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शनिवार, 9 सितंबर 2017

सेठ और बन्दर की कहानी

एक सेठ जी थे. वे शौक से बन्दर पाल रखे था. बन्दर बहुत समझदार था. वह सेठ की नक़ल किया करता था. सेठ को गिलास से पानी पीते देख वह भी गिलास से पानी पीने लगा था. सेठ जी को पंखा झलता हुआ देख कर वह मर्कट भी पंखा झलना सीख गया था. वह कभी खुद को और कभी सेठ जी को पंखा झलता . अपने बन्दर के इस व्यवहार से सेठ जी अत्यंत खुश थे.
एक दिन सेठ जी के सो जाने के बाद वह बन्दर सेठ जी को पंखा झल रहा था. तभी एक मक्खी सेठ जी के नाक पर आकर बैठी और बन्दर उस मक्खी को बार बार भगाने लगा . जैसा कुत्ता कौआ और मक्खी का स्वभाव है वो बार बार भगाने के बाद भी पुनः वही आकर बैठते हैं, मक्खी भी बार बार नाक पर आकर बैठ रही थी. बन्दर मक्खी के इस व्यवहार से बहुत क्षुब्द होकर मक्खी पर बहुत क्रोधित हो गया. वह मक्खी को जान से मार देने के लिए कोई युक्ति सोचने लगा.

वह ऐसे किसी चीज़ की तलाश करने लगा जिससे प्रहार कर वह चंचला मक्खी की जीवन लीला समाप्त कर सके . खोजते खोजेते बन्दर को एक पत्थर मिला. वह बहुत खुश हुआ. उस समय मक्खी सेठ जे के नाक पर विराजमान थी. मर्कट शीघ्रता से पत्थर उठा कर मक्खी पर दे मारा. मक्खी तो उड़ गयी लेकिन सेठ जी के नाक के आकार विकृत हो गए.     



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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

शिक्षा का महत्व - Importance of education

एक अनपढ़ युवक  शाइन बोर्ड बनाने वाले कंपनी में काम करता था . बोर्ड बनाने वाले कंपनी में लोगों के अपने प्रोफाइल और बिज़नस के बोर्ड के रिक्वायरमेंट्स आते थे. बोर्ड बन जाने के बाद वह युवक लोगों तक उनका बोर्ड पहुँचाया करता था और उनकी पत्ते पर बोर्ड लगाया करता था. यही उसकी नौकरी थी .
उस कंपनी में 3 आर्डर पेंडिंग थे जिनके काम चल रहा था
१ बोर्ड एक डॉक्टर का था जिसपर स्लोगन था ”पेट दर्द से निराश न हो”
२) बोर्ड एक होटल चलने वाले का था जिसका स्लोगन था “कृपया पुनः सेवा का मौका दें.”
३) बोर्ड एक श्मशान घाट का था जिसका स्लोगन था “मृतक के परिजन भीड़ न लगाएं “

बोर्ड बन जाने के बाद उस युवक को सभी बोर्ड इन पतों पर पहुंचाने थे . कंपनी द्वारा बताये गए पते पर बोर्ड लगाने के लिए वह सभी बोर्ड्स को अपनी युक्ति से रखकर रिक्शे पर बैठ गया . वह युवक अनपढ़ था अतः उसने अपने बुद्धि से ३ बोर्ड्स क्रमवार रख लिए .

लेकिन गलती से उसके बोर्ड बदल गए और तीनो पाटों पर इस क्रम से बोर्ड लगा दिया
१)       श्मशान घाट -> “कृपया पुनः सेवा का मौका दें.”
२)       डॉक्टर ->”मृतक के परिजन भीड़ न लगाएं”
३)       ढाबा ->”पेट दर्द से निराश न हो”

अपनी अशिक्षा के कारण उस युवक ने बहुत बड़ी गलती की . इसका complain कंपनियों की तरफ से आया और उसे नौकरी से निकल दिया गया.

शनिवार, 2 सितंबर 2017

वस्त्र जो आपको युवक बना दे, राजा और ठग की कहानी


 एक बार एक ठग नगर में फेरी लगा रहा था . वस्त्र ले लोवस्त्र ले लो युवा दिखने वाला वस्त्रनौजवान दिखने के लिए ये वस्त्र पहने. नगर के लोग बड़ी उत्सुकता से उसकी बात सुनते . धीरे धीरे ये बात राज दरबार तक पहुंची .

दरबारियों ने राजा से इस बात की चर्चा की. महाराज ! एक वस्त्र विक्रेता आया है जो ऐसे वस्त्र बेचने का दावा कर रहा  है जिसे पहन कर आदमी वय व किशोर दिखता है. अपने सभासदों से ये बात सुनकर राजा  ने उन्हें आज्ञा दिया की शीघ्र ही उस व्यापारी को हमारे सन्मुख प्रस्तुत किया जाए. राजा की आज्ञा के अनुसार उस वणिक को राजा के सम्मुख प्रस्तुत किया गया.

ठग वणिक ने राजा के तरफ बहुत विश्वास भरी दृष्टि से देखा. राजा ने बनिये से पूछा क्या तुम ऐसा वस्त्र रखे  हो जिसे धारण करने से कोई अधेड़ उम्र का व्यक्ति भी युवा दिखने लगेगा. वनिए ने स्वीकृति में सिर हिला दिया. राजा ने कहा! फिर तुम वो वस्त्र मुझे शीघ्र दिखावो.

इसपर उस ठग वस्त्र विक्रेता ने कहा!

महाराज ये वस्त्र सचमुच धारण करने वाले को युवक सदृश बना देता है लेकिन एक शर्त है. ये सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखेगा अबोध मंद्बुधि लोगों पर इसका कोई असर नहीं होगा . अर्थात आपको वस्त्र धारण किये हुए अगर कोई बुद्धिमान व्यक्ति देखता है तो आप युवक दिखेंगे वही एक मतिमंद को आप पूर्ववत दिखेंगे .

राजा ने बनिए के इस शर्त को स्वीकार कर लिया . अब राजा के दरबारी बनिए द्वारा दिए गए शर्त पर विचार कर अपने अपने को उसके अनुसार तैयार करने लगे . राजा के मंत्रीरानी तथा दुसरे मुख्य सभासदों ने सोचा की यदि राजा वस्त्र धारण करने पर हमें युवक नहीं दिखे तो हमारी नौकरी तो संकट में अतः मैं भी बोलूँगा की राजा युवक सदृश दिख रहे हैं .

राजा की अनुमति से उस ठग ने राजा के पुरे वस्त्र उतरवा दिए फिर अपने हाथ से राजा के शारीर पर कपड़ों की पट्टी लगा कर कुछ देर बाद उस पट्टी को भी उतार दिया.
राजा अब बिलकुल नग्न थे. अब ठग ने सबसे पहले राजा के मंत्री से पूछा क्या महाराज आपको युवक दिख रहे हैं . मंत्री को तो राजा नग्न ही दिख रहे थे, लेकिन अगर वह सच बोल दे तो राजा समझेंगे मेरा मंत्री मुर्ख है तभी इसको मेरा युवा शारीर नहीं दिख रहा है. यही सोचकर मंत्री ने उस ठग से कहा की महाराज तो अब सचमुच युवक दिखने लगे. इसी तरह की प्रतिक्रिया रानी और सभी सभासदों की थी .


अब राजा  ने इस ख़ुशी में जुलुस निकालने का आदेश दिया. राजा  अपने इस नए रूप में हाथी पर बैठ कर नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े. राजा को इस रूप में देखकर लोग शर्म के मारे नजरें झुका ले रहे था. राजा  इसे अपने नागरिकों का अभिवादन समझ रहे थे. कुछ दूर जाने के बाद नगर में खेल रहे बच्चों की नजर जुलुस पर पड़ी उन्होंने जोर जोर से शोर मचाना शुरू किया अपने महाराज नंगे महाराज नंगे.

बच्चों के मुख से ऐसा सुनकर राजा  ने अपने समीप बैठे मंत्री से पूछा महामंत्री ये बच्चे ऐसा क्यों कह रहें हैं . इसपर मंत्री ने कहा ! महाराज ये बच्चे अबोध हैं अतः आप इन्हें युवक नहीं दिख रहे हैं .

रजा नगर भ्रमण कर घर पहुंचे. राजा ने मंत्री को पास बुलाया. उन्होंने मंत्री से कहा हमें तो लग रहा था, वो बच्चे ही सही कह रहे थे. क्योंकि ऐसा सच बोलने में इनको कोई राज दंड का भय नहीं सता रहा था. यह बच्चों की निर्भय अभिव्यक्ति थी. वहीँ दूसरी ओर हमारे सभी सभासद रानियाँ और आप भी भयवश अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे. मंत्री ने राजा से नतमस्तक होकर माफ़ी मांगी. राजा ने अपने मंत्री से कहा भविष्य में आप किसी भी बात पर उन बच्चों की तरह निर्भय होकर प्रतिक्रिया देंगे.

  

सोमवार, 28 अगस्त 2017

धर्म की आड़ में ढोंगी, कलयुगी बाबा राम रहीम - kalyugi baaba raam rahim

हमारा भारत वर्ष सदियों से ऋषि मुनियों का देश रहा है. मोह और संशय का शमन करने के लिए लोग संतों के शरण में जाते रहे हैं .लेकिन कुछ पाखंडियों ने संत शब्द के मर्यादा का लाघव किया है .

यथार्त तो ये है कि संत मोह और संशय का शमन करने वाले नाश करने वाले होते हैं . लेकिन आजकल के ढोंगी संत संशय हरने वाले नहीं  लोगों को संशय में डालने वाले हैं . जो इन गुरुओं और बाबाओं के सरण में गया वो इनकी माया जाल में फँस कर रहा जाता है .

कलियुग के संतों में बारे में महाकवि तुलसीदास ने बताया है ->

नारी मरी गृह सम्पति नाशी | माथ मुडाई भये संस्यासी ||

कलियुग के संत स्वार्थ वश संत बनते हैं और लोगों के बीच ऐसा पाखण्ड करते हैं जैसे इनके अनुयाई को लगता है यही भगवान है जैसे हाल ही के बाबा  डेरा सच्चा सौदा प्रमुख पाखंडी "राम रहीम ".

तुलसीदास सूरदास जैसे महान संतों ने कभी अपने अनुयायियों से अपनी पूजा नहीं करवाई . उन्होंने अपने अनुयायियों को यही बताया की ईश्वर ही वन्दनीय है गुरु पथ प्रदर्शक है . तभी तो अरबों लोगों के जिह्वाग्र पर रहने वाले तुलसी दास एक संत हैं भगवान नहीं . सूरदास भी संत हैं भगवान नहीं .

अब इन कलियुग के भगवानों की सूचि पर ध्यान दीजिये 
१) बाबा रामपाल  
२) साईं बाबा 
३) राम रहीम 
४) सत्य साईं 
५) प्रेम साईं 
६ आसाराम 

सूचि तो काफी लम्बी है लेकिन उदाहरनार्थ इतने ही काफी है .

जैसे एक blanket begger साईं भगवान के रूप में लोगों में लोकप्रिय हुआ . वैसे ही बाबा राम रहीम अपने अनुयायिओं में लोकप्रियता पाने लगा था .

इन बाबा लोगों को प्रश्रय देता कौन है ?

सनातन विरोधी ब्राह्मण विरोधी जितने भी संस्कार हीन लोगों की भीड़ है वही इन बाबा लोगों के अंध भक्त बनते है .
गुरु बनाने की जो पुरानी परंपरा थी अगर हम उसका अनुसरण करते रहते तो आज हमारा समाज इतना पथ भ्रष्ट नहीं होता 

गृहस्थ का गुरु गृहस्थ और सन्यासी का गुरु सन्यासी होता है .

अब यदि गृहस्थो की भीड़ सन्यासियों के पास दीक्षा लेने पहुँच जायेगी तो अनर्थ होगा ही . सन्यासी की जीवन शैली अलग है गृहस्थ की जीवन शैली अलग है. दोनों के कर्त्तव्य पथ अलग हैं.   

गृहस्थ के कुल गुरु हुआ करते थे . जिससे गुरु की परपरा चलती थी . सभी लोगो इस परंपरा को तोड़ने में लगे हैं . एक घर में कई गुरु आ रहे है पत्नी के गुरु अलग पति के गुरु अलग और लड़का कोई गुरु अलग से लाता है .

ब्राह्मण पथ प्रदर्शक थे लेकिन आज कोई ब्राह्मणों की नहीं सुनेगा 

रविवार, 27 अगस्त 2017

राजा नहुष, स्वर्ग की प्रभुता, मद - इन्द्राणी से विवाह प्रस्ताव

वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा था . इस पाप से बचने के लिए इंद्र तपस्या करने जाने वाले थे . अब इन्द्रासन तो खाली रखा नहीं जा सकता अतः ऐसे योग्य राजा की खोज होने लगी जो इंद्र की अनुपस्थिति में कुछ दिन स्वर्ग की व्यवस्था देख सके.
धरती लोक पर नहुष उस समय बहुत प्रतापी राजा थे . नहुष के सामने सभी देवों ने स्वर्ग का कार्यभार सँभालने का प्रस्ताव रखा. नहुष ने इंद्र को यह कह कर माना कर दिया कि स्वर्ग के प्रभुता जनित मद से बचना मुश्किल है . पुनः देवतावों के बहुत विनती करने पर देवहित में रजा नहुष ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

पुरंदर नामक इंद्र राजा नहुष को स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर तपस्या को चले गए. नहुष राज काज देखने लगे . इन्द्र के सिंहासन के बगल में इन्द्राणी का सिंहासन भी था . इंद्र की अनुपस्थिति में इन्द्राणी का आसन खाली था . अस्थायी इंद्र बने नहुष ने मंत्रियों से इन्द्राणी को इंद्र की सिंहासन पर बैठने के लिए कहा . इसपर मंत्रियो ने कहा ये तभी संभव है जब आप इन्द्राणी ("शची") से विवाह कर लें और वो आपकी अर्धांगनी बने . नहुष ने शची के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा . इन्द्राणी इस प्रस्ताव से बहुत चिंतित हुई और वह इस सन्दर्भ में देवगुरु बृहस्पति  से परामर्श लेने पहुँच गयी .
गुरु बृहस्पति को समझते देर न लगी कि, नहुष के अन्दर  प्रभुता जनित अहंकार उत्पन्न हो गया है . इस अहंकार के निवारण से ज्यादा जरुरी था सती शची के सतीत्व के लिए यत्न करना .

देवगुरु ने इन्द्राणी को परामर्श दिया :-> अस्थायी इंद्र  नहुष से बोलो को वो अगर सप्तऋषियों से जुती हुई पालकी में आये तो मैं उनका वरण कर लुंगी . शची के तरफ से ऐसा सन्देश सुनकर नहुष ने शीघ्र ही सप्त ऋषियों को आपने सभा में बुलवा लिया तथा आदेश दिया की आपलोग मेरे पालकी को वहन कर इन्द्राणी तक ले चलें . राजा नहुष उस समय इंद्र थे और इंद्र राजा का बात नहीं मानना राज द्रोह होता सो ऋषियों ने इसे राजा का आदेश समझ स्वीकार कर लिया .

ऋषि कन्धों पर पालकी रखी गयी और नहुष इन्द्राणी की महल की ओर चल पड़े . इन्द्राणी के पास एक निश्चित समय तक पहुंचना था तभी नहुष का अभीष्ट सिद्ध हो पाता . लेकिन ऋषियों को शारीरिक श्रम करने की आदत नहीं थी अतः वो बार बार थक कर पालकी कंधे से उतारकर नीचे रख दे रहे थे .

नृप नहुष ऋषियों को बार बार बोलते "सर्प सर्प" ( 'तेज चलो तेज चलो ' ) . 

राजा के इस व्यवहार से ऋषि कुपित हो गए और उन्होंने राजा को शाप दिया . सर्प सर्प बोलता है जावो सर्प हो जाओ .  ऋषियों के शापवश नहुष विकराल अजगर बनकर धरती पर आ गिरे. महाभारत काल में इनका युधिष्ठिर के साथ प्रश्नोत्तर संवाद हुआ और इनका उद्धार हुआ .  

शिक्षा:-> अतः हमें धन सम्पदा और प्रभुता जनित मद ("अहंकार ") से बचना चाहिए .



सोमवार, 7 अगस्त 2017

सावन महीने के प्रसिद्धि की कहानी - Importance of the month of sawan

वसंत अगर ऋतुओं का राजा है तो वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा गया है. और इस बरसात में भी सावन का महीना विशेष मनभावन होता है. सावन के महीने को कई बातों से महत्वपूर्ण माना जाता है . सावन के महीने की प्रसिद्धि की कहानी कुछ इसप्रकार है :->

पौराणिक संदर्भ
एक बार सनत कुमारों ने भगवन शिव से सावन के महीने की प्रसिद्धि का कारण पूछा. भगवन शिव ने संताकुमारों से दक्ष प्रजापति सुता सती की कहानी सुनाई. भगवन शिव ने कहा -> दक्ष यज्ञ में मेरा अपमान न सहन कर सकने के कारण सती ने योगाग्नि से शरीर जला लिया था. सती को प्रत्येक जन्म में मेरा ही सानिद्ध्य पाने का वरदान है . अतः सती ने अगले जन्म में पर्वत राज हिमालय के यहाँ पार्वती के रूप में जन्म लेकर कठोर तप किया और मुझे पुनः पति के रूप में प्राप्त किया . इससे इस महीने का विशेष महत्व है .
ऐसा भी कहा जाता है की समुद्र मंथन के बाद कालकूट विष भी इसी महीने में निकला था . भगवान शिव ने जन कल्याण के लिए इसी महीने में उस हलाहल का पान किया था .
मृकंदु ऋषि के पुत्र मार्कंडेय जी को आल्पयु योग था . भगवान शिव की कठोर तपस्या से उन्हें अमरत्व प्राप्त हुआ . मार्कंडेय जी जे सावन के पवित्र महीने में ही भगवन शिव की आराधना की थी .
सावन के महीने में सबसे ज्यादा वृष्टि होती है . जिससे भगवान भोले नाथ जिनका विष धारण करने से शरीर उष्ण बना रहता है सावन के फुहारों से ठंढक की अनुभूति होती है .
सावन के महीने से चातुर्मास व्रत का आरम्भ होता है . चातुर्मास व्रत भगवान विष्णु के अराधना को समर्पित है. इसी महीने में भाई बहन के प्यार का प्रतीक रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार आता है . योगी यति साधक इस पवित्र मास से अपने सुविधा अनुसार व्रत नियम का पालन करते हैं .    

ज्योतिषीय सन्दर्भ

पूर्णिमा तिथि को जो नक्षत्र होता है वही उस महीने का नाम होता है . सावन महींने के पूर्णिमा को श्रावणा नक्षत्र होता है इसीलिए इस महीने का नाम श्रावण पड़ा है . 

वरदराज की कहानी - story of varadraj

प्राचीन काल में छात्र गुरुकुल में ही रह कर पढ़ा करते थे . अब की तरह कान्वेंट school का चलन नहीं था . छात्र यज्ञोपवित संस्कार के बाद शिक्षा ग्रहण के लिए गुरुकुल में चले जाते थे . गुरुकुल में गुरु के समीप रह कर आश्रम की देख भाल किया करते थे और अध्ययन भी किया करते थे .

वरदराज एक ऐसा ही छात्र था . यज्ञोपवित संस्कार होने के बाद उसको भी गुरुकुल में भेज दिया गया . वरदराज आश्रम में जाकर अपने सहपाठियों के साथ घुलने मिलने लगा . आश्रम के छात्रों और सहपाठियों से उसके मित्रवत सम्बन्ध थे . वरदराज व्यावहारिक तो बहुत था लेकिन था जड़ मति का . जहा गुरु जी द्वारा दी गयी शिक्षा  को दुसरे छात्र आसानी से समझ जाते वहीँ वरदराज को काफी मेहनत करना पड़ता और वो समझ नहीं पाता .
गुरु जी वरदराज को आगे की पंक्ति में बैठाकर  विशेष ध्यान देने लगे . लेकिन फिर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता दिख रहा था . गुरूजी को वरदराज के अशिक्षा से बहुत दुःख होता गुरूजी उसके लिए विशेष प्रयत्न करते जाते . वरदराज के वर्ग के सारे साथी उच्च वर्ग में चले गए लेकिन वरदराज उसी वर्ग में पड़ा रहा . वरदराज के प्रति अपने सारे प्रयासों से थक कर गुरु जी उसे जड़मति मानकर एक दिन आश्रम से निकाल दिए .

अपने साथियों से अलग होता हुआ वरदराज भारी मन से गुरुकुल आश्रम से विदा होंने लगा . दुःख तो बहुत हो रहा था उसे इस वियोग का लेकिन वो कुछ कर नहीं सकता था .

अवसाद से उसके मुख सूखे जा रहे थे . वह पानी की तलाश में कोई जलाशय ढूढने लगा . मार्ग में कुछ दूर चलने पर उसे एक कुआं दिखाई दिया . कुवें के जगत पर चिंतामग्न जा कर बैठ गया .

वहां वह देखता है की कुए से एक चरखी लगी है जिसकें  सहारे एक मिटटी का पात्र बंधा है . कुए के जगत पर एक शिला पड़ी है जिसपर मिट्टी के बर्तन का गहरा निशान पड़ा है .
वरदराज के दिमाग में यह बात कौंध गयी . वह सोचने लगा . कैसे मिटटी का एक कमजोर पात्र(" क्षण क्षण जिसके टूटने का डर बना रहता है वह") एक कठोर पत्थर पर इतना बड़ा दाग बना दिया है ?
अवश्य ही मटके का यह निरंतर प्रयास है जिसके कारण यह संभव हुआ है .

जब के मिटटी का पात्र  बार बार के प्रयास से ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं . वह वापस आश्रम की वोर लौट गया . कहा जाता है वरदराज को आश्रम से उस कुए तक आने में जो समय लगा था उससे आधे समय में वह आश्रम वापस आ गया और गुरु जी के चरणों में लिपट गया .

गुरु जी ने उसे वापस आने का कारन पूछा तो वरदराज ने कुए के समीप में अपनी सारी आपबीती सुना दी . गुरु जी को वरदराज के मुख अब नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था . उन्होंने उसे फिर से पढ़ाना शुरू किया .

अब वरदराज बदल चूका था . निरंतर अभ्यास से उसने जटिल से जटिल सूत्रों को समझ लिया . वह अपने साथियों को पाणिनि के व्याकरण सूत्रों को भाष्य कर समझाने लगा . आगे चलकर यही वरदराज लघुसिद्धांत 
कौमुदी नामक किताब लिखा .

सोमवार, 26 जून 2017

भिखारी के कल्पना की कहानी

एक भिखारी था भिक्षाटन से जो कुछ भी धन मिलता उसे वो संचित करता और उस संचित धन से अपने भविष्य सुधारने की योयना बनाते रहता. पुराने ज़माने में भिक्षाटन करने वालों को भीख में आनाज ही मिला करता था. चावल और आटा जैसे अन्न जो क्षुधा निवारण के लिए सबसे उपयुक्त और सुलभ थे लोग भिक्षादान में अधिकांशत: उपयोग किया करते थे .

भिखारी दिन भर घूमता और लोगों से भीख में जो धन आदि मिलता उसे लाकर अपने कुटिया में खूंटी के ऊपर लटका देता. खूंटी पर लटकी अनाज की मटकी एक तो अन्न को चूहों से सुरक्षित रखती और दूसरी उस याचक के स्वप्नील कल्पना को बल भी प्रदान करती . इसी तरह उसने अपने कटिया में अनाजों की परिधि बना लिए. अबतो उसकी कुटिया में चारो तरफ मटकियाँ ही मटकियाँ लटकी थीं .

एक दिन भिखारी अपने कुतिया में लटके हुए मटकियों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ .अपने मन में वह अपने सुन्दर भविष्य के बारे में सोचने लगा. मेरे पास इतने अन्न हो गए हैं अब मैं इन्हें बेचकर बहुत सारी मुद्राएँ अर्जित कर सकता हूँ . इन मुद्राओं से में सुख और वैभव के बहुत से साधन खरीदूंगा . इसतरह मुझे कोई धनी व्यक्ति मुझे अपनी कन्या दे देगा . उस स्त्री के साथ मैं सुख पूर्वक रहूँगा. मुझे तरह तरह के छपन भोग खाने को मिलेंगे. अबतक मैं प्याऊ या अन्य धर्म स्थलों पर लोगों से पानी मांगकर पीते रहा हूँ. अब तो मेरी संताने होंगी मैं अपने बेटे से पानी मांग कर पिऊंगा . बेटा यदि पानी देने से मन करता है तो इसी लाठी से ऐसे ही घुमाकर एक लाठी मारूंगा.

भिक्षुक अपनी कल्पना में इतना खो गया था की अपने पास राखी लाठी को सच में कुटिया में घुमा मारा . इसतरह कुटिया में टंगी मटकियों के सारे अनाज आटा आदि बाहर बिखर गए..


रविवार, 11 जून 2017

जब घोड़ों के खिलाफ गधों ने जंग जीती

एक बार के राजा को अपने पडोसी शत्रु राजा के साथ युद्ध करना पड़ा।  युद्ध बहुत दिन तक चला और राजा के बहुत सारे सैनिक और हज़ारों घोड़े मारे गए। इस युद्ध में राजा अपने राज्य का एक महत्वपूर्ण भूभाग हार गया। राजा को अपने हारे हुए राज्य का हिस्सा वापस लेना था.  युद्ध क्षेत्र ऐसे स्थान पर था  जहाँ सिर्फ घुड़सवार  सैनिक से ही युद्ध जितना संभव था।  राजा ने  अपने मंत्री से इस विषय में मंत्रणा की।  राजा का मंत्री बहुत होशियार था। उसने राजा से कहा महाराज ! अपने प्रधान सेनानायकों के साथ एक बैठक की जाए।

बैठक में  निर्णय  लिया गया की अपने पास सैनिकों की कमी तो पूरा की जा सकती है लेकिन युद्ध के घोड़ों की कमी नहीं पूरी की जा सकती। इसके लिए हम अपने राज्य में सुलभ गदहों से काम चला लेंगे। जिन जिन धोबियों के पास गदहे हैं उन सभी धोबियों को निर्देश दिया जाए कि,  वो  राज दरबार में उपस्थित हो। राजा के कर्मचारी पुरे नगर में ढोल बजाकर इस बात की घोषणा कर दिए. राजाज्ञा का पालन करते हुए सभी धोबी राज दरबार में उपस्थित हुए। राजा के मंत्री ने सभी धोबियों को सम्बोधित करते हुए कहा। आप सभी के पशु हमारे घुड़सवार सैनिकों की सेवा में बहाल किये जाएंगे। इस राज संकट की स्थिति में आप के गधे ही हमारे लिए घोड़े हैं।  आप अपने पशुओं को अच्छी तरह खिलाईये और इन्हे दौड़ने का प्रशिक्षण दीजिये।

मंत्री के मुख से ऐसा सुनकर सभी धोबी बहुत हर्षित हुए और अपने अपने घर चले गए। सभी अपने अपने पशु पर विशेष ध्यान देने लगे। कईयों ने गधो के आहार दोगुना कर दिए. इसी क्रम में कई लोग अपने गधे के दौरने के साथ साथ यथासंभव युद्ध कला का प्रशिक्षण भी देने लगे। इस एक महीने के विशेष ध्यान पर सभी गधे मोटे तगड़े और पहले से  ज्यादा फुर्तीले हो गए। कई गधों की हरकत देखकर उनके गधा होने पर संदेह होने लगता।

इतिहास में पहली बार गधों का चयन प्रक्रिया से चयन हुआ.  सभी गधे राजा की घुड़सवार सैनिकों की सेवा में लगा दिए गए।
राजा ने शत्रु राजा के खिलाफ युद्धः की उद्घोषणा स्वरुप शंखनाद किया। विजय की मद में चूर शत्रु राजा ने राजा के सैन्य समर्थ का अवमूल्यन किया। परिणामस्वरूप राजा इस युद्ध में गधे सवार सैनिकों से घुड़सवार सैनिकों के खिलाफ युद्ध जीत गया.

अब सभी सेनानायकों ने मंत्री जी से गधों के युद्ध में योगदान की प्रसंसा की और इन्हे पुरस्कृत करने का सुझाव दिया। राजा का मंत्री बहुत बुद्धिमान था उसने सेनानायकों से कहा मैंने इन गधो को परिस्थिति विशेष के लिए घोड़े मान लिए थे। ये गधे पुरस्कृत जरूर किये जाएंगे लेकिन अगली संभावित लड़ाई हम घोड़ों से ही लड़ेंगे।

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गुरुवार, 18 मई 2017

सर्टिफिकेट सियार का

सियारों से कुत्तों की दुश्मनी बहुत पुराणी है।  इससे सम्बंधित कई किस्से कहानियाँ हैं।  आईये ऐसे ही एक रोचक कहानी के बारे में जानते हैं। इस कहानी के मुख्य पात्र हैं। सियार सियारिन और कुत्ते।
सियारों को उनसे नगर में रहने का अधिकार छीन गया था तब से सियार जंगल में रहने लगे थे और कुत्ते गावं में।  जब भी साहस कर सियार गावं में आने की कोसिस करते कुत्ते उन्हें भों भों कर भगा देते।


एक दिन एक सियार को कोई पत्र मिला।  वह उस पत्र को मुहं में दबाये हुए घर पहुंचा।  घर पहुँच कर उसने बड़े प्यार से सियारिन को आवाज लगायी।
प्रिये सुनती हो ! प्रिये सुनती हो। ....

अरे भाग्यवान सुनती हो !

सियारिन ने कहा -->आयी जी बच्चों को खिला रही हूँ थोड़ा देर इन्तजार कर लो। कुछ भन भनाते हुए सियारन दरवाजे पर आ गयी. ये सब तो मेरे ही जिम्मे हैं न पैदा कर छोड़ दिए मुझ पर। मैं न देखूं तो इन्हे कौन देखेगा। आप तो बाहर घूमते रहते हो कभी मेरे बारे में भी सोचा है।  मेरा भी मन करता है कही घुमाने जाने का बाहर का खाने का।

सियार ने अपने मुँह में दबाये हुए कागज़ को जमीन पर रखते हुए उसे पैरों से दबाते हुए बोला। इसे पढ़ो पगली। अब पुरानी बात नहीं रही। अच्छे दिन आ गए हैं।
सियारिन चौंक कर बोली !
कैसे अच्छे दिन कौन से अच्छे दिन। सियार ने उसे समझाते हुए कहा ! पहले हमलोगों को सबजगह घूमने की आजादी नहीं थी. हमें वो आजादी मिल गयी है। ये आजादी का प्रमाण पत्र है जिसे अँग्रेजी मे certificate of liberty भी कहते हैं ।
यह सुनकर सियारिन बहुत खुश हुई सुबह जल्दी उठकर नाश्ता बनाया और पाथेय भी रख लिया। पति और बच्चों के साथ निकल पड़ी यात्रा का आनंद लेने।

सपत्नीक सियार अभी नगर के समीप पहुंचे नहीं थे की कुत्तों ने उनपर भों भों का बाक प्रहार करना शुरू कर दिया।
अब सियार का परिवार उलटे पाँव वापस जंगल की ओर जाने को मजबूर हो गया।
सियार की ऐसी दशा देख कर सियारिन बोली आप certificate क्यों नहीं दिखाते आप certificate क्यों नहीं दिखलाते ?
सियार पत्नी की बात की अनसुनी कर उलटे पाँव भागता गया। सियारन भी पति का अनुसरण करते हुए हाँफते हुए बार बार यही पूछती आप इन्हे सर्टिफिकेट क्यों नहीं दिखाते

थका सियार सियारन से बार बार यही समझाता।
भागो  भागो जान बचावो ये सब अनपढ़ हैं certificate की भाषा नहीँ समझेंगे ।

शनिवार, 22 अप्रैल 2017

श्रद्धालु और ईर्ष्यालु की कहानी

ईर्ष्यालु व्यक्ति की कहानी।  
"श्रद्धालु" और "ईर्ष्यालु" नाम के दो पडोसी थे। दोनों में आपस में काफी घनिष्ठता थी। दोनों ने मिलकर तपस्या करने का विचार किया। दोनों तपस्या पर चले गए और भगवान शिव की आराधना करने लगे।  बहुत दिन तक तपस्या में लगे रहे। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए।  भगवान शिव ने उन दोनों से वर मांगने को कहा ।

श्रद्धालु ने भगवान् शिव से वरदान माँगा -->
भगवन मैं जब भी आपकी पूजा  अर्चना करके आपसे कोई वरदान मांगू तो आप मुझपर प्रसन्न होकर वरदान को सफल बनाये। 
भगवान शिव ने कहा तथास्तु !

अब "ईर्ष्यालु" की बारी थी -->

"ईर्ष्यालु" ने भगवान शिव  से वरदान माँगा। भगवान आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जो कुछ वरदान में "श्रद्धालु" को मिले उससे दोगुना मुझे मिल जाए।  

भगवान आशुतोष ने एवमस्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए।



"श्रद्धालु" भगवान शिव की नित्य पूजा पाठ करता और अपने जरुरत के अनुसार शिव से वरदान माँग लेता। 

"श्रद्धालु" ने एक दिन पूजा करके भगवान शिव से अपने लिए एक सुन्दर सा घर माँगा। भोले नाथ के वरदान के अनुसार "श्रद्धालु" को  १ सुन्दर सा घर मिल गया साथ ही पडोसी "ईर्ष्यालु" को भी २ घर मिल गए। "श्रद्धालु" इस घर में सुख पूर्वक रहने लगा।  

कुछ दिन बाद "श्रद्धालु" ने अपने घर के पास एक मीठे जल के कुएं की याचना किये। शीघ्र ही शिवभक्त के घर के आगे एक कुआँ तैयार हो गया। वरदान की शर्त के अनुसार "ईर्ष्यालु" को भी २  कुआँ मिल गया। 

इसतरह भक्त "श्रद्धालु" जो कुछ भी मांगता "ईर्ष्यालु" को उससे  दोगुना मिल जाता। 

"श्रद्धालु" को इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। "ईर्ष्यालु" को "श्रद्धालु" से सबकुछ दोगुना मिलने के बाद भी सुख देखा नहीं जा रहा था। "ईर्ष्यालु" अपने पडोसी "श्रद्धालु" के प्रति ईर्ष्या और कुटिलता दर्शाने लगा। "ईर्ष्यालु" के इस व्यवहार से "श्रद्धालु" को बहुत दुख होता। 

"श्रद्धालु" दिखने में भोला प्रतीत होता था लेकिन था बुद्धिमान।  उसने "ईर्ष्यालु" को सबक सिखाने की ठानी। 

शिव की पूजा अर्चना करके "श्रद्धालु" ने भगवान शिव से वरदान माँगा की भगवान मेरे एक आँख ले लो। 
भगवान शिव को अपने भक्त की इस याचना पर आश्चर्य तो जरूर हुआ।  लेकिन वरदान की शर्त के अनुसार "श्रद्धालु" की एक आँख की रोशनी चली गयी। साथ साथ पडोसी "ईर्ष्यालु" भी सुबह सुबह दोनों आंखों से अँधा हो गया। 

"ईर्ष्यालु" को अपने किये की सजा मिल गयी थी वो नेत्र विहीन हो गया था।
"ईर्ष्यालु" ने अपने बेटे को "श्रद्धालु" के घर झाँकने को कहा और उसकी स्थिति के बारे में पूछा। बेटे ने कहा -->पिता जी !  "श्रद्धालु " चाचा तो एक आँख से काने हो गए हैं।

"ईर्ष्यालु" को अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था। कही "श्रद्धालु" ऐसे ही एक दो और वरदान न मांग बैठे इसकी चिंता सता रही थी। इसलिए अपने बेटे की अंगुली पकड़ कर पडोसी के घर पहुँच गया तथा क्षमा याचना की और किये हुए कुकृत्यों का प्रायश्चित किया। 

इस प्रायश्चित से उसके सारे पाप धूल गए। "ईर्ष्यालु" के दोनों नेत्र तो वापस नहीं मिल पाए लेकिन ईर्ष्या की अग्नि जो उसे जला रही थी वो हरदम के लिए शांत हो चुकी थी। वो पहले से ज्यादा सुखी अनुभव कर रहा था।   

Moral -> ईर्ष्या से सुख नहीं मिलने वाला चाहे आपके पास जितनी सम्पति मिल जाए। 
   

  

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

लंगर की कहानी Reliance जियो के सन्दर्भ में


एक व्यक्ति नित्य लंगर चलाता था

लंगर मे खाने वालों की संख्या नित्य प्रतिदिन बढ़ती गयी ।

फ़िर एक दिन उस व्यक्ति ने लंगर के टेबल पर एक तरफ़ दान पेटी रख दी ।

दान पेटी पर लिखा था आप धर्मार्थ स्वैच्छिक दान दे सकते हैं ।

अब प्रसाद पाने के बहाने खाने आने वाले की संख्या दिन प्रति दिन घटने लगी ।

लंगर के आयोजक व्यक्ति समाज शास्त्री भी थे ।

भीड़ के इस व्यवहार से उन्हे अपने विषय पर शोध करने का अवसर भी मिल रहा था। कूछ दिन तक यूँ ही चलता रहा। फिर एक दिन अप शोध के क्रम में लंगर आयोजित करने वाले व्यक्ति ने दान पेटी को बदल दिया । अब दान पेटी पर लिखा था ।

धर्मार्थ न्यूनतम 1 रुपये दान पेटी मे डालें ।

लोग अब भी आते और jio की कस्टमर की तरह मुफ्त का खा कर चले जाते। लोग खाने के बाद सोचने पर मजबूर हो जाते कि दान पेटी मे पैसे डालूं या न डालूं । धीरे धीरे लोग दान पेटी मे 1 रुपये डालने लगे ।

वो लोग जिनको दान पेटी में 1 रुपये डालने में हिचकिचाह महसूस हो रही थी धीरे धीरे लंगर में आना छोड़ दिए .

यह कहानी jio के कुछ उपभोक्ताओं पर भी सार्थक सिद्ध होती दिखती है .

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सेठ का अपने बच्चे को सीख


कपडे का एक व्यापारी था।  वह बहुत मन लगाकर अपना व्यवसाय करता था।  अपने दिनचर्या का पालन करता था और नित्य सुबह दूकान पर पहुँच जाता था।  दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी   . सेठ अपने कपड़ों पर उचित लाभ रखकर विक्रय करता था। इससे उसके विश्वसनीय ग्राहकों की संख्या बढ़ते जा रही थी। सेठ के ईमानदारी का व्यवसाय खूब चला जिससे उसने काफी पैसे कमाए।


समय के साथ साथ सेठ भी बूढ़ा  हो गया।  उसके पास अपार धन सम्पदा थी किसी बात की कमी नहीं थी।  बस एक कमी थी कि उसका बेटा व्यावसायिक बुद्धि का नहीं था। सेठ बार बार अपने बेटे को व्यावसायिक शिक्षा देता था। अंत में मरते समय सेठ ने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और जीवन के अनुभवों को सारांश में अपने बेटे के सम्मुख कुछ पंक्तियों में ये बात कहा।


"साया साया आना बेटा साया साया जाना। मीठा खाना देना तो लेना मत।। "

उपरोक्त का मतलब अपने बुद्धि के अनुसार समझकर सेठ के लड़के ने घर से लेकर दूकान तक छाजन करा दिया। जिससे उसके सिर के ऊपर आते जाते समय धुप न लग सके।==> इस कार्य में उसके पिता द्वारा संचित बहुत से धन व्यर्थ ही खर्च हो गए।
"मीठा खाना" का अर्थ वणिक पुत्र ने कुछ इस प्रकार समझा --खाने में मीठा का सेवन करना है। अतः वह "गुड़" खाने लगा। ==> अधिक गुड़ के सेवन से उसका स्वास्थ्य विगड़ने लगा।
"देना तो लेना मत" - का अनुपालन कर सेठ के लड़के ने जिस जिस व्यक्ति को उधार में कपडे दिए उससे पैसे नहीं मांगे। ==> ज्यादा उधार होने के कारण उसके व्यवसाय की व्यवस्था विगड़ गयी।

वणिक पुत्र अपने पिता के सीख का गलत अर्थ निकालकर बहुत दुखी हुआ। एक दिन सेठ की दूकान पर  एक महात्मा जी आये। सेठ ने महात्मा जी से अपनी सारी व्यथा सुनाई। पिता के मरते समय दिए हुए सीख को भी महात्मा जी के समक्ष रखा तथा उन सीख का अपने मति के अनुसार किये गए अनुपालनो को भी बताया।

महात्मा जी बात को समझते देर न लगी उन्होंने सेठ द्वारा मरते समय दिए गए सीख का सही अर्थ लगा दिया।

"साया साया आना बेटा साया साया जाना"  से तात्पर्य है सुबह सुबह दूकान पर पहुँच जाना  और शाम को सूर्यास्त के बाद दूकान से घर आना। इसप्रकार वणिक पुत्र दूकान पर ज्यादा समय दे सकता है।

"मीठा खाना" का  आशय था खान पान मधुर रखना जिससे स्वास्थय सही रहे और वो नित्य प्रति दूकान पर जा सके।

"देना  तो लेना मत " से तात्पर्य है उधार का व्यवसाय नहीं करना। अर्थात उधार सामान देकर फिर  पैसे  मांगने के लिए बार बार क्रेता के घर नहीं जाना।

इसप्रकार माहत्मा द्वारा बताये गए सही अर्थो को समझ कर उनका अनुसरण करने से से सेठ के बेटे  का दुःख दूर हो गया।
   

बुधवार, 15 मार्च 2017

गोनू झा और भाना झा, भैंस का बँटवारा ।- bhains ka bantwaara

गोनू झा और भाना झा की कहानी

 गोनू झा और भाना झा दो भाई थे ।  गोनू झा बड़े भाई अपने छोटे भाई का ख़याल रखते थे । दोनो आपस में बड़े प्यार से रहते थे । बड़े हुए दोनो की शादी हो गयी । शादी के बाद दोनो भाइयों की पत्नियों ने संकीर्ण स्वार्थ दिखाना शुरू किया । धीरे धीरे भाइयों में दूराव बढ़ता गया ।
फ़िर पंचायत बुलायी जाने लगी । पंचायत की बैठक में गोनू झा के हितैषी सरपंच ने अपना फैसला सुनाया ।
सभी समान दोनो भाइयों में  बँट जाने के बाद एक कम्बल और भैंस के बंटवारे का विवाद नही सुलझ पा रहा था।

अंतत: कम्बल और भैंस का बँटवारा कूछ इस प्रकार हुआ । 

भैंस का बँटवारा ----
भैंस के आगे का हिस्सा भाना झा को और भैंस के पिछले शरीर का हिस्सा गोनू झा को ।
दिनभर भाना झा भैंस को चराते और रात को गोनू झा भैंस की दुध निकाल लेते । भैंस का गोबर भी इन्हीं के हिस्से था ।
कम्बल का बँटवारा --

कम्बल दिन में भाना झा के हिस्से था । रात में यह गोनू झा के सेवा में आ जाता । भाना झा इस बंटवारे से बहुत परेशान थे । दिन में भाना झा कम्बल को धोते सुखाते और रात में  यह गोनू झा  के हिस्से आता। गोनू झा रातभर कम्बल ओढ़कर चैन की नींद सोते। 

भाना झा इससे दुखी होकर अपने  मित्र से  मिलने  गये और अपनी सारी व्यथा उसे सुनाई। उनका मित्र बहुत समझदार  था।  उसने भाना  झा से सारी  बातें  सुनने के बाद  कुछ सुझाव दिए।

सुझाव  कुछ  प्रकार है। 


भाना झा  के मित्र  ने कहा कि , तुम्हारे हिस्से में भैंस का अगला हिस्सा है। इस हिस्से पर तुम कुछ कर भी हो।  जब गोनू झा भैंस का दूध  निकाल रहे हों तब तुम भैंस के मुंह पर लाठी से प्रहार करना। दिन भर कम्बल को गिला रखना। 

अब भाना  झा दिन में कम्बल को पानी में भिंगोये रखने लगे। भैंस के दूध निकालने  का समय होता तो भैंस के   मुंह पर लाठी से मारने लगते। 
गोनू झा अपने करतूत  पर पछताने लगे और भाना झा को भैंस के दूध में बराबर का हिस्सा दिया। बड़े भाई गोनू झा ने हमेशा के लिए कम्बल  भाना झा को दे दिया। 

मंगलवार, 14 मार्च 2017

खटमल और चीलर की कहानी

एक बार की बात है ।  राजा के पलंग में एक चीलर रहता था । चीलर बड़ी चालाकी से राजा के सो जाने के बाद राजा के रक्त का पान करता था ।

एक दिन राजमहल के सेवक के माध्यम से शयन कक्ष में खटमल आ गया । खटमल चुपके चुपके राजा के पलंग के पास जा पहुँचा । वहाँ छुपने का कोई उपयुक्त जगह ढूँढ़ने के क्रम में उसकी मुलाकात चीलर से हो गयी । चीलर ने अपने यहाँ आये अतिथि का यथोचित सत्कार किया ।  फिर दोनो अपने अपने जीवन यापन और जीवन शैली के बारे में एक दूसरे को बताने लगे । 

पहले खटमल ने चीलर से अपनी व्यथा सुनायी ।

खटमल  ने कहा -
- मित्र बहुत मुश्किल से राजा के क्रूर सेवकों के बीच जीवन गुजर रहा है । पेट भर रक्त भी नहीं मिल पाता और निशिदिन प्राण संकट बना रहता है ।  तुम्हारा तो यहाँ राजा के शयन कक्ष में बढिया से गुजर बसर हो रहा होगा ?

चीलर ने कहा --सुरक्षित जगह और मेरे सावधानी से दिन अच्छे कट जाते हैं । राजा के कोमल अंगों का शोणित पान करने का सौभग्य प्राप्त है मूझे । मैं राजा को गहरी नींद में सो जाने तक इंतजार करता हूँ ।


चीलर से यह सूनकर खटमल बहुत अधीर हो चला वह राजा का खून को चखने के लिय मचलने लगा । चीलर ने भरोसा दिलाया कि मैं आज़ रात को तुम्हे उपयुक्त समय पर राज शोणित चखने का मौका दूँगा ।रात हुई राजा अपने शयन कक्ष में आ गये ।  चीलर ने खटमल को समझाया कि , जल्दीबाजी मत करना पूरी तरह से नींद में आने पर ही नृप के समीप जाना । थोड़ी देर तो  खटमल मान गया , लेकिन उसकी अधीरता ने बाध्य कर दिया । राजा अभी पूरी तरह नींद में सोया न था तभी खटमल ने हमला कर दिया ।

राजा की वेदना स्वर सूनकर कई सेवक शयन कक्ष में आ गये ।  उन्होंने खटमल को ढूँढ निकाला और साथ में  चीलर भी पकड़ा गया । इस तरह एक दुष्ट मित्र की घृष्टता से मित्र की जान  चली गयी

सोमवार, 6 मार्च 2017

मातृभाषा के प्रति बढती उपेक्षा की भावना

Growing Sense of Neglect to the Native Language



मैं अपने घर पर माता, पिता, भ्राता और भार्या से भी अपनी मातृ भाषा भोजपुरी मे बात करता हूँ .
इसके विपरीत
यदि मेरे बच्चे मातृभाषा के प्रति उदासीन होकर हिंदी के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी. बच्चे बड़ी सहजता से भोजपुरी के शब्दों का हिंदी अनुवाद कर लेते हैं .
दहारण के लिए
अगर मैं अपने बच्चे से पूछूं
“बाबू का करतार”
उत्तर मिलेगा
“खा रहा हूँ पिता श्री “
मैं अपने गावं गया था तो पिता जी को यह बात रास नहीं आई .
मुझसे गावं के एक व्यक्ति मिलने आये . उन्होंने मुझसे भोजपुरी में बर्तालाप किया .
फिर घर की आँगन से खेलते हुए मेरा आत्मज निकला .
उस व्यक्ति ने बच्चे के तरफ इशारा करते हुए पूछा?
“इ राउर लईका हउवन”
मैंने कहा
“ह हमरे बेटा  हउवन”

फिर उस व्यक्ति ने बड़ी कठिनाई से शब्दों को सजोते हुए मेरे पुत्र से पूछा

“बाबू कहा रहत हो ?
बेटे का जबाब
“दिल्ली रहता हूँ .

.....
“मुझे दिल्ली लेई चलोगे”
“हाँ ले चलूँगा “

मेरे पिता जी वही बैठे थे सब देख रहे थे .
उस व्यक्ति के जाने के बाद उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा ! लोग किस तरह अन्धानुकरण कर रहे हैं विवेक शून्य होकर ये देख रहे हो न ?
मैंने तात्पर्य नहीं समझा
पिताजी बोले !
“हिंदी बच्चों के लिए विशेष अपरिहार्य भाषा बन गयी . जैसे आपको मवेशियों से बात करने के लिए अलग भाषा(विशेष शब्द सांकेतिक भाषा)  का प्रयोग करना पड़ता है. ठीक उसी प्रकार ये आजकल के बच्चे भी अपनी मातृभाषा भोजपुरी नहीं समझ पा रहे हैं .”

इस quote  के बाद मैं उनके बिचार से सहमत हो गया . और अपने बच्चों को परस्पर पारिवारिक बोलचाल में हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर दिया .

आप सभी मित्रों से निवेदन है की आप जिस पवित्र भूभाग से सम्बन्ध रखते हों आप उस क्षेत्रीय भाषा को उपेक्षा का शिकार मत होने दीजिये.    


रविवार, 19 फ़रवरी 2017

शरीर तुम्हारा अनमोल है फिर भिक्षाटन क्यों ?

एक बार एक भिखारी एक सज्जन से भीख मांगने आया. भिखारी दीन दशा बनाए उस सज्जन से क्षुधा निवारण के लिए कुछ मांग रहा था . 
उस सज्जन ने भिखारी से पूछा ? तुम भीख कयों मांगते हो ? भिखारी ने कहा मैं निर्धन हूँ इस लिए आजीविका  के लिए भिक्षाटन करता हूँ . उस सज्जन ने कहा भोले भिखारी मै देख रहा हूँ तुम बहुत धनी हो . भिखारी ने कहा कुछ भीख में दे दो साहब कयों गरीब का मजाक उड़ा रहे हो .


इसपर उस सज्जन ने कहा --> अब तुमसे मैं कुछ कीमती बस्तुएं मांग रहा हूँ .

१) सज्जन ने पूछा -तुम मुझसे १५००० रुपये ले लो और अपना बाया हाथ मुझे दे दो 
भिखारी ने कहा नहीं महाशय ये हाथ मेरे अनमोल है मैं किसी कीमत पे ये नहीं दे सकता आपको क्षमा करना जी .
२) अच्छा चलो ५०००० रुपये ले लो मुझे दोनों हाथ दे दो अपने
भिखारी -> नहीं महाशय ये कैसी याचना है ?
३) चलो हाथ नहीं दोगे तो ५०००० रुपये में अपने एक नेत्र ही मुझे दे दो 
भिखारी-> नहीं नहीं माफ़ करना जी मैं चलता हूँ 

उस सज्जन ने भिखारी को रोका और अपने यहाँ भोजन कराया . फिर उस सज्जन ने भिखारी को बताया की कोई भी व्यक्ति निर्धन नहीं है . प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत ही धनवान बनायीं है . आदमी भ्रम वश अपने को निर्धन मानकर दुखी हो दर दर भटकता नहीं .

अब तू तुझे पता चल गया होगा  तुम कितने धनवान हो . जाओ इस धन का सदुपयोग करो

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

सुनो सबकी करो अपने मन की



सुनो सबकी करो अपने मन की
एक बार एक आदमी अपने सिर पर बकरा लिए जा रहा था . रास्ते में बकरा ले जाते हुए तीन ठगों ने देख लिया . वो ठग उस आदमी से बकरा लेने के लिए युक्ति बनाने लगे. इसके लिए उन तीनो ठगों ने एक योजना बनायीं. सॉर्ट कट रास्ते से वो तीनों ठग उस पथिक से आगे निकल गए. कुछ किलोमीटर की अंतराल पर वे तीनों योजनाबद्थ तरीके से खड़े हो गए रास्ते में उस पथिक को देख पहला ठग उसके साथ साथ चलने लगा 
पहले ठग ने कहा .
भाई साहब ये खरगोस कितने में लिए . पथिक ने उस ठग के बात को अनसुना कर अपनी यात्रा जारी रखी . ठग पुनः पूछा खरगोस बहुत अच्छा है मुझे भी लेना था ये कितने में लिए आपने . इसपर पथिक चौक गया और अपने सिर से बकरे को उतर कर देख फिर सिर पर रख कर चलने लगा .
कुछ देर चलने के बाद पथिक को दूसरा ठग मिला वह भी पथिक के साथ साथ चलने लगा
दुसरे ठग ने पूछा
भाई साहब ये कुत्ता कितने में लिए . बड़े अच्छे नस्ल का लग रहा है . कहा मिलते हैं इस नस्ल के कुत्ते पता बतावोगे मुझे भी . इसपर पथिक को विशेष चिंता हुई वह झट से सिर पर से बकरे को पटक दिया . फिर आस्वस्त होने पर बकरे को सिर पर रख लिया और चलने लगा .
कुछ दूर जाने पर उसे तीसरा ठग मिला 
तीसरे ठग ने पूछा
इतना सुन्दर भेड़ कहा से ला रहे हो भैया . कितने में मिला ये भेड़ ?  अब इस तीसरे ठग की बात सुनकर पथिक विचलित हो गया उसे लगा मेरे सिर पर जरुर कोई मायावी राक्षस बैठा है जो बार बार रूप बदलकर कभी खरगोस कभी कुत्ता और कभी भेड़ बन जा रहा है .  निश्चय ही यह त्याज्य है इसे फ़ेंक देना चाहिय . ऐसा सोचकर उस पथिक ने उस बकरे को वहीँ फ़ेंक कर चल दिया . कुछ देर बाद वे ठग उस बकरे को ले गए .
इसीलिए विद्वानों ने कहा है सुनो सबकी करो अपने मन और बुद्धि की

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