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जल्लीकट्टू की कहानी

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जल्लीकट्टू तमिल में प्राचीन काल से लगभग १००-४०० ईसा पूर्व मनाया जाता रहा हैं। यह प्राचीन अइयर लोगों जो प्राचीन तमिल देश की 'Mullai' भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे के बीच आम था। बाद में, यह बहादुरी के प्रदर्शन के लिए एक मंच बन गया, और इसमें भागीदारी की पुरस्कार  राशि  प्रोत्साहन स्वरुप पेश की जाने लगी। सिंधु घाटी सभ्यता से एक मुहर अभ्यास चित्रण राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित है।सफेद चीनी मिट्टी में एक गुफा चित्रकला मदुरै के निकट की खोजी गयी है जिसमे एक आदमी बैल को रोकने का प्रयास करता है।
जल्लीकट्टू के लिए कई सामान्य नियम हैं: १) बैल एक प्रवेश द्वार Vadi vasal के माध्यम से मैदान पर आएगा।
२) प्रतियोगी इसमें बैल को उसके कूबड़ से पकड़ते हैं. बैल को पूंछ, गर्दन और सिंग से पकड़ना प्रतियोगी को अयोग्य करार देता है।
३) इस प्रतियोगिता में प्रतियोगी को ३० सेकंड या 15 फुट के लिए बैल को गले लगाने चाहिए। बैल को दौड़ाते समय इसमें जो भी लंबे समय तक हो। आमतौर पर यह लगभग 15 मीटर (49 फुट), रेखा के साथ भूमि के ऊपर मार्कर झंडे के द्वारा चिह्नित होता है।
४)  अगर बैल लाइन से पहले प्रतियोगी …

धन वर्षा मंत्र - dhan varsha mantra

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गुरुकुल में छात्रों को मनपसंद विषय चुनने की स्वतंत्रता थी. छात्र अपने रूचि के विषय में गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। एक छात्र था अर्थकाम वह धन की कामना रखता था और ऐसी विद्या के बारे में जानना चाहता था जिससे ज्यादा से ज्यादा कमाई हो सके। अपने साथियों से इस सम्बन्ध में बाते किया करता था। गुरु जी को भी इस बात की खबर हो गयी थी की अर्थकाम ज्यादा धन कमाने की इच्छा रखता है। एक दिन गुरु जी सभी छात्रों को सुख के लक्षण संबंधी अध्याय पढ़ा रहे थे। इस क्रम में गुरु जी ने एक श्लोक पढ़ा

अर्थागमो नित्यं आरोग्यता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च
वस्यश्च पुत्रोर्थकरी च विद्या  षड जीवलोकेषु सुखानी राजन


तात्पर्य
धन का नित्य आगमन हो , शरीर रोज स्वस्थ हो प्रिय स्त्री हो और प्रिय बोलने वाली हो , लड़का वश में हो धन कमाने वाली विद्या हो ये जीवलोक के छः सुख कहे जाते हैं।

अर्थकाम जब गुरु जी के मुख से श्लोक में पहला शब्द अर्थागम सुना तो उसे दृढ़ विश्वास हो गया की अर्थ धन ही सबसे बड़ा सुख है।

गुरु जी अर्थकाम की रूचि को देखकर उसे धनार्जन मन्त्र की शिक्षा देने लगे। धन वर्षा मंत्र बहुत ही लाभकारी मंत्र था इसक…

मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति

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Makar Sankranti Kharmas Ki Samapti मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति पर मनाया जाने वाला त्योहार है. इस दिन स्नान दान का विशेष महत्व । नदियों,सरोवरो और पुण्य क्षेत्रों पर श्रद्धालुओं की  भारी भीड़ लग जाति है ।

 क्या है खरमास सूर्य  एक राशि में एक महीने रहता है । सूर्य जब धन राशि में होता है तो वह महीना खरमास का महीना होता है । 14 दिसम्बर से लेकर  14 जनवरी तक होता है । इस एक महीने में कोई भी शुभ कार्य नही होता । इस महीने  को खरमास कहा कहे जाने के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। प्रकृति के नियम के अनुसार सूर्य को निरंतर चलते रहना है। निरंतर चलते चलते एक दिन सूर्य के घोड़ों को प्यास लग गयी प्यास से ब्याकुल घोड़े पानी के लिए तड़प रहे थे।  सूर्य मार्ग में एक तालाब देख अपने घोड़ों को पानी पिलाने लगे। एक एक कर सभी घोडों को रथ से खोल कर पानी पिलाने लगे। तभी सूर्य को इस बात का स्मरण हुआ की ईश्वर के विधान के अनुसार सृष्टि को सुचारू रूप से चलने के लिए सूर्य का निरंतर चलते रहना जरुरी है। सूर्य ने तुरंत तालाब के किनारे चर रहे गधों को रथ में जोड़कर रथ को हांक देने का  आदेश दिया। इस तरह खर…

राजा दिलीप की गौ सेवा, नंदनी गाय की कहानी

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राजा दिलीप सूर्य वंश के बहूत बड़े प्रतापी राजा हुए । वे महाराज राम चंद्र के पूर्वज भी  थे ।दुर्भाग्यवश उन्हें कोई संतान नही हो रहा था ।राजा इस बात से बहुत चिंतित थे । इसी चिंता से वे अपने गुरु के आश्रम में इसका समाधान जानने गये । उन्होंने गुरुदेव से अपनी सारी व्यथा बतायी और गुरु जी से संतानहीनता का कारण तथा इसका निवारण पूछा ।
गुरु जी राजा के बात को सुनकर ध्यान लगाकर अपने दिव्य शक्तियों से राजा के कर्मों का अवलोकन कर लिया ।ध्यान से वापस आने पर गुरु जी ने महाराज  दिलीप को बताया की आपने स्वर्ग लोक में  कामधेनु गाय का अपमान किया है। इसी दोष से आपकी संतान की कामना फलवती नहीँ होती ।


इसपर राजा दिलीप ने गुरु जी से पूछा महर्षि मैंने तो अपने जाने में ऐसा कोई अपराध नहीँ किया है । कृपया मेरा अपराध समझाने का कष्ट करें । गुरुदेव ने कहा कि आप स्वर्ग लोक में गये थे तो आप वहाँ के ऐश्वर्य और सौन्दर्य में इतना खो गये थे की आप ने कल्प तरु के नीचे बैठी कामधेनु गाय को नमस्कार नहीँ किया । जिससे आपको कामधेनु के अपमान का दोष लग गया। राजा दिलीप ने पूछा महाराज मैंने तो अपने जानकारी में कामधेनु गाय का कोई अपमान …

उपाय है से जो सम्भव है वह पराक्रम से नही

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आरुणि की गुरुभक्ति

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पुराने ज़माने में छात्र गुरुकुल आश्रम में पढ़ा करते हैं। छात्र गुरुकुल आश्रम में रहकर गुरु की सेवा किया करते थे और अध्ययन भी किया करते थे। आश्रम में शिक्षा पूरी कर फिर छात्र अपने घर वापस जाते थे। छात्र गुरुभक्त हुआ करते थे। ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमे छात्रों की महान गुरुभक्ति को दिखाया गया है। ऐसा ही एक गुरुभक्त छात्र था आरुणि, आइये जानते हैं आरुणि की गुरुभक्ति को।

 आरुणि महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम  में रहता था। आश्रम में रहकर वह शिक्षा  ग्रहण कर रहा था और गुरु की सेवा भी कर रहा था। आश्रम में छात्रों को कई जिम्मेवारी  होती थी। छात्र आश्रम में कृषि कार्य  और पशुओं  के लिए चारा का भी व्यवस्था किया करते थे। बरसात का मौसम था और इस मौसम में धान की खेती होनी थी। धान की खेती के लिए खेत में पानी जमा होना जरुरी था। लोग  खेती के लिए बड़ी बेसब्री से बारिस का इन्तजार किया करते थे। एक दिन शाम को तेज बारिस होने लगी सभी  खुश थे कि धान की खेती के लिए प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध  जायेगा।  लेकिन गुरु आयोदधौम्य चिंतित हुए की उनके एक खेत के  कमजोर होने से सुबह तक उसमे खेती के लिए पानी नहीं टिकेगा।
उन्हों…