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भिखारी के कल्पना की कहानी

एक भिखारी था भिक्षाटन से जो कुछ भी धन मिलता उसे वो संचित करता और उस संचित धन से अपने भविष्य सुधारने की योयना बनाते रहता. पुराने ज़माने में भिक्षाटन करने वालों को भीख में आनाज ही मिला करता था. चावल और आटा जैसे अन्न जो क्षुधा निवारण के लिए सबसे उपयुक्त और सुलभ थे लोग भिक्षादान में अधिकांशत: उपयोग किया करते थे .

भिखारी दिन भर घूमता और लोगों से भीख में जो धन आदि मिलता उसे लाकर अपने कुटिया में खूंटी के ऊपर लटका देता. खूंटी पर लटकी अनाज की मटकी एक तो अन्न को चूहों से सुरक्षित रखती और दूसरी उस याचक के स्वप्नील कल्पना को बल भी प्रदान करती . इसी तरह उसने अपने कटिया में अनाजों की परिधि बना लिए. अबतो उसकी कुटिया में चारो तरफ मटकियाँ ही मटकियाँ लटकी थीं .

एक दिन भिखारी अपने कुतिया में लटके हुए मटकियों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ .अपने मन में वह अपने सुन्दर भविष्य के बारे में सोचने लगा. मेरे पास इतने अन्न हो गए हैं अब मैं इन्हें बेचकर बहुत सारी मुद्राएँ अर्जित कर सकता हूँ . इन मुद्राओं से में सुख और वैभव के बहुत से साधन खरीदूंगा . इसतरह मुझे कोई धनी व्यक्ति मुझे अपनी कन्या दे देगा . उस स्त्री के साथ …

जब घोड़ों के खिलाफ गधों ने जंग जीती

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एक बार के राजा को अपने पडोसी शत्रु राजा के साथ युद्ध करना पड़ा।  युद्ध बहुत दिन तक चला और राजा के बहुत सारे सैनिक और हज़ारों घोड़े मारे गए। इस युद्ध में राजा अपने राज्य का एक महत्वपूर्ण भूभाग हार गया। राजा को अपने हारे हुए राज्य का हिस्सा वापस लेना था.  युद्ध क्षेत्र ऐसे स्थान पर था  जहाँ सिर्फ घुड़सवार  सैनिक से ही युद्ध जितना संभव था।  राजा ने  अपने मंत्री से इस विषय में मंत्रणा की।  राजा का मंत्री बहुत होशियार था। उसने राजा से कहा महाराज ! अपने प्रधान सेनानायकों के साथ एक बैठक की जाए।

बैठक में  निर्णय  लिया गया की अपने पास सैनिकों की कमी तो पूरा की जा सकती है लेकिन युद्ध के घोड़ों की कमी नहीं पूरी की जा सकती। इसके लिए हम अपने राज्य में सुलभ गदहों से काम चला लेंगे। जिन जिन धोबियों के पास गदहे हैं उन सभी धोबियों को निर्देश दिया जाए कि,  वो  राज दरबार में उपस्थित हो। राजा के कर्मचारी पुरे नगर में ढोल बजाकर इस बात की घोषणा कर दिए. राजाज्ञा का पालन करते हुए सभी धोबी राज दरबार में उपस्थित हुए। राजा के मंत्री ने सभी धोबियों को सम्बोधित करते हुए कहा। आप सभी के पशु हमारे घुड़सवार सैनिकों की सेवा…

सर्टिफिकेट सियार का

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सियारों से कुत्तों की दुश्मनी बहुत पुराणी है।  इससे सम्बंधित कई किस्से कहानियाँ हैं।  आईये ऐसे ही एक रोचक कहानी के बारे में जानते हैं। इस कहानी के मुख्य पात्र हैं। सियार सियारिन और कुत्ते।
सियारों को उनसे नगर में रहने का अधिकार छीन गया था तब से सियार जंगल में रहने लगे थे और कुत्ते गावं में।  जब भी साहस कर सियार गावं में आने की कोसिस करते कुत्ते उन्हें भों भों कर भगा देते।


एक दिन एक सियार को कोई पत्र मिला।  वह उस पत्र को मुहं में दबाये हुए घर पहुंचा।  घर पहुँच कर उसने बड़े प्यार से सियारिन को आवाज लगायी।
प्रिये सुनती हो ! प्रिये सुनती हो। ....

अरे भाग्यवान सुनती हो !

सियारिन ने कहा -->आयी जी बच्चों को खिला रही हूँ थोड़ा देर इन्तजार कर लो। कुछ भन भनाते हुए सियारन दरवाजे पर आ गयी. ये सब तो मेरे ही जिम्मे हैं न पैदा कर छोड़ दिए मुझ पर। मैं न देखूं तो इन्हे कौन देखेगा। आप तो बाहर घूमते रहते हो कभी मेरे बारे में भी सोचा है।  मेरा भी मन करता है कही घुमाने जाने का बाहर का खाने का।

सियार ने अपने मुँह में दबाये हुए कागज़ को जमीन पर रखते हुए उसे पैरों से दबाते हुए बोला। इसे पढ़ो पगली। अब पुरानी …

श्रद्धालु और ईर्ष्यालु की कहानी

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ईर्ष्यालु व्यक्ति की कहानी। "श्रद्धालु" और "ईर्ष्यालु" नाम के दो पडोसी थे। दोनों में आपस में काफी घनिष्ठता थी। दोनों ने मिलकर तपस्या करने का विचार किया। दोनों तपस्या पर चले गए और भगवान शिव की आराधना करने लगे।  बहुत दिन तक तपस्या में लगे रहे। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए।  भगवान शिव ने उन दोनों से वर मांगने को कहा ।
श्रद्धालु ने भगवान् शिव से वरदान माँगा --> भगवन मैं जब भी आपकी पूजा  अर्चना करके आपसे कोई वरदान मांगू तो आप मुझपर प्रसन्न होकर वरदान को सफल बनाये।  भगवान शिव ने कहा तथास्तु !
अब "ईर्ष्यालु" की बारी थी -->
"ईर्ष्यालु" ने भगवान शिव  से वरदान माँगा। भगवान आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जो कुछ वरदान में "श्रद्धालु" को मिले उससे दोगुना मुझे मिल जाए।  
भगवान आशुतोष ने एवमस्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए।



"श्रद्धालु" भगवान शिव की नित्य पूजा पाठ करता और अपने जरुरत के अनुसार शिव से वरदान माँग लेता। 
"श्रद्धालु" ने एक दिन पूजा करके भगवान शिव से अपने लिए एक सुन्दर सा घर माँगा। भोले नाथ के वर…

लंगर की कहानी Reliance जियो के सन्दर्भ में

एक व्यक्ति नित्य लंगर चलाता था
लंगर मे खाने वालों की संख्या नित्य प्रतिदिन बढ़ती गयी ।
फ़िर एक दिन उस व्यक्ति ने लंगर के टेबल पर एक तरफ़ दान पेटी रख दी ।
दान पेटी पर लिखा था आप धर्मार्थ स्वैच्छिक दान दे सकते हैं ।
अब प्रसाद पाने के बहाने खाने आने वाले की संख्या दिन प्रति दिन घटने लगी ।
लंगर के आयोजक व्यक्ति समाज शास्त्री भी थे ।
भीड़ के इस व्यवहार से उन्हे अपने विषय पर शोध करने का अवसर भी मिल रहा था। कूछ दिन तक यूँ ही चलता रहा। फिर एक दिन अप शोध के क्रम में लंगर आयोजित करने वाले व्यक्ति ने दान पेटी को बदल दिया । अब दान पेटी पर लिखा था ।
धर्मार्थ न्यूनतम 1 रुपये दान पेटी मे डालें ।
लोग अब भी आते और jio की कस्टमर की तरह मुफ्त का खा कर चले जाते। लोग खाने के बाद सोचने पर मजबूर हो जाते कि दान पेटी मे पैसे डालूं या न डालूं । धीरे धीरे लोग दान पेटी मे 1 रुपये डालने लगे ।
वो लोग जिनको दान पेटी में 1 रुपये डालने में हिचकिचाह महसूस हो रही थी धीरे धीरे लंगर में आना छोड़ दिए .
यह कहानी jio के कुछ उपभोक्ताओं पर भी सार्थक सिद्ध होती दिखती है .

सेठ का अपने बच्चे को सीख

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कपडे का एक व्यापारी था।  वह बहुत मन लगाकर अपना व्यवसाय करता था।  अपने दिनचर्या का पालन करता था और नित्य सुबह दूकान पर पहुँच जाता था।  दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी   . सेठ अपने कपड़ों पर उचित लाभ रखकर विक्रय करता था। इससे उसके विश्वसनीय ग्राहकों की संख्या बढ़ते जा रही थी। सेठ के ईमानदारी का व्यवसाय खूब चला जिससे उसने काफी पैसे कमाए।

समय के साथ साथ सेठ भी बूढ़ा  हो गया।  उसके पास अपार धन सम्पदा थी किसी बात की कमी नहीं थी।  बस एक कमी थी कि उसका बेटा व्यावसायिक बुद्धि का नहीं था। सेठ बार बार अपने बेटे को व्यावसायिक शिक्षा देता था। अंत में मरते समय सेठ ने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और जीवन के अनुभवों को सारांश में अपने बेटे के सम्मुख कुछ पंक्तियों में ये बात कहा।

"साया साया आना बेटा साया साया जाना। मीठा खाना देना तो लेना मत।। "
उपरोक्त का मतलब अपने बुद्धि के अनुसार समझकर सेठ के लड़के ने घर से लेकर दूकान तक छाजन करा दिया। जिससे उसके सिर के ऊपर आते जाते समय धुप न लग सके।==> इस कार्य में उसके पिता द्वारा संचित बहुत से धन व्यर्थ ही खर्च हो गए। "मीठा खाना" का अर्थ …

गोनू झा और भाना झा, भैंस का बँटवारा ।- bhains ka bantwaara

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गोनू झा और भाना झा की कहानी  गोनू झा और भाना झा दो भाई थे ।  गोनू झा बड़े भाई अपने छोटे भाई का ख़याल रखते थे । दोनो आपस में बड़े प्यार से रहते थे । बड़े हुए दोनो की शादी हो गयी । शादी के बाद दोनो भाइयों की पत्नियों ने संकीर्ण स्वार्थ दिखाना शुरू किया । धीरे धीरे भाइयों में दूराव बढ़ता गया ।
फ़िर पंचायत बुलायी जाने लगी । पंचायत की बैठक में गोनू झा के हितैषी सरपंच ने अपना फैसला सुनाया ।
सभी समान दोनो भाइयों में  बँट जाने के बाद एक कम्बल और भैंस के बंटवारे का विवाद नही सुलझ पा रहा था। अंतत: कम्बल और भैंस का बँटवारा कूछ इस प्रकार हुआ ।  भैंस का बँटवारा ----
भैंस के आगे का हिस्सा भाना झा को और भैंस के पिछले शरीर का हिस्सा गोनू झा को ।
दिनभर भाना झा भैंस को चराते और रात को गोनू झा भैंस की दुध निकाल लेते । भैंस का गोबर भी इन्हीं के हिस्से था । कम्बल का बँटवारा --
कम्बल दिन में भाना झा के हिस्से था । रात में यह गोनू झा के सेवा में आ जाता । भाना झा इस बंटवारे से बहुत परेशान थे । दिन में भाना झा कम्बल को धोते सुखाते और रात में  यह गोनू झा  के हिस्से आता। गोनू झा रातभर कम्बल ओढ़कर चैन की नींद सोते…

खटमल और चीलर की कहानी

एक बार की बात है ।  राजा के पलंग में एक चीलर रहता था । चीलर बड़ी चालाकी से राजा के सो जाने के बाद राजा के रक्त का पान करता था ।
एक दिन राजमहल के सेवक के माध्यम से शयन कक्ष में खटमल आ गया । खटमल चुपके चुपके राजा के पलंग के पास जा पहुँचा । वहाँ छुपने का कोई उपयुक्त जगह ढूँढ़ने के क्रम में उसकी मुलाकात चीलर से हो गयी । चीलर ने अपने यहाँ आये अतिथि का यथोचित सत्कार किया ।  फिर दोनो अपने अपने जीवन यापन और जीवन शैली के बारे में एक दूसरे को बताने लगे । 
पहले खटमल ने चीलर से अपनी व्यथा सुनायी ।
खटमल  ने कहा -
- मित्र बहुत मुश्किल से राजा के क्रूर सेवकों के बीच जीवन गुजर रहा है । पेट भर रक्त भी नहीं मिल पाता और निशिदिन प्राण संकट बना रहता है ।  तुम्हारा तो यहाँ राजा के शयन कक्ष में बढिया से गुजर बसर हो रहा होगा ?
चीलर ने कहा --सुरक्षित जगह और मेरे सावधानी से दिन अच्छे कट जाते हैं । राजा के कोमल अंगों का शोणित पान करने का सौभग्य प्राप्त है मूझे । मैं राजा को गहरी नींद में सो जाने तक इंतजार करता हूँ ।
चीलर से यह सूनकर खटमल बहुत अधीर हो चला वह राजा का खून को चखने के लिय मचलने लगा । चीलर ने …

मातृभाषा के प्रति बढती उपेक्षा की भावना

Growing Sense of Neglect to the Native Language

मैं अपने घर पर माता, पिता, भ्राता और भार्या से भी अपनी मातृ भाषा भोजपुरी मे बात करता हूँ . इसके विपरीत यदि मेरे बच्चे मातृभाषा के प्रति उदासीन होकर हिंदी के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी. बच्चे बड़ी सहजता से भोजपुरी के शब्दों का हिंदी अनुवाद कर लेते हैं . उदहारण के लिए अगर मैं अपने बच्चे से पूछूं “बाबू का करतार” उत्तर मिलेगा “खा रहा हूँ पिता श्री “ मैं अपने गावं गया था तो पिता जी को यह बात रास नहीं आई . मुझसे गावं के एक व्यक्ति मिलने आये . उन्होंने मुझसे भोजपुरी में बर्तालाप किया . फिर घर की आँगन से खेलते हुए मेरा आत्मज निकला . उस व्यक्ति ने बच्चे के तरफ इशारा करते हुए पूछा? “इ राउर लईका हउवन” मैंने कहा “ह हमरे बेटाहउवन”
फिर उस व्यक्ति ने बड़ी कठिनाई से शब्दों को सजोते हुए मेरे पुत्र से पूछा
“बाबू कहा रहत हो ? बेटे का जबाब “दिल्ली रहता हूँ .

शरीर तुम्हारा अनमोल है फिर भिक्षाटन क्यों ?

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एक बार एक भिखारी एक सज्जन से भीख मांगने आया. भिखारी दीन दशा बनाए उस सज्जन से क्षुधा निवारण के लिए कुछ मांग रहा था .  उस सज्जन ने भिखारी से पूछा ? तुम भीख कयों मांगते हो ? भिखारी ने कहा मैं निर्धन हूँ इस लिए आजीविका  के लिए भिक्षाटन करता हूँ . उस सज्जन ने कहा भोले भिखारी मै देख रहा हूँ तुम बहुत धनी हो . भिखारी ने कहा कुछ भीख में दे दो साहब कयों गरीब का मजाक उड़ा रहे हो .

इसपर उस सज्जन ने कहा --> अब तुमसे मैं कुछ कीमती बस्तुएं मांग रहा हूँ .
१) सज्जन ने पूछा -तुम मुझसे १५००० रुपये ले लो और अपना बाया हाथ मुझे दे दो  भिखारी ने कहा नहीं महाशय ये हाथ मेरे अनमोल है मैं किसी कीमत पे ये नहीं दे सकता आपको क्षमा करना जी . २) अच्छा चलो ५०००० रुपये ले लो मुझे दोनों हाथ दे दो अपने भिखारी -> नहीं महाशय ये कैसी याचना है ? ३) चलो हाथ नहीं दोगे तो ५०००० रुपये में अपने एक नेत्र ही मुझे दे दो  भिखारी-> नहीं नहीं माफ़ करना जी मैं चलता हूँ 
उस सज्जन ने भिखारी को रोका और अपने यहाँ भोजन कराया . फिर उस सज्जन ने भिखारी को बताया की कोई भी व्यक्ति निर्धन नहीं है . प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत ही धनवा…

सुनो सबकी करो अपने मन की

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राजा के बकरे को भर पेट कौन खिलायेगा ?

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भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्ण. अर्थात भौतिक विषयों के भोग नहीं खत्म हुए हम मनुष्यों का जीवन ही समाप्त हो गया . तृष्णा ख़त्म नहीं हुई लेकिन विषय रसों का भोग करने वाली हमारी इन्द्रियाँ ही जीर्ण हो गयी . किसी आदमी के मुह में एक भी दांत नहीं हो लेकिन चने चबाने की तृष्णा use भी होती है . इस कहानी में एक बकरे के माध्यम से इस बात पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है. इस कहानी का पात्र रजा का एक बकरा है जिसे पेट भर खिला कर संतुष्ट कर देना है जिससे उसके सामने घास ले जाने पर वह खाने से इंकार कर दे .
कहानी कुछ इस प्रकार है . एक रजा था वह धर्म शास्त्र का ज्ञाता था . उसने अपने राज्य में एक प्रतियोगिता रखी . इस प्रतियोगिता के अनुसार राजा के बकरे को पेट भर घास खिलाकर संतुष्ट कर देना है जिससे वह सामने पड़ी घास को खाने में रूचि नहीं दिखाए . इस प्रतियोगिता को जितने वाले को यथोचित पुरस्कार दिया जायेगा. पुरे राज्य में इस प्रतियोगित की ढोल बजाकर घोषणा कर दी गयी . राजा की घोषणा सुनकर बहुत से प्रतियोगी इस प्रतियोगिता में भाग लेने आये . प्रतिभागी बारी बारी से बकरे को लेकर चराने के लिए…