शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मक्खीचूस बनिए की कहानी

मक्खीचूस बनिया की कहानी
एक बनिया था। उसका तेल और घी का व्यवसाय था। अपने ग्राहकों को सामान देते समय वो इस बात का ख्याल रखता था कि कही तौल में किसी ग्राहक को ज्यादा सामान तो न दे दिया। उसकी कंजूसी का उसके परिवार वालों तथा नौकर चक्रों को भी पता था।



सुबह उठ कर वह अपने दूकान पर जाता था। दुकान जाते समय वह अपने कुर्ते को कंधे पर रख लेता था और अपने जूते हाथ में ले लेता था। जब जब दूकान नजदीक आता था तो कंधे से कुर्ता उतार कर पहन लेता था, और पैरों से धूल झाड़कर जूते भी पहन लेता था। उसका ऐसा मानना था कि ऐसा करने से उसके कपडे तथा जूते ज्यादा दिन तक चलेंगे।

एक बार साहूकार ने गावँ के ग्वाले से घी खरीदी। सुबह वह घी ले कर अपने दूकान जाने लगा। रास्ते में उसे ख्याल आया की अरे पंखा तो चलता छोड़ आया हूँ अगर वापस जाकर पंखा ऑफ नहीं करता हूँ तो कितने की बिजली बर्बाद हो जायेगी। कंजूस बनिया कंधे पर कुर्ता, एक हाथ में जूते तथा दूसरे हाथ में घी के बर्तन लिए घर की ओर वापस चल पड़ा।  घर पहुंचकर सेठ ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से नौकर ने आवाज लगायी कौन है ? सेठ जी बोले मैं हूँ दरवाजा खोलो। नौकर ने कहा सेठ जी आप वापस क्यों आ गए ? बनिए ने कहा मेरे कमरे का पंखा  अभी भी चल रहा है उसे बंद करना है, तुम दरवाजा खोलो। सेठ से बार बार दरवाजा खोलने से इसके कब्जे घिस जाएंगे वैसे मैंने पंखे बंद कर दिए हैं नौकर ने कहा। कंजूस बनिए को नौकर की ये बात अच्छी  लगी।
बनिया अपने एक हाथ में घी का बर्तन दूसरे हाथ में जूता लिया हुए दूकान पर लौट पड़ा।

मार्ग में वह एक जगह पर विराम किया। उसका मन किया की घी देखूं शुद्ध है की नहीं इसमें देशी घी का सुगंध आता है या नहीं। अतः उसने घी के बर्तन पर से ढक्कन उठाया। जैसे ही वह ढक्कन खोल एक मक्खी घी में पद गयी। बनिए को मक्खी के इस घृष्टता पर बहुत गुस्सा आया। वह मक्खी को घी के बर्तन में से निकल कर उँगलियों से निचोड़ कर सारा घी निकल लिया जमीन  पर उसे फ़ेंक दिया। .कंजूस बनिए को फिर भी संतोष नहीं हुआ उसे लग रहा था कि  मक्खी के शरीर में अब भी घी शेष रह गया है। उसने मक्खी के शरीर से बचा खुचा  घी निकालने का तरकीब सोचा। मक्खी को जमीन पर से उठाया और अपने मुह में रखकर सूचने लगा। तब से कंजूसों के लिए मक्खीचूस शब्द का प्रयोग होने लगा। आज भी जब कोई आदमी कंजूसी की सीमा को पर कर जाता है तो लोग उसे मक्खीचूस की संज्ञा देते हैं।

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शनिवार, 19 नवंबर 2016

हमेशा एक बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा सलाह लें

Always Take Advice By a Wise Man

एक कुम्हार था।  वह मिटटी के बर्तन बनाकर बेचा करता था. कुम्हार की पत्नी हमेसा उसे कोशते रहती थी। वह चाहती थी की कुम्हार ज्यादा काम करे जिससे परिवार में पैसा आये। वह कुम्हार को हमेशा दिमाग लगाकर सुन्दर कलाकृति से युक्त बर्तन बनाने को बोलते रहती थी।  लेकिन कुम्हकार जितना दिमाग लगा सकता था उसी हिसाब से साधारण बर्तन बनाया करता था।

वही दूसरे कुम्हार सुन्दर कलाकृति वाले बर्तन बना कर खूब पैसे काम रहे थे। ज्यादा पैसा होने से उनका जीवन स्तर अच्छा था। कुम्हार की पत्नी अपने सहेलियों में पहनावा और वेशभूषा से खुद को हीन समझती थी। इस हीन भावना के निवारण का एक ही उपाय था की कुम्हार भी सुन्दर बर्तन  बनाने लगे जिससे ज्यादा पैसा बन सके। 

कुम्हार भी अपने इस व्यवहार से दुखी था लेकिन मजबूर था वह दूसरे कुम्हारों की तरह कल्पनाशील नहीं था जिससे दिमाग का उपयोग कर रचनात्मक बर्तन बना सके। एक दिन कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी लाने खेतों में गया था। खेत से मिटटी इकठ्ठा करते समय वह रोने लगा और धरती माँ से विनती करने लगा।  हे माँ!  तूने मुझे इतना मंद मति का क्यों बनाया जिससे मैं सुन्दर बर्तन बनाने में असमर्थ हूँ ? वह कार्य करते हुए धरती माँ को याद कर रोता रहा।

उसकी विनती सुन पृथ्वी को दया आ गयी। पृथ्वी एक स्त्री के रूप में कुम्हार के समक्ष प्रकट हुईं। देवी ने कुम्हार से पूछा बोलो वत्स क्यों परेशान हों मैं  तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ जिससे तुम्हारा दुःख दूर हो। कुम्हार कुछ बोल नहीं पाया। देवी ने कुम्हार को वचन दिया की तुम मुझसे कोई भी दो वरदान मांग सकते हो।
कुम्हार ने सोचा मैं तो ठहरा मतिमंद चल के अपनी पत्नी से पूछ आता हूँ, की क्या मांगना सही रहेगा। कुम्हार भागता भागता घर पहुंचा। कुम्हार की पत्नी जब कुम्हार को खाली हाथ बिना मिटटी के आये देखी तो झुंझला गयी। फिर कुम्हार ने वरदान वाली बात पत्नी को बताई।

कुम्हार पर क्रोधित पत्नी ने कुम्हार को ज्यादा दिमाग और हुनर के लिए दो सिर तथा ज्यादा काम करने के लिए दो हाथ मांगने का सलाह दिया।


पत्नी की सलाह लेकर कुम्हार खेतों की तरफ जल्दी से भाग चला। धरती के वरदान से उसे दो सर और चार हाथ हो गए। जल्दी जल्दी गधे पर सारा मिटटी लड़कर वह गावँ की ओर चल पड़ा। कुम्हार इतना खुश था की गधे के पीछे पीछे चलने वाला व्यक्ति आज गधे से काफी आगे आगे चल रहा था। कुम्हार को जल्दी घर जाकर पत्नी से अपनी सूरत और उपलब्धि जतानी थी।

गावँ की लोगों ने जब गावँ की तरफ दो सिर और चार हाथ वाले पुरुष को आते देखा तो वो लोग डर गए। गावँ वालों ने समझा की जरूर ये कोई राक्षस है। सभी ने अपने अपने हथियार निकाल लिए और एक साथ सभी गावँ वाले उसपर हमला बोल दिए। हमला  इतना अचानक था की कुम्हार संभल भी  नहीं पाया और सभी लोग उसे पीट पीट कर अधमरा बना दिए। कुम्हार के पत्नी से सुना की गाँव में राक्षस आया है तो वह भी उसे देखने पहुँच गयी। कुम्हार की पत्नी ने उसे और पीटने और मरने से बचाया। उसकी पत्नी अपने दिए परामर्श पर बहुत पश्चाताप कर रही थी।

इसीलिए कहा गया है=>कभी भी कोई परामर्श बुद्धिमान और सज्जन व्यक्ति से लेनी चाहिए।     

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रविवार, 13 नवंबर 2016

हजारों साल चलने वाला पंखा

      हजारों साल चलने वाला पंखा....एक बार एक धूर्त पंखा बिक्रेता नगर मे घुम घुमकर पंखा बेच रहा था। पहले के जमाने मे यातायात के साधन कम थे । बिक्रेता पैदल ही घुम घमकर फेरी लगाकर समान बेचते थे ।
धुर्त बिक्रेता अवाज लगा रहा था । पंखा ले लो हजारों साल चलने वाला पंखा जन्म जन्मान्तर तक चलने वाला पंखा । नगर के सभी लोग  आश्चर्य से पंखा बिक्रेता की ओर देख रहे थे लेकिन किसी को उससे पंखा खरीदने की हिम्मत नही हो रही थी।


पंखा बिक्रेता अवाज लगाते हुए राजा के महल के समीप पहुचा । पंखा बिक्रेता आवाज लगा रहा था ......हजारों साल चलने वाला पंखा।
राजा ने उसकी आवा ज सुनी और दरबारि यों से बुलाने को कहा। दरबारी पंखे वाले को राजा के समक्ष प्रस्तुत किये । राजा ने पंखा बिक्रेता से पुछा कहो कैसा पंखा बेच रहे हो .....बनिये ने राजा को पंखा दिखाया। राजा ने पुछा क्या यह पंखा सच मे हजार साल चलने वाला है । बनिये ने कहा हा महाराज! राजा ने कुतु हल बस पंखा खरीद लिया । राजा के सेवक राजा को पंखा झलने लगे । राजा के सेवकों मे इस नये पंखे को झलने की होड लग गयी । राजा ने सेवकों का मन रखने के लिए सभी सेवकों को अवसर दिया । 
अपनी अपनी बारी आने पर सभी सेवक राजा को पंख झलते। सेवक दिर्घजीवी पंखा  को देखकर काफी उत्साहित थे पंख टूटने का दर नहीं थे अतः सभी अपने अपने अंदाज से राजा को खुश करने के लिए पंखे झलते। सेवकों के इसी अंदाज से हजारों साल तक चलने वाला पंखा कुछ ही घंटे में टूट गया। 

राजा ने पंखा टुटा देखा तो राजा को पंख बिक्रेता पर बहुत गुस्सा आया।  उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया  की जल्द से जल्द उस कपटी बनिए को मेरे समक्ष प्रस्तुत करों। पंखा बिक्रेता उसी नगर में फेरी लगा रहा था। राजा के सैनिक जल्द ही उसे पकड़कर राजा के सामने पेश किये। 

राजा ने प्रश्न किये ? कहो कपटी वणिक तुम मेरे राज्य के भोले भाले नागरिकों को क्यों ठग रहे हो। क्यों तुम्हारा हजारों साल तक चलने वाला पंखा कुछ ही घंटे में टूट गया। बोलो तुम्हारे साथ क्या न्याय किया जाए। 
पंखा बिक्रेता ने राजा से बड़ी सहजता से पूछा -> महाराज इस पंखे को किस प्रकार झाला जा रहा था ? राजा ने कहा ये भी कोई पूछने की बात है पंखे जैसे झले जाते हैं वैसे ही इसे भी झाला गया। सभी पंखे झलने की एक ही विधि है। 
इसपर बनिए ने कहा नहीं महाराज मैंने इस पंखे के साथ इसकी एक उपयोग विधि भी दी थी। लाईये वो पर्ची दीजिये मैं इस पंखे की उपयोग विधि बताता हूँ। राजा के सेवकों ने कहा वो तो हमने पढ़ी नहीं फ़ेंक दी। ढूंढने पर किंनारे फर्श पर गिरी पर्ची मिल गयी। पंखा बिक्रेता पर्ची खोला  और पंखा  झलनेकी विधि पढ़ कर बताने लगा। 
पर्ची पर लिखे निर्देश के अनुसार पंखे को अपने नाक के सामने रखकर अपने सिर को हिलाना था। 

राजा पंखा बेचने वाले के तर्क को सुनकर बहुत हंसे  और प्रसन्न होकर उसका अपराध  क्षमा कर दिया .

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