शनिवार, 22 अप्रैल 2017

श्रद्धालु और ईर्ष्यालु की कहानी

ईर्ष्यालु व्यक्ति की कहानी।  
"श्रद्धालु" और "ईर्ष्यालु" नाम के दो पडोसी थे। दोनों में आपस में काफी घनिष्ठता थी। दोनों ने मिलकर तपस्या करने का विचार किया। दोनों तपस्या पर चले गए और भगवान शिव की आराधना करने लगे।  बहुत दिन तक तपस्या में लगे रहे। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए।  भगवान शिव ने उन दोनों से वर मांगने को कहा ।

श्रद्धालु ने भगवान् शिव से वरदान माँगा -->
भगवन मैं जब भी आपकी पूजा  अर्चना करके आपसे कोई वरदान मांगू तो आप मुझपर प्रसन्न होकर वरदान को सफल बनाये। 
भगवान शिव ने कहा तथास्तु !

अब "ईर्ष्यालु" की बारी थी -->

"ईर्ष्यालु" ने भगवान शिव  से वरदान माँगा। भगवान आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जो कुछ वरदान में "श्रद्धालु" को मिले उससे दोगुना मुझे मिल जाए।  

भगवान आशुतोष ने एवमस्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए।



"श्रद्धालु" भगवान शिव की नित्य पूजा पाठ करता और अपने जरुरत के अनुसार शिव से वरदान माँग लेता। 

"श्रद्धालु" ने एक दिन पूजा करके भगवान शिव से अपने लिए एक सुन्दर सा घर माँगा। भोले नाथ के वरदान के अनुसार "श्रद्धालु" को  १ सुन्दर सा घर मिल गया साथ ही पडोसी "ईर्ष्यालु" को भी २ घर मिल गए। "श्रद्धालु" इस घर में सुख पूर्वक रहने लगा।  

कुछ दिन बाद "श्रद्धालु" ने अपने घर के पास एक मीठे जल के कुएं की याचना किये। शीघ्र ही शिवभक्त के घर के आगे एक कुआँ तैयार हो गया। वरदान की शर्त के अनुसार "ईर्ष्यालु" को भी २  कुआँ मिल गया। 

इसतरह भक्त "श्रद्धालु" जो कुछ भी मांगता "ईर्ष्यालु" को उससे  दोगुना मिल जाता। 

"श्रद्धालु" को इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। "ईर्ष्यालु" को "श्रद्धालु" से सबकुछ दोगुना मिलने के बाद भी सुख देखा नहीं जा रहा था। "ईर्ष्यालु" अपने पडोसी "श्रद्धालु" के प्रति ईर्ष्या और कुटिलता दर्शाने लगा। "ईर्ष्यालु" के इस व्यवहार से "श्रद्धालु" को बहुत दुख होता। 

"श्रद्धालु" दिखने में भोला प्रतीत होता था लेकिन था बुद्धिमान।  उसने "ईर्ष्यालु" को सबक सिखाने की ठानी। 

शिव की पूजा अर्चना करके "श्रद्धालु" ने भगवान शिव से वरदान माँगा की भगवान मेरे एक आँख ले लो। 
भगवान शिव को अपने भक्त की इस याचना पर आश्चर्य तो जरूर हुआ।  लेकिन वरदान की शर्त के अनुसार "श्रद्धालु" की एक आँख की रोशनी चली गयी। साथ साथ पडोसी "ईर्ष्यालु" भी सुबह सुबह दोनों आंखों से अँधा हो गया। 

"ईर्ष्यालु" को अपने किये की सजा मिल गयी थी वो नेत्र विहीन हो गया था।
"ईर्ष्यालु" ने अपने बेटे को "श्रद्धालु" के घर झाँकने को कहा और उसकी स्थिति के बारे में पूछा। बेटे ने कहा -->पिता जी !  "श्रद्धालु " चाचा तो एक आँख से काने हो गए हैं।

"ईर्ष्यालु" को अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था। कही "श्रद्धालु" ऐसे ही एक दो और वरदान न मांग बैठे इसकी चिंता सता रही थी। इसलिए अपने बेटे की अंगुली पकड़ कर पडोसी के घर पहुँच गया तथा क्षमा याचना की और किये हुए कुकृत्यों का प्रायश्चित किया। 

इस प्रायश्चित से उसके सारे पाप धूल गए। "ईर्ष्यालु" के दोनों नेत्र तो वापस नहीं मिल पाए लेकिन ईर्ष्या की अग्नि जो उसे जला रही थी वो हरदम के लिए शांत हो चुकी थी। वो पहले से ज्यादा सुखी अनुभव कर रहा था।   

Moral -> ईर्ष्या से सुख नहीं मिलने वाला चाहे आपके पास जितनी सम्पति मिल जाए। 
   

  
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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

langar ki kanahi jio upbhokta ke sandarbh me

एक व्यक्ति नित्य लंगर चलाता था

लंगर मे खाने वालों की संख्या नित्य प्रतिदिन बढ़ती गयी ।

फ़िर एक दिन उस व्यक्ति ने लंगर के टेबल पर एक तरफ़ दान पेटी रख दी ।
दान पेटी पर लिखा था आप धर्मार्थ स्वैच्छिक दान दे सकते हैं ।

अब प्रसाद पाने के बहाने खाने आने वाले की संख्या दिन प्रति दिन घटने लगी ।
लंगर के आयोजक व्यक्ति समाज शास्त्री भी थे ।
भीड़ के इस व्यवहार से उन्हे अपने विषय पर शोध करने का अवसर भी मिल रहा था ।
कूछ दिन तक यूँ ही चलता रहा। फिर एक दिन अपने शोध के क्रम ने लंगर आयोजित करने वाले व्यक्ति ने दान पेटी को बदल दिया ।

अब दान पेटी पर लिखा था ।
धर्मार्थ न्यूनतम 1 रुपये दान पेटी मे डालें ।
लोग अब भी आते और jio की कस्टमर की तरह मुफ्त का खा कर चले जाते ।
लोग खाने के बाद सोचने पर मजबूर हो जाते कि दान पेटी मे पैसे डालूं या न डालूं ।
धीरे धीरे लोग दान पेटी मे 1 रुपये डालने लगे ।

वो लोग जिनको दान पेटी में 1 रुपये डालने में हिचकिचाह महसूस हो रही थी धीरे धीरे लंगर में आना छोड़ दिए .

यह कहानी jio के कुछ उपभोक्ताओं पर भी सार्थक सिद्ध होती दिखती है .

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बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सेठ का अपने बच्चे को सीख


कपडे का एक व्यापारी था।  वह बहुत मन लगाकर अपना व्यवसाय करता था।  अपने दिनचर्या का पालन करता था और नित्य सुबह दूकान पर पहुँच जाता था।  दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी   . सेठ अपने कपड़ों पर उचित लाभ रखकर विक्रय करता था। इससे उसके विश्वसनीय ग्राहकों की संख्या बढ़ते जा रही थी। सेठ के ईमानदारी का व्यवसाय खूब चला जिससे उसने काफी पैसे कमाए।


समय के साथ साथ सेठ भी बूढ़ा  हो गया।  उसके पास अपार धन सम्पदा थी किसी बात की कमी नहीं थी।  बस एक कमी थी कि उसका बेटा व्यावसायिक बुद्धि का नहीं था। सेठ बार बार अपने बेटे को व्यावसायिक शिक्षा देता था। अंत में मरते समय सेठ ने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और जीवन के अनुभवों को सारांश में अपने बेटे के सम्मुख कुछ पंक्तियों में ये बात कहा।


"साया साया आना बेटा साया साया जाना। मीठा खाना देना तो लेना मत।। "

उपरोक्त का मतलब अपने बुद्धि के अनुसार समझकर सेठ के लड़के ने घर से लेकर दूकान तक छाजन करा दिया। जिससे उसके सिर के ऊपर आते जाते समय धुप न लग सके।==> इस कार्य में उसके पिता द्वारा संचित बहुत से धन व्यर्थ ही खर्च हो गए।
"मीठा खाना" का अर्थ वणिक पुत्र ने कुछ इस प्रकार समझा --खाने में मीठा का सेवन करना है। अतः वह "गुड़" खाने लगा। ==> अधिक गुड़ के सेवन से उसका स्वास्थ्य विगड़ने लगा।
"देना तो लेना मत" - का अनुपालन कर सेठ के लड़के ने जिस जिस व्यक्ति को उधार में कपडे दिए उससे पैसे नहीं मांगे। ==> ज्यादा उधार होने के कारण उसके व्यवसाय की व्यवस्था विगड़ गयी।

वणिक पुत्र अपने पिता के सीख का गलत अर्थ निकालकर बहुत दुखी हुआ। एक दिन सेठ की दूकान पर  एक महात्मा जी आये। सेठ ने महात्मा जी से अपनी सारी व्यथा सुनाई। पिता के मरते समय दिए हुए सीख को भी महात्मा जी के समक्ष रखा तथा उन सीख का अपने मति के अनुसार किये गए अनुपालनो को भी बताया।

महात्मा जी बात को समझते देर न लगी उन्होंने सेठ द्वारा मरते समय दिए गए सीख का सही अर्थ लगा दिया।

"साया साया आना बेटा साया साया जाना"  से तात्पर्य है सुबह सुबह दूकान पर पहुँच जाना  और शाम को सूर्यास्त के बाद दूकान से घर आना। इसप्रकार वणिक पुत्र दूकान पर ज्यादा समय दे सकता है।

"मीठा खाना" का  आशय था खान पान मधुर रखना जिससे स्वास्थय सही रहे और वो नित्य प्रति दूकान पर जा सके।

"देना  तो लेना मत " से तात्पर्य है उधार का व्यवसाय नहीं करना। अर्थात उधार सामान देकर फिर  पैसे  मांगने के लिए बार बार क्रेता के घर नहीं जाना।

इसप्रकार माहत्मा द्वारा बताये गए सही अर्थो को समझ कर उनका अनुसरण करने से से सेठ के बेटे  का दुःख दूर हो गया।
   
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बुधवार, 15 मार्च 2017

गोनू झा और भाना झा, भैंस का बँटवारा ।- bhains ka bantwaara

गोनू झा और भाना झा की कहानी

 गोनू झा और भाना झा दो भाई थे ।  गोनू झा बड़े भाई अपने छोटे भाई का ख़याल रखते थे । दोनो आपस में बड़े प्यार से रहते थे । बड़े हुए दोनो की शादी हो गयी । शादी के बाद दोनो भाइयों की पत्नियों ने संकीर्ण स्वार्थ दिखाना शुरू किया । धीरे धीरे भाइयों में दूराव बढ़ता गया ।
फ़िर पंचायत बुलायी जाने लगी । पंचायत की बैठक में गोनू झा के हितैषी सरपंच ने अपना फैसला सुनाया ।
सभी समान दोनो भाइयों में  बँट जाने के बाद एक कम्बल और भैंस के बंटवारे का विवाद नही सुलझ पा रहा था।

अंतत: कम्बल और भैंस का बँटवारा कूछ इस प्रकार हुआ । 

भैंस का बँटवारा ----
भैंस के आगे का हिस्सा भाना झा को और भैंस के पिछले शरीर का हिस्सा गोनू झा को ।
दिनभर भाना झा भैंस को चराते और रात को गोनू झा भैंस की दुध निकाल लेते । भैंस का गोबर भी इन्हीं के हिस्से था ।
कम्बल का बँटवारा --

कम्बल दिन में भाना झा के हिस्से था । रात में यह गोनू झा के सेवा में आ जाता । भाना झा इस बंटवारे से बहुत परेशान थे । दिन में भाना झा कम्बल को धोते सुखाते और रात में  यह गोनू झा  के हिस्से आता। गोनू झा रातभर कम्बल ओढ़कर चैन की नींद सोते। 

भाना झा इससे दुखी होकर अपने  मित्र से  मिलने  गये और अपनी सारी व्यथा उसे सुनाई। उनका मित्र बहुत समझदार  था।  उसने भाना  झा से सारी  बातें  सुनने के बाद  कुछ सुझाव दिए।

सुझाव  कुछ  प्रकार है। 


भाना झा  के मित्र  ने कहा कि , तुम्हारे हिस्से में भैंस का अगला हिस्सा है। इस हिस्से पर तुम कुछ कर भी हो।  जब गोनू झा भैंस का दूध  निकाल रहे हों तब तुम भैंस के मुंह पर लाठी से प्रहार करना। दिन भर कम्बल को गिला रखना। 

अब भाना  झा दिन में कम्बल को पानी में भिंगोये रखने लगे। भैंस के दूध निकालने  का समय होता तो भैंस के   मुंह पर लाठी से मारने लगते। 
गोनू झा अपने करतूत  पर पछताने लगे और भाना झा को भैंस के दूध में बराबर का हिस्सा दिया। बड़े भाई गोनू झा ने हमेशा के लिए कम्बल  भाना झा को दे दिया। 

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मंगलवार, 14 मार्च 2017

खटमल और चीलर की कहानी

एक बार की बात है ।  राजा के पलंग में एक चीलर रहता था । चीलर बड़ी चालाकी से राजा के सो जाने के बाद राजा के रक्त का पान करता था ।

एक दिन राजमहल के सेवक के माध्यम से शयन कक्ष में खटमल आ गया । खटमल चुपके चुपके राजा के पलंग के पास जा पहुँचा । वहाँ छुपने का कोई उपयुक्त जगह ढूँढ़ने के क्रम में उसकी मुलाकात चीलर से हो गयी । चीलर ने अपने यहाँ आये अतिथि का यथोचित सत्कार किया ।  फिर दोनो अपने अपने जीवन यापन और जीवन शैली के बारे में एक दूसरे को बताने लगे । 

पहले खटमल ने चीलर से अपनी व्यथा सुनायी ।

खटमल  ने कहा -
- मित्र बहुत मुश्किल से राजा के क्रूर सेवकों के बीच जीवन गुजर रहा है । पेट भर रक्त भी नहीं मिल पाता और निशिदिन प्राण संकट बना रहता है ।  तुम्हारा तो यहाँ राजा के शयन कक्ष में बढिया से गुजर बसर हो रहा होगा ?

चीलर ने कहा --सुरक्षित जगह और मेरे सावधानी से दिन अच्छे कट जाते हैं । राजा के कोमल अंगों का शोणित पान करने का सौभग्य प्राप्त है मूझे । मैं राजा को गहरी नींद में सो जाने तक इंतजार करता हूँ ।

चीलर से यह सूनकर खटमल बहुत अधीर हो चला वह राजा का खून को चखने के लिय मचलने लगा । चीलर ने भरोसा दिलाया कि मैं आज़ रात को तुम्हे उपयुक्त समय पर राज शोणित चखने का मौका दूँगा ।रात हुई राजा अपने शयन कक्ष में आ गये ।  चीलर ने खटमल को समझाया कि , जल्दीबाजी मत करना पूरी तरह से नींद में आने पर ही नृप के समीप जाना । थोड़ी देर तो  खटमल मान गया , लेकिन उसकी अधीरता ने बाध्य कर दिया । राजा अभी पूरी तरह नींद में सोया न था तभी खटमल ने हमला कर दिया ।

राजा की वेदना स्वर सूनकर कई सेवक शयन कक्ष में आ गये ।  उन्होंने खटमल को ढूँढ निकाला और साथ में  चीलर भी पकड़ा गया । इस तरह एक दुष्ट मित्र की घृष्टता से मित्र की जान  चली गयी
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सोमवार, 6 मार्च 2017

मातृभाषा के प्रति बढती उपेक्षा की भावना

Growing Sense of Neglect to the Native Language



मैं अपने घर पर माता, पिता, भ्राता और भार्या से भी अपनी मातृ भाषा भोजपुरी मे बात करता हूँ .
इसके विपरीत
यदि मेरे बच्चे मातृभाषा के प्रति उदासीन होकर हिंदी के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी. बच्चे बड़ी सहजता से भोजपुरी के शब्दों का हिंदी अनुवाद कर लेते हैं .
दहारण के लिए
अगर मैं अपने बच्चे से पूछूं
“बाबू का करतार”
उत्तर मिलेगा
“खा रहा हूँ पिता श्री “
मैं अपने गावं गया था तो पिता जी को यह बात रास नहीं आई .
मुझसे गावं के एक व्यक्ति मिलने आये . उन्होंने मुझसे भोजपुरी में बर्तालाप किया .
फिर घर की आँगन से खेलते हुए मेरा आत्मज निकला .
उस व्यक्ति ने बच्चे के तरफ इशारा करते हुए पूछा?
“इ राउर लईका हउवन”
मैंने कहा
“ह हमरे बेटा  हउवन”

फिर उस व्यक्ति ने बड़ी कठिनाई से शब्दों को सजोते हुए मेरे पुत्र से पूछा

“बाबू कहा रहत हो ?
बेटे का जबाब
“दिल्ली रहता हूँ .

.....
“मुझे दिल्ली लेई चलोगे”
“हाँ ले चलूँगा “

मेरे पिता जी वही बैठे थे सब देख रहे थे .
उस व्यक्ति के जाने के बाद उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा ! लोग किस तरह अन्धानुकरण कर रहे हैं विवेक शून्य होकर ये देख रहे हो न ?
मैंने तात्पर्य नहीं समझा
पिताजी बोले !
“हिंदी बच्चों के लिए विशेष अपरिहार्य भाषा बन गयी . जैसे आपको मवेशियों से बात करने के लिए अलग भाषा(विशेष शब्द सांकेतिक भाषा)  का प्रयोग करना पड़ता है. ठीक उसी प्रकार ये आजकल के बच्चे भी अपनी मातृभाषा भोजपुरी नहीं समझ पा रहे हैं .”

इस quote  के बाद मैं उनके बिचार से सहमत हो गया . और अपने बच्चों को परस्पर पारिवारिक बोलचाल में हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर दिया .

आप सभी मित्रों से निवेदन है की आप जिस पवित्र भूभाग से सम्बन्ध रखते हों आप उस क्षेत्रीय भाषा को उपेक्षा का शिकार मत होने दीजिये.    


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रविवार, 19 फ़रवरी 2017

शरीर तुम्हारा अनमोल है फिर भिक्षाटन क्यों ?

एक बार एक भिखारी एक सज्जन से भीख मांगने आया. भिखारी दीन दशा बनाए उस सज्जन से क्षुधा निवारण के लिए कुछ मांग रहा था . 
उस सज्जन ने भिखारी से पूछा ? तुम भीख कयों मांगते हो ? भिखारी ने कहा मैं निर्धन हूँ इस लिए आजीविका  के लिए भिक्षाटन करता हूँ . उस सज्जन ने कहा भोले भिखारी मै देख रहा हूँ तुम बहुत धनी हो . भिखारी ने कहा कुछ भीख में दे दो साहब कयों गरीब का मजाक उड़ा रहे हो .


इसपर उस सज्जन ने कहा --> अब तुमसे मैं कुछ कीमती बस्तुएं मांग रहा हूँ .

१) सज्जन ने पूछा -तुम मुझसे १५००० रुपये ले लो और अपना बाया हाथ मुझे दे दो 
भिखारी ने कहा नहीं महाशय ये हाथ मेरे अनमोल है मैं किसी कीमत पे ये नहीं दे सकता आपको क्षमा करना जी .
२) अच्छा चलो ५०००० रुपये ले लो मुझे दोनों हाथ दे दो अपने
भिखारी -> नहीं महाशय ये कैसी याचना है ?
३) चलो हाथ नहीं दोगे तो ५०००० रुपये में अपने एक नेत्र ही मुझे दे दो 
भिखारी-> नहीं नहीं माफ़ करना जी मैं चलता हूँ 

उस सज्जन ने भिखारी को रोका और अपने यहाँ भोजन कराया . फिर उस सज्जन ने भिखारी को बताया की कोई भी व्यक्ति निर्धन नहीं है . प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति को बहुत ही धनवान बनायीं है . आदमी भ्रम वश अपने को निर्धन मानकर दुखी हो दर दर भटकता नहीं .

अब तू तुझे पता चल गया होगा  तुम कितने धनवान हो . जाओ इस धन का सदुपयोग करो
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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

सुनो सबकी करो अपने मन की



सुनो सबकी करो अपने मन की
एक बार एक आदमी अपने सिर पर बकरा लिए जा रहा था . रास्ते में बकरा ले जाते हुए तीन ठगों ने देख लिया . वो ठग उस आदमी से बकरा लेने के लिए युक्ति बनाने लगे. इसके लिए उन तीनो ठगों ने एक योजना बनायीं. सॉर्ट कट रास्ते से वो तीनों ठग उस पथिक से आगे निकल गए. कुछ किलोमीटर की अंतराल पर वे तीनों योजनाबद्थ तरीके से खड़े हो गए रास्ते में उस पथिक को देख पहला ठग उसके साथ साथ चलने लगा 
पहले ठग ने कहा .
भाई साहब ये खरगोस कितने में लिए . पथिक ने उस ठग के बात को अनसुना कर अपनी यात्रा जारी रखी . ठग पुनः पूछा खरगोस बहुत अच्छा है मुझे भी लेना था ये कितने में लिए आपने . इसपर पथिक चौक गया और अपने सिर से बकरे को उतर कर देख फिर सिर पर रख कर चलने लगा .
कुछ देर चलने के बाद पथिक को दूसरा ठग मिला वह भी पथिक के साथ साथ चलने लगा
दुसरे ठग ने पूछा
भाई साहब ये कुत्ता कितने में लिए . बड़े अच्छे नस्ल का लग रहा है . कहा मिलते हैं इस नस्ल के कुत्ते पता बतावोगे मुझे भी . इसपर पथिक को विशेष चिंता हुई वह झट से सिर पर से बकरे को पटक दिया . फिर आस्वस्त होने पर बकरे को सिर पर रख लिया और चलने लगा .
कुछ दूर जाने पर उसे तीसरा ठग मिला 
तीसरे ठग ने पूछा
इतना सुन्दर भेड़ कहा से ला रहे हो भैया . कितने में मिला ये भेड़ ?  अब इस तीसरे ठग की बात सुनकर पथिक विचलित हो गया उसे लगा मेरे सिर पर जरुर कोई मायावी राक्षस बैठा है जो बार बार रूप बदलकर कभी खरगोस कभी कुत्ता और कभी भेड़ बन जा रहा है .  निश्चय ही यह त्याज्य है इसे फ़ेंक देना चाहिय . ऐसा सोचकर उस पथिक ने उस बकरे को वहीँ फ़ेंक कर चल दिया . कुछ देर बाद वे ठग उस बकरे को ले गए .
इसीलिए विद्वानों ने कहा है सुनो सबकी करो अपने मन और बुद्धि की
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बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

राजा के बकरे को भर पेट कौन खिलायेगा ?


भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्ण. अर्थात भौतिक विषयों के भोग नहीं खत्म हुए हम मनुष्यों का जीवन ही समाप्त हो गया . तृष्णा ख़त्म नहीं हुई लेकिन विषय रसों का भोग करने वाली हमारी इन्द्रियाँ ही जीर्ण हो गयी . किसी आदमी के मुह में एक भी दांत नहीं हो लेकिन चने चबाने की तृष्णा use भी होती है . इस कहानी में एक बकरे के माध्यम से इस बात पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है. इस कहानी का पात्र रजा का एक बकरा है जिसे पेट भर खिला कर संतुष्ट कर देना है जिससे उसके सामने घास ले जाने पर वह खाने से इंकार कर दे .

कहानी कुछ इस प्रकार है . एक रजा था वह धर्म शास्त्र का ज्ञाता था . उसने अपने राज्य में एक प्रतियोगिता रखी . इस प्रतियोगिता के अनुसार राजा के बकरे को पेट भर घास खिलाकर संतुष्ट कर देना है जिससे वह सामने पड़ी घास को खाने में रूचि नहीं दिखाए . इस प्रतियोगिता को जितने वाले को यथोचित पुरस्कार दिया जायेगा.  पुरे राज्य में इस प्रतियोगित की ढोल बजाकर घोषणा कर दी गयी . राजा की घोषणा सुनकर बहुत से प्रतियोगी इस प्रतियोगिता में भाग लेने आये . प्रतिभागी बारी बारी से बकरे को लेकर चराने के लिए ले जाते और शाम को जब बकरे के साथ लौटते तो राजा उस बकरे के तृप्त होने की परीक्षा लेते . जब रहा हाथ में घास लेकर बकरे के पास जाते तो बकरा घास खाने लगता . इसप्रकार ये प्रतियोगिता पांच दिन तक चली. प्रतियोगियों के लाख प्रयास के बाद भी बकरा पूर्णतः तृप्त नहीं हुआ और परीक्षा के समय राजा के हाथ में घास देखकर उसपर मुह मार देता था.


इसी तरह सभी प्रतियोगी फेल होने लगे . इस बात की खबर एक ब्राह्मण तक पहुंची . ब्राह्मण ज्ञानी था उसने राजा के इस प्रतियोगिता का रहस्य जान लिया . अगले दिन ब्राह्मण प्रतियोगिता में भाग लेने राजा के दरबार में पहुंचा . ब्राह्मण राजा के बकरे को लेकर चराने गया और साथ में एक डंडा भी लेते गया . बकरा जब भी घास खाने के लिए मुंह आगे बढाता ब्राह्मण उसे डंडे से मारता . इस तरह बार बार डंडे की धमकी से बकरा समझ गया की घास खाना सही नहीं है . अब बकरा घास को देखकर दूसरी तरफ मुह घुमा  लेता था . सच पूछो तो बकरा तृप्त हो गया था .

ब्राह्मण बकरे को लेकर राजा के पास पहुंचा . राजा  ने या जांच करने के लिए की बकरा सचमुच तृप्त हुआ है या नहीं उसके सामने घास रखा . घास सामने देखकर बकरा दूसरी ओर मुह घुमा लिया . इस कहानी का तात्पर्य यह है की इन्द्रियां विषयों  के भोग से कभी संतुष्ट नहीं होती. यहाँ तक की इन्द्रियां भोग को भोगने में असमर्थ हो जाती है तब भी भोगों को भोगने की कामना मन में बनी रहती है . अतः इन्द्रियों पर अंकुस रखना जरुरी है

शास्त्रों ने मन इन्द्रिय और आत्मा के बारे में एक बहुत ही सटीक उदहारण प्रस्तुत किये हैं . 

इस शरीर रूपी रथ के इन्द्रिय घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है तथा आत्मा इस रथ का रथी है .


अगर बुद्धि रूपी सारथि ने मन रूपी लगाम को ढीला किया तो इन्द्रय रूपी घोड़े इस शरीर रूपी रथ पर आरूढ़ आत्मा को गर्त में धकेल सकते हैं .        
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