को उपहार स्वरुप भेंट कर दूँ। किसान इसी अच्छी सोच के साथ सो गया कि वह राजा को अद्भुत तरबूज भेंट करेगा और बदले में राजा से इनाम पायेगा।

उस राज्य का राजा बहुत दयालु था और प्रजा की देखभाल करता था अतः उसे इसी बहाने अपने राज्य मे टहलने की आदत थी। वह आम आदमी के वेश में अपने नागरिकों को देखने निकल जाता था यह सुनिश्चित करने की सभी सुरक्षित थे हैं। उस रात, राजा एक साधारण आदमी के भेष में किसान के घर से होकर गुजरा। वहां राजा ने एक बड़ा तरबूज देखा और वह इसपर इतना मोहित हो गया, की किसान के दरवाजा पर जाकर उसका दरवाजा खटखटाया।

किसान उठा और बाहर आकर पूछा, "तुम कौन हो और इस समय तुम क्या चाहते हैं?"
राजा ने कहा, "मैं एक गरीब आदमी हूं मैंने इस खेत में यह बड़ा तरबूज देखा और मैं यह तरबूज लेना चाहता हूँ।"
किसान ने कहा "तरबूज नहीं नहीं>>> मैं उसे किसी को नहीं दे सकता !!"

राजा उत्सुक हो गया और पूछा, "क्यों नहीं?? आप इससे क्या करने वाले हैं?"

किसान ने कहा, "मैं इसे अपने राजा को देने के लिए जा रहा हूँ।"

राजा ने किसान से पूछा, "यदि राजा ने इसे पसंद नहीं किया तो क्या होगा?"

"तो फिर वह नरक में जा सकता है.. !!", किसान ने तत्काल जवाब दिया।

इस बातचीत के बाद राजा चला गया, और किसान वापस सोने के लिए अपने विस्तर पर गया।
अगली सुबह, किसान अपने तरबूज के लेकर राजा के महल के पास गया। जब वह राजा को देखा, तो वह उसे पहचान गया, लेकिन बजाय भयभीत होने के और बीती रात राजा के साथ हुए बातचित से, उसने ऐसा नाटक किया जैसे कुछ नहीं जानता हो। अब वह राजा तरबूज भेंट किया और कहा, "महाराज.. यह इस देश का सबसे बड़ा तरबूज है। मैं आपके लिए भेंट स्वरुप लाया हूँ मुझे आशा है कि आप इसे पसंद करेंगे। "

राजा ने कहा, "अगर मैं इसे पसंद नहीं किया तो?"
"ठीक है, उस मामले में आप पहले से ही मेरा जवाब जानते है ..महाराज .. !! "किसान ने कहा।
किसान प्रतिक्रिया सुनकर राजा मुस्कराए और बोले, "मैं तुम्हारा उपहार स्वीकार करता हूँ"। राजा ने न केवल अपने उपहार के लिए किसान को पुरस्कृत किया, बल्कि उसकी बुद्धिमानी और वाक्चातुरता के लिए भी पुरष्कृत किया।
 सारांश बुद्धिमता और प्रतिउत्पन्नमतित्व आपको हर विषम परिस्थिति से उबार लेते हैं

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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

धूर्त और कंजूस सियार



धूर्त और कंजूस सियार
एक कंजूस सियार था।  पर्याप्त आहार होने के बाद भी वह बहुत दुबला पतला था।  उसे जो कुछ भी आहार मिलता वो कंजूसी से उसे भविष्य के लिए संचय करता।
एक बार जंगल में एक शिकारी आया। बड़ी परिश्रम से उसने एक हिरन का शिकार किया।  शिकार को बाँध कर कंधे पर लटका कर धनुष पर तीर संधान किये हुए वो किसी और शिकार की खोज में चल पड़ा।  मार्ग में उसने एक जंगली सूअर देखा। शिकारी अपना तीर धनुष सम्भाल पता तब तक सूअर काफी नजदीक चला आया।  शिकारी और सूअर में मल युद्ध शुरू हो गया। चुकी दोनों ही बलशाली थे अतः एक दूसरे को हरा पाना असम्भव प्रतीत हो रहा था। उन दोनों के आपसी संघर्ष में पैरों से कुचल कर एक सर्प मर गया। अंतत: लड़ते लड़ते दोनों मर गए। एक झाडी में छुप कर सियार ये सब देख रहा था।
धूर्त और कंजूस सियार
कंजूस सियार को एक साथ कई सम्पदा प्राप्त हुई। वह निर्णय करने लगा और मास दिवस गणित करने लगा की कौन सा आहार कितने दिन चलेगा। उसके सामने हिरण, सूअर, शिकारी और सर्प मृत दिख रहे थे।  वह अपने कंजूसी के पैमाने से यह गणना करने में व्यस्त था की कौन से जीव का मांस कितने दिन का आहार है। उसने अपने गणित से यह पाया की एक महीने शिकारी का मांस का आहार चलेगा, हिरण और सूअर दो महीने के लिए पर्याप्त हैं, और मृत सर्प का मांस मैं एक दिन खा लूंगा। कंजूस धूर्त सियार ने सोचा कि अगर शुरुआत कल से करूँ तो एक दिन का और आहार बढ़ जायेगा। यह सोच कर कंजूस ने धनुष की डोर को ही चबा कर रात काटने का निश्चय किया। इसका वर्णन संस्कृत के एक सुन्दर श्लोक में इस प्रकार है।
"मासमेकम नरो याति, द्वौ मासौ मृगसुकरऔ।
 
अहिरेको दिनों याति अद्य भक्षेत् धनेर्गुणम
ऐसा सोच कर जैसे ही वो धनुष की प्रत्यंचा को दाँतों से खींचा प्रत्याचा में लगा तीर उसके गले में बिध गया और उस कंजूस के प्राण पखेरू उड़ गए।


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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

दूसरे का बंधन खोलने के लिए खुद बंधन मुक्त होना जरुरी

भागवत के कथा के बारे में हम सभी जानते हैं कि ध्यान पूर्वक इसका श्रवण करने से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। उस व्यक्ति को परम पद मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक बार एक भागवत कथा वाचक अपने शिष्य को कथा सुना रहे थे। कथा सुनाने के पश्चात स्रोता को वह लाभ नहीं मिला जो परीक्षित को मिला था। स्रोता को अभी भी संसार के विषय बंधन में जकड़े हुए थे। स्रोता ने अपने कथा वाचक गुरु से इसका कारण पूछा।
गुरु भी इसका रहस्य नहीं जान पाए अतः उन्होंने अपने गुरु जी के पास इस समस्या का समाधान जानने के लिए जाने का निश्चय किया। भागवत कथा वाचक अपने शिष्य के साथ गुरु आश्रम में पहुंचे। वहाँ पहुँच कर कथा वाचक गुरु ने अपने गुरु को सादर प्रणाम किया, और भागवत के कथा सुनने से शिष्य को कोई लाभ नहीं होने का कारण पूछा।

गुरु जी ने इन दोनों अतिथियों का यथोचित सत्कार किया। उसके उपरांत अपने शिष्यों से कहकर दोनों के के हाथ पैर बंधवा दिए। अब गुरु से कहा गया की आपका शिष्य बंधन में है इसका बंधन खोलिये। इसपर कथा वाचक गुरु ने कहा मैं तो खुद बंधन में हुए मैं कैसे वंधन खोल सकता हूँ। भागवत कथा वाचक गुरु के शंका का समाधान हो गया था। गुरु ने अपने शिष्य गुरु को समझते हुए कहा जो व्यक्ति खुद मुक्त नहीं है वो किसी को मुक्त नहीं कर सकता। तुम अपने को और तपाओ जब तुम्हे लगे कि तुम्हे कोई विषयों  का वंधन नहीं जकड रहा तो तुम भी भगवत कथा के माध्यम से अपने भक्त को विषय विकारों से मुक्त कराकर मोक्ष दिला सकते हो।

राजा परीक्षित को महान तपस्वी शुकदेव जी ने भागवत का कथा सुनाया था। शुकदेव जी खुद बंधन मुक्त थे तभी जाकर परीक्षित को कथा श्रावण का यथोचित लाभ हुआ।     

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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

क्यों किया जा रहा रावण को महिमामंडित

रावण का महिमामंडन क्यों 

रावण एक खलनायक था। रामायण की पूरी कथा में राम को नायक और रावण को खलनायक बताया गया है। आजकल कुछ लोग रावण को  महिमामंडित करने में लगे हैं। ये बामपंथी सोच सनातन धर्म के लिए बहुत चिंता का विषय है। सनातन धर्म को छति  पहुँचाने के लिए विधर्मियों ने बहुत गहरी साजिस चली है। जरा सोचिये अब तक खलचरित्र के रूप में कुख्यात रावण को अब महिमंडित क्यों किये जा रहा है।

कई कुत्सित मानसिकता वाले लोग आजकल रावण को माहज्ञानी, महापंडित, कुल का गौरव बढ़ने वाला और देश भक्त बताते हैं। अगर हम किसी खलनायक को महिमामंडित कर रहे हैं तो कही न कही हम राम के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। रावण की बड़ाई में निकला  आप  के मुख से एक स्वर राम के प्रति आपकी निष्ठा को काम कर देता है। 

आइये  रावण से सम्बंधित कुछ  प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं- >

१) रावण महाज्ञानी नहीं अज्ञानी था ->
रावण को महाज्ञानी मानाने वाले लोग  ये भूल जाते हैं कि ज्ञान की परिभाषा क्या है ? ज्ञान शुभ कर्म करने की प्रेरणा  देता है। अगर आप शुभ कर्म नहीं कर रहे तो आप निश्चित ही अज्ञानी है। राक्षस स्वभाव वश रावण के शुभ  कर्म नहीं थे, अतः रावण अज्ञानी था। भगवान को ज्ञान का स्वरुप बताया गया है,"ज्ञान रूपी हरि भगवान् का संबोधन आया है। अब जब रावण उस ज्ञान रूपी भगवान् से द्वेष करता था तो ज्ञानी कैसे हुआ।
२) रावण के कुल का गौरव नहीं बढ़ाया उससे कुल की ख्याति का ह्रास हुआ ->
रावण को कुछ मतिमंद लोग मानते हैं की उसने कुल की ख्याति बढ़ाई। राक्षसों की कीर्ति रखने के लिए राम के सामने आत्म सपर्पण नहीं किया बल्कि युद्ध किया। उनलोगों की जानकारी के लिए बता दूँ की रावण ने अपने कुल के गौरव को कम किया इसके प्रमाण में हनुमान जी रावण को समझते हुए कहते हैं। -> "ऋषि पुलस्त्य जसु  विमल मयंक तेहि शशि महु जनि होहु कलंक" 

३) कुछ लोगों के अनुसार राम ने अपने बहन के अपमान का बदला लेने के लये सीता का हरण किया।
आजकल रावण को महिमामंडित किये जाने के दुष्परिणाम से कुछ लडकिया अपने लिए रावण जैसे भाई की कामना करने लगी हैं। इन मतिमंद लड़कियों का तर्क है की रावण ने अपने बहन की रक्षा की तथा सूर्पनखा के अपमान  का बदला लिया। रावण ने अपने बहन की रक्षा का ख्याल किया होता तो  सूर्पनखा स्वेच्छाचारी न बनी होती और राम के पास विवाह प्रस्ताव का हठ लेकर  नहीं गयी होती। सूर्पनखा का लक्ष्मण न तब नाक काटा  जब वह सीता की तरफ मुह फाड़कर खाने को दौड़ी। राम ने जब अपने को शादीशुदा बताया और पत्नी रहते दूसरी शादी नहीं करने की प्रतिबद्धता बताया, तो सूर्पनखा ने राम को स्त्री विहीन करना चाहा। नाक  कटने  के बाद सूर्पनखा अगर रावण से सभी बात सही सही बता देती तो रावण राम से युद्ध नहीं करता शायद सूर्पनखा को ही डाँटता।
४) रावण देश भक्त नहीं था
देशभक्त राजा की पहचान होती है कि वो अपने प्रजा के तुच्छ से तुच्छ स्वार्थ के लिए अपने महान लाभ का त्याग कर दे। रावण अपने प्रजा के साथ इस बात का ख्याल नहीं रखा। रावण अपने तुच्छ स्वार्थ एक स्त्री के लोभवश अपने समस्त प्रजाजन का नाश करा दिया। ये रावण का देश द्रोह था। सच पूछो तो रावण अपने बहन के अपनान का बदला लेने  के लिए सीता का अपहरण नहीं किया था, बल्कि वह अपने स्त्रीलोलुपता के कारण ऐसा किया था।

सनातन धर्म के अनुयायियों आप सावधान हो  जाओ आपको प्रभु राम से विमुख करने के लिए बामपंथियों और विधर्मियों की ये बहुत बड़ी साजिस है जिसके तहत रावण को महिमामंडित किया जा रहा है उसकी पूजा की जा रही है तथा देश के कई हिस्सों को रावण का मंदिर भी बनाया जा रहा है        


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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

आप सुधरे तो जग सुधरा - राजा ग्वालों और दूध की कहानी

एक राजा था।  वह बहुत न्यायप्रिय था। एक बार राजा के मन में यह जानने की इच्छा  हुई की उसके नगर में कुल कितने ग्वाले हैं और यज्ञादि के लिए जरुरत पड़ने पर अधिक से अधिक कितना दूध और दधि घृतादि उपलब्ध हो सकते हैं।
यह जानने के लिए राजा ने अपने महल के बगीचे में एक बहुत बड़ा कड़ाह रखवा दिया। नगर में रहने वाले ग्वालों को आदेश दिया गया की सभी ग्वाले रात में अपने अपने घर से दूध का भरा बर्तन लाकर इस कड़ाह में उड़ेलेंगे। बगीचे में बिना पहरेदार के मुक्त रूप से ग्वाले जाकर अपने दूध कड़ाह में डाल सकते थे।

सभी ग्वालों को उपस्थिति निश्चित करने के लिए बगीचे के बाहर गेट पर रौशनी में एक रजिस्टर रखा था। सभी ग्वालों को अपनी उपस्थिति इसी पुस्तिका में दर्ज करनी थी। कड़ाह ढंका हुआ था और कड़ाह में दूध डालने के लिए एक नाली बानी हुई थी। कड़ाह में कितना दूध है भरा है या खाली यह किसी ग्वाले को नहीं दीखता था।   रात होते ही सभी ग्वाले अपने अपने दूध के बर्तन लेकर राजा के बगीचे की ओर चल पड़े। एक ग्वाले ने अपने मन में विचार किया राजा ने सभी से दूध डालने को कहा है मैं अगर अपने हिस्से के दूध  के बदले पानी ही डाल दूँ तो कौन देखने जाता है। उस ग्वाले ने अपने हिस्से का पानी ही डाल दिया।

सुबह राजा की उपस्थिति में कड़ाह खोला गया। "राजा के साथ-साथ सभी नग रवासी  यह देख कर हैरान थे - कड़ाह दूध से नहीं पानी से भरा था"

असल में उस नगर के सभी ग्वालों ने यही बात सोच लिया की सभी ग्वाले तो दूध डालेंगे ही मैं क्यों न पानी डालकर अपना दूध बचालूं। नतीजा यह हुआ की कड़ाह दूध से भरने के बजाय पानी से भर गया।

हमारे व्यावहारिक जीवन में भी जब सुधार की बात होती है तो लोग अक्सर यह कहते सुने गए हैं की एक आदमी के सुधरने से क्या होगा। तो मित्रों यह कहानी बताती है की एक आदमी के न सुधरने से क्या क्या मुसीबत आ सकती है समाज को   


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गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

एक अंधी लड़की की कहानी

Story of a Blind Girl


एक अंधी लड़की थी जो खुद से नफरत करती थी सिर्फ इसलिए कि वह अंधी थी। वह अपने प्रेमी को छोड़कर, हर किसी से नफरत करती थी। वह उसके मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। उस लड़की ने कहा कि अगर वह केवल दुनिया देख सकती, तो वह अपने प्रेमी से शादी कर लेती।

एक दिन, कोई उसे एक जोड़ी आँखें दान किया अब वह अपने प्रेमी के साथ साथ सब कुछ देख सकती थी। उसके प्रेमी ने उससे पूछा, "अब तुम दुनिया को देख सकती हो , क्या अब तुम मुझसे शादी करोगी?"
 लड़की चौक गयी जब उसने देखा की उसका प्रेमी भी अँधा है और उसने शादी करने से इंकार कर दिया। उसका प्रेमी आँसू भरी आँखों से उससे दूर चला गया, और उसे एक चिट्ठी के माध्यम से सन्देश  भेजा।
"प्यारी बस मेरी आँखों का ख्याल रखना।"

यहाँ बताया गया है कि कैसे मनुष्य की स्थिति में बदलाव आने से उसके निर्णय में परिवर्तन आ जाता है और उसके विचार बदल जाते हैं। बहुत काम लोगों को याद रहता है की  पहले जीवन कैसा था, और जीवन की उस विषम परिस्थितियों में किन लोगों ने मेरा साथ दिया ?

जीवन एक उपहार है
आज एक निर्दयी वचन बोलने से पहले आप इस बारे में सोचें कि
-कोई ऐसा भी आदमी है जो बोल नहीं सकता है
इससे पहले कि आप अपने भोजन के स्वाद के बारे में शिकायत करें
-सोचें कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनको कुछ खाने को नसीब नहीं

इससे पहले कि आप अपने पति या पत्नी के बारे में शिकायत करें
- उनके बार में सोचिये जो एक साथी के लिए भगवन से विनती कर रहे हैं

आज इससे पहले कि आप जीवन के बारे में शिकायत करें
- उनलोगों के बारे में सोचे जो अल्पायु में ही मर गए

इससे पहले कि आप अपने बच्चों के बारे में शिकायत करें।
- उनलोगों के बारे में सोचें जो बच्चे की चाहत रखते है लेकिन निःसंतान हैं

इससे पहले कि आप अपने गंदे घर के बारे में बहस करें, जिसे कोई साफ नहीं करता या झाडू नहीं लगता
-उनलोगों के बारे में सोचें जो लोग सड़को गलियों में रहते है, या फुटपाथों पर सोते हैं

अपने घर से ऑफिस तक की ड्राइविंग डिस्टेंस से दुखी होने से पहले सोचे
-उनलोगों के बारे में जो सामान दुरी पैदल चल कर तय करते हैं

और जब आप थक गए हों और अपनी नौकरी में के बारे में शिकायत कर रहे हों
- तो विकलांग और बेरोजगार व्यक्तियों के बारे में सोचे जो लोग एक नौकरी के तलाश में दर दर भटकते हैं।

दूसरों की निंदा के लिए अपनी अंगुली उठाने से पहले ये जरूर सोचें
-आप भी बुराई से बंचित नहीं है और आप भी पाप कर्म करते है

 जब निराशाजनक विचार आपको दूसरों से निचा दिखने लगे तो
- अपने चेहरे पर एक मुश्कान लाएं कि भगवान ने इतना अमूल्य जीवन दिया है और आप अभी तक जीवित हैं


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सोमवार, 3 अक्तूबर 2016

किसान और खच्चर की कहानी, विपरीत परिस्थिति को अपने अनुकूल बनायें

Story of Farmar and Mule - विपरीत परिस्थिति को अपने अनुकूल बनायें

यह कहानी एक किसान की है जो एक पुराना खच्चर पाल रखा था।  एक दिन खच्चर किसान के कुएं में गिर गया। किसान खच्चर को प्रार्थना करते सुना अर्थात खच्चर कुआँ में गिरने पर जो कुछ भी कर सकता था अपनी भाषा में वो किया।
सावधानी से स्थिति का आकलन करने के बाद, किसान खच्चर के साथ सहानुभूति प्रकट किया। लेकिन फैसला किया कि न तो खच्चर बचाने की स्थिति में है और न ही कुआँ इतना बड़ा है की उसमे घुस कर वो खच्चर को निकल सके।  इसके बावजूद, वह अपने पड़ोसियों को बुलाया और उन्हें बताया कि खच्चर के साथ क्या हुआ है। वह उनसे बूढ़े खच्चर को कुएं में ही दफ़न करने का परामर्श किया जिससे खच्चर दुःख से निजात  पा सके।
शुरू में बूढ़ा खच्चर लाचार हो गया था! लेकिन जैसे ही किसान और  उसके पडोसी  उसके पीठ के ऊपर दफ़न करने के लिए मिट्टी डालने लगे, उसके मन में एक विचार आया। अचानक उसे याद आया की जब किसान उसके पीठ पर जब मिटटी लोड करता था तो वह अपनी पीठ हिला कर मिटटी गिरा कर खड़ा हो जाया करता था।

खच्चर अपनी पुरानी आदत जारी रखा। उसके पीठ पर किसान और उसके पडोसी मिटटी का ढेर डालते वह अपना शरीर हिलाकर सारी मिटटी गिरा देता था और और मिटटी के ऊपर एक कदम आगे चल देता था। उसने अपने आप को प्रोत्साहित करने के लिए बार बार यही दोहराया। इस बात की परवाह किये बिना की कैसे दर्दनाक और चिंताजनक स्थिति में वह है। बूढ़ा खच्चर पीठ से मिटटी हिलाकर गिराना और उसके ऊपर कदम रख कर ऊपर आने का प्रयास जारी रखा। 

किसान और उसके पड़ोसियों के द्वारा खच्चर को  दफ़नाने का प्रयास उसके लिए कुएं से बहार निकलने में मददगार साबित हुआ।  धीरे धीरे इसी तरह कुएं में मिटटी भरती गयी और अंत में खच्चर उछाल कर कुएं से बहार निकल गया। यह इसलिए सम्भव हुआ क्योंकि खच्चर ने अपने विपरीत परिस्थितियों की सही तरीके से संभाला।

यही ज़िन्दगी है! अगर हम अपनी समस्याओं का सामना करतें हैं और उन्हें सकारात्मक रूप देतें हैं , संकट की स्थिति को गभीर समस्या और किसी के दया की पात्र नहीं बनाने देते। तो असफलता और संकट की स्थिति भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकती।

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शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

गरीब लोग कैसे रहते हैं

एक दिन, एक बहुत धनी परिवार के एक पिता ने अपने बेटे को गरीब लोग कैसे रहते हैं यह दिखाने के उद्देश्य से फार्म की यात्रा पर जाते हुए अपने साथ ले लिया। वे अपने फार्म पर कई दिन और रात बिताये  यह जानने के उद्देश्य से की कैसे  कोई परिवार बहुत गरीब परिवार के रूप में जाना जायेगा ? उनकी यात्रा से वापसी पर, पिता ने अपने बेटे से पूछा, "कैसे यात्रा थी?"

"यह बहुत अच्छा था, पिताजी।" पुत्र ने जबाब दिया।

पिता ने पूछा। "क्या तुमने देखा कि गरीब लोग कैसे रहते हैं?"

बेटे ने कहा "ओह, हाँ," ।

पिता ने पूछा "तो, मुझे बताओ, तुमने यात्रा से क्या सीखा?"


बेटे ने उत्तर दिया, "मैंने देखा है कि हमारे पास एक कुत्ता है और उनके पास चार हैं। हमारे पास एक तालाब है जो बगीचे के मध्य तक जाती है और उनके पास एक खाड़ी है जिसकी कोई सीमा नहीं है। हम अपने बगीचे में रौशनी के लिए अपना लालटेन लेके आये हैं, और वे रात में सितारों की प्रकाश से प्रकाशित होकर आनंदित हो रहे है। हमारे आँगन की सीमा , सामने यार्ड तक पहुंचती है, और पूरा क्षितिज उनका आँगन है। हमारे पास रहने के लिए जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा है, और उनके पास  खेतें हैं जहा तक हमारी दृष्टि नहीं जा पाती। हमें सेवा करने के लिए हमारे पास नौकर हैं, लेकिन वो दूसरों की सेवा करते हैं। हम जीवन यापन और भरण पोषण के लिए अपना भोजन खरीदतें हैं जबकि वो अपने लिए अन्न पैदा कर लेते हैं। हमने अपनी सुरक्षा के लिए मजबूत घर बना रखे हैं  जिसमे मोटी मोटी दीवारें हैं, जबकि उनके पास उनकी रक्षा करने के लिए उनके मित्र हैं। 

अपने बेटे के मुख से यह सुनकर लड़के के पिता अवाक था।
तब उनके बेटे ने कहा, "धन्यवाद, पिताजी, मुझे यह दिखाने के लिए कि कैसे हम गरीब हैं और वो आमिर हैं।" जिन्हें  हम नासमझी से गरीब समझते थे।"

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