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शनिवार, 21 जनवरी 2017

जल्लीकट्टू की कहानी

जल्लीकट्टू तमिल में प्राचीन काल से लगभग १००-४०० ईसा पूर्व मनाया जाता रहा हैं। यह प्राचीन अइयर लोगों जो प्राचीन तमिल देश की 'Mullai' भौगोलिक क्षेत्र में रहते थे के बीच आम था। बाद में, यह बहादुरी के प्रदर्शन के लिए एक मंच बन गया, और इसमें भागीदारी की पुरस्कार  राशि  प्रोत्साहन स्वरुप पेश की जाने लगी। सिंधु घाटी सभ्यता से एक मुहर अभ्यास चित्रण राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित है।सफेद चीनी मिट्टी में एक गुफा चित्रकला मदुरै के निकट की खोजी गयी है जिसमे एक आदमी बैल को रोकने का प्रयास करता है।

जल्लीकट्टू के लिए कई सामान्य नियम हैं:

१) बैल एक प्रवेश द्वार Vadi vasal के माध्यम से मैदान पर आएगा।
२) प्रतियोगी इसमें बैल को उसके कूबड़ से पकड़ते हैं. बैल को पूंछ, गर्दन और सिंग से पकड़ना प्रतियोगी को अयोग्य करार देता है।
३) इस प्रतियोगिता में प्रतियोगी को ३० सेकंड या 15 फुट के लिए बैल को गले लगाने चाहिए। बैल को दौड़ाते समय इसमें जो भी लंबे समय तक हो। आमतौर पर यह लगभग 15 मीटर (49 फुट), रेखा के साथ भूमि के ऊपर मार्कर झंडे के द्वारा चिह्नित होता है।
४)  अगर बैल लाइन से पहले प्रतियोगी को फेंकता है और कोई भी बैल पर पकड़ बना पाने में असमर्थ है तो बैल को विजयी घोषित कर दिया जाता है।
५) यदि प्रतियोगी कूबड़ पर पकड़ जमाये लाइन पार लेते हैं, तो प्रतियोगी विजेता घोषित किया जाता है।
६) खेल के नियम के अनुसार केवल एक प्रतियोगी एक समय में बैल का कूबड़ पकड़ सकता है। अगर एक  से अधिक प्रतियोगी बैल एक साथ बैल को पकड़ते हैं,  तो कोई विजेता नहीं होता है।

७) किसी भी प्रतियोगी द्वारा बैल को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचनी चाहिए

इस खेल के लिए बैलों का प्रजनन

बोस इंडिकस बैल इस अवसर के लिए गांव के लोगों द्वारा विशेष रूप से पाले जाते हैं। जो बैल इस खेल प्रतियोगित में भाग नहीं ले सकते उन्हें खेल की तयारी के लिए बछड़े पैदा करने के काम में लिया जाता है। ये बैल भी बाजार में ऊंची कीमत पाते हैं।

जल्लीकट्टू प्रशिक्षण और तैयारी

तैयारी

  2009 में तमिलनाडु विधानसभा से जल्लीकट्टू  विनियमन अधिनियम की शुरूआत के साथ, इसके तैयारी में निम्नलिखित गतिविधियों को शामिल किया जाता है :
१) इस खेल के शुरु होने से ३० दिन पहले संबंधित कलेक्टर से  लिखित अनुमति प्राप्त किया जाता है, जिसमे खेल आयोजित करने के स्थान के बारे में जानकारी दी जाती है।
२) वह अखाडा और जिस रास्ते से बैल गुजरते हैं उसे डबल बैरीकेटेड किया जाता है, जिससे दर्शकों और खेल आयोजन के आसपास के लोगों को कोई नुकसान न हो।
३) आवश्यक गैलरी क्षेत्रों को डबल बाड़ के साथ निर्मित किया जाता है । 
४) पंद्रह दिन पहले प्रतिभागियों और बुल्स के लिए कलेक्टर से आवश्यक अनुमतियों को प्राप्त कर  लिया जाता हैं।
५) इस आयोजन से पहले अंतिम तैयारी के तौर पर , पशुपालन विभाग के अधिकारियों द्वारा एक पूर्ण परीक्षण भी शामिल है। जिसमे यह सुनिश्चित किया जाता है की प्रतियोगिता में भाग लेने वाले बैलों को शराब या कोई नशीली चीज़ तो नहीं दी गयी है। 

जल्लीकट्टू विवाद

भारत के पशु कल्याण बोर्ड द्वारा की गई जांच में यह निष्कर्ष निकाला है कि "जल्लीकट्टू जानवरों के लिए स्वाभाविक  क्रूर कर्म  है"
पशु कल्याण संगठनों, भारतीय पशु संरक्षण संगठनों के परिसंघ (FIAPO) और पेटा भारत ने २००४ के बाद से इस अभ्यास के खिलाफ विरोध किया है।

प्रदर्शनकारियों का दावा है कि जल्लीकट्टू बैल Taming के रूप में प्रसिद्द हुआ है. लेकिन यह जानबूझ कर उन्हें एक भयानक स्थिति में शिकार जानवरों के रूप में रखने के लिए उन एक प्राकृतिक घबराहट देता है। जिसमें वे भागने के लिए मजबूर किये जाते हैं वे प्रतियोगियों को शिकारियों के रूप में देखते हैं और यह अभ्यास स्वाभाविक रूप से एक पशु को डराने का काम भी करता है। यह मानव दुर्घटना और मौत के साथ साथ, कभी कभी बैलों को भी चोट लग जाती है, जिसे  लोग गावँ के लिए शुभ नहीं मानते।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

धन वर्षा मंत्र - dhan varsha mantra

गुरुकुल में छात्रों को मनपसंद विषय चुनने की स्वतंत्रता थी. छात्र अपने रूचि के विषय में गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। एक छात्र था अर्थकाम वह धन की कामना रखता था और ऐसी विद्या के बारे में जानना चाहता था जिससे ज्यादा से ज्यादा कमाई हो सके। अपने साथियों से इस सम्बन्ध में बाते किया करता था। गुरु जी को भी इस बात की खबर हो गयी थी की अर्थकाम ज्यादा धन कमाने की इच्छा रखता है। एक दिन गुरु जी सभी छात्रों को सुख के लक्षण संबंधी अध्याय पढ़ा रहे थे। इस क्रम में गुरु जी ने एक श्लोक पढ़ा

अर्थागमो नित्यं आरोग्यता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च
वस्यश्च पुत्रोर्थकरी च विद्या  षड जीवलोकेषु सुखानी राजन


तात्पर्य
धन का नित्य आगमन हो , शरीर रोज स्वस्थ हो प्रिय स्त्री हो और प्रिय बोलने वाली हो , लड़का वश में हो धन कमाने वाली विद्या हो ये जीवलोक के छः सुख कहे जाते हैं।

अर्थकाम जब गुरु जी के मुख से श्लोक में पहला शब्द अर्थागम सुना तो उसे दृढ़ विश्वास हो गया की अर्थ धन ही सबसे बड़ा सुख है।

गुरु जी अर्थकाम की रूचि को देखकर उसे धनार्जन मन्त्र की शिक्षा देने लगे। धन वर्षा मंत्र बहुत ही लाभकारी मंत्र था इसकी सिद्धि और जप से आकाश से धन की वर्षा होती थी।  लेकिन यह आसमान के नक्षत्रों की विशेष संयोग से साल में केवल एक बार संभव था। अर्थकाम अपने गुरु की बताए मार्गदर्शन के अनुसार इस मंत्र की सिद्धि में लगा रहा। २ साल बाद उसे धनवर्षा मन्त्र की सिद्धि प्राप्त हो गयी। सभी छात्रों का दीक्षांत समारोह था। उस दिन संयोग से असमान में नक्षत्रों की वह विशेष स्थिति थी जिससे धनवर्षा  हो सकता था। अर्थकाम ने इसदिन धनवर्षा कराकर अपने गुरु जी को दक्षिणा दिया और अपने सभी साथियों को चौका दिया।


गुरु जी ने जाते जाते अर्थकाम को इस मंत्र से सम्बंधित विधि और निषेध बताये। गुरु जी ने अर्थकाम को ये भी बताया की बेटा धन साधन है इसे साध्य मत समझना। इसका उपयोग एक साधन के रूप ही ही करना। चार पुरुषार्थों में धर्म अर्थ काम मोक्ष में मोक्ष की साध्य है धन इसके निमित साधन है। गुरु जी की दी हुई सीख के साथ अर्थकाम अपने घर को लौट गया


गुरुवार, 12 जनवरी 2017

मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति


Makar Sankranti Kharmas Ki Samapti

मकर संक्रांति खरमास की समाप्ति पर मनाया जाने वाला त्योहार है. इस दिन स्नान दान का विशेष महत्व । नदियों,सरोवरो और पुण्य क्षेत्रों पर श्रद्धालुओं की  भारी भीड़ लग जाति है ।

 क्या है खरमास

सूर्य  एक राशि में एक महीने रहता है । सूर्य जब धन राशि में होता है तो वह महीना खरमास का महीना होता है । 14 दिसम्बर से लेकर  14 जनवरी तक होता है । इस एक महीने में कोई भी शुभ कार्य नही होता । इस महीने 
को खरमास कहा कहे जाने के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है।
प्रकृति के नियम के अनुसार सूर्य को निरंतर चलते रहना है। निरंतर चलते चलते एक दिन सूर्य के घोड़ों को प्यास लग गयी प्यास से ब्याकुल घोड़े पानी के लिए तड़प रहे थे।  सूर्य मार्ग में एक तालाब देख अपने घोड़ों को पानी पिलाने लगे। एक एक कर सभी घोडों को रथ से खोल कर पानी पिलाने लगे। तभी सूर्य को इस बात का स्मरण हुआ की ईश्वर के विधान के अनुसार सृष्टि को सुचारू रूप से चलने के लिए सूर्य का निरंतर चलते रहना जरुरी है। सूर्य ने तुरंत तालाब के किनारे चर रहे गधों को रथ में जोड़कर रथ को हांक देने का  आदेश दिया। इस तरह खर मतलब गधे की सवारी कर सूर्य एक माह चलते रहे। खर से जुड़े रथ से चलने के कारण यह महीना खर मास के नाम से जाना जाता है। 

खरमास की समाप्ति मकर संक्रांति 

सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में जाते हैं तो इसे मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इस दिन के बाद आने वाले शुभ मुहूर्त शुभ कार्यों के लिए ग्राह्य हो जाते हैं। मकर संक्रांति के अवसर पर  स्नान दान का विशेष महत्व है। लोग इस दिन नदियों और पवित्र सरोवरों में स्नान करते है और दान पुण्य भी करते हैं। संक्रांति का यह त्यौहार लोहड़ी के त्यौहार के बाद मनाया जाता है। लोहड़ी सिख समुदाय का सबसे लोकप्रिय त्यौहार है। 
इस बार मकर संक्रांति के स्नान का पुण्य काल शनिवार को दिन में २:०३ के उपरांत से सूर्यास्त तक है . अतः श्रद्धालू २ बजे के बाद स्नान दान आदि करेंगे . इस अवसर पर विशेष पारंपरिक खाद्य का प्रचलन है . इन खाद्य पदार्थों में तिल, गुड , मूंगफली और मुरी से बने गज़क शामिल हैं .

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

राजा दिलीप की गौ सेवा, नंदनी गाय की कहानी

राजा दिलीप सूर्य वंश के बहूत बड़े प्रतापी राजा हुए । वे महाराज राम चंद्र के पूर्वज भी  थे ।दुर्भाग्यवश उन्हें कोई संतान नही हो रहा था ।राजा इस बात से बहुत चिंतित थे । इसी चिंता से वे अपने गुरु के आश्रम में इसका समाधान जानने गये । उन्होंने गुरुदेव से अपनी सारी व्यथा बतायी और गुरु जी से संतानहीनता का कारण तथा इसका निवारण पूछा ।
गुरु जी राजा के बात को सुनकर ध्यान लगाकर अपने दिव्य शक्तियों से राजा के कर्मों का अवलोकन कर लिया ।ध्यान से वापस आने पर गुरु जी ने महाराज  दिलीप को बताया की आपने स्वर्ग लोक में  कामधेनु गाय का अपमान किया है। इसी दोष से आपकी संतान की कामना फलवती नहीँ होती ।


इसपर राजा दिलीप ने गुरु जी से पूछा महर्षि मैंने तो अपने जाने में ऐसा कोई अपराध नहीँ किया है । कृपया मेरा अपराध समझाने का कष्ट करें । गुरुदेव ने कहा कि आप स्वर्ग लोक में गये थे तो आप वहाँ के ऐश्वर्य और सौन्दर्य में इतना खो गये थे की आप ने कल्प तरु के नीचे बैठी कामधेनु गाय को नमस्कार नहीँ किया । जिससे आपको कामधेनु के अपमान का दोष लग गया। राजा दिलीप ने पूछा महाराज मैंने तो अपने जानकारी में कामधेनु गाय का कोई अपमान नहीं किया फिर ये शाप मुझे कैसे लगा। इसपर उनके कुलगुरु ने उन्हें विस्तार से सारी बात बताई। गुरु जी ने कहा की-- राजन एक बार आप स्वर्ग लोक में इंद्र के निमंत्रण पर गए थे। वहाँ जाकर आपने स्वर्ग के सौंदर्य और वैभव को देखा। इस सौंदर्य वैभव में आप खो गए और कल्पतरु के पास बैठी कामधेनु गाय को आपने नमस्कार नहीं किया। इस अपमान से आपको कामधेनु का शाप लग गया। समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु के उसी शाप के कारण आप संतान सुख से अबतक बंचित हैं.



महाराजा दिलीप ने गुरु से अपने इस शाप से उबरने का उपाय पूछा। गुरु जी ने कहा - राजन इस अभिशाप से बचने का यही उपाय है की आप कामधेनु गाय की सेवा कर प्रसन्न करें लेकिन कामधेनु को धरती पर लाना असम्भव है। इसके विकल्प के रूप में आप नंदनी गाय की सेवा कर सकते है जो महर्षि वशिष्ठ  के आश्रम में है। आप उनसे नंदनी गाय की सेवा करने की लिए  याचना करें।

 अपने गुरु की आज्ञा पाकर राजा दिलीप महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में में गए और उनसे विनती कर सेवार्थ नंदनी गाय अपने यहाँ लाये. राजा दिलीप तन मन से नंदनी गाय कि सेवा करते . गौ के पीछे पीछे उसकी रक्षा में धनुष पर बाण चढ़ाये चलते . इसप्रकार गौ सेवा में राजा दिलीप नंदनी गाय का अनुगमन करते . इसी तरह काफी दिन बीत गए . एक दिन गाय चरते चरते घने जंगल में चली गयी . उस दिन गाय के सामने एक सिह आ गया . सिंह ने दीर्घ स्वर में गाय को आवाज लगाकर रोका . सिंह ने कहा  तुमने मेरे उपवन के देवदारु के वृक्ष को खाया है . मैं इस उपवन कि रखवाली करता हूँ . इसके दंड स्वरुप मैं तुम्हे खाऊंगा . सिंह के मुख से इसप्रकार बचन सुनकर रजा दिलीप क्रोधित हो गए और अपने धनुष बाण सँभालते हुए बोले जबतक सूर्य वंशीयों के शारीर में प्राण है तबतक उनके किसी सरनार्थी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता . हे वनराज तुम अपनी खैर मानवों कि तुम मेरे बाण के प्रहार से पहले कितना देर और जीवित रह सकते हो . इसपर सिंह ने कहा  हे राजन तुम बीच में न आवो ये मेरे और इस गौ के बीच का विवाद है . मैं भगवान शिव द्वारा  नियुक्त इस उपवन का रक्षक हूँ और इस उपवन को नुकसान पहुचने वाले को दंड देना मेरा कर्त्तव्य और विधान है .



सिंह से ऐसा सुनकर राजा दिलीप ने कहा आप भगवन शिव के सेवक हैं तो हमारे भी आदरणीय है मैं आपपर शस्त्र तो नहीं उठा सकता लेकिन इस अपराध के बदले आप मुझे दंड दें . ये गाय मेरे द्वारा रक्षित है अतः इसका अपराध भी नियमतः मेरा ही माना जाएगा . अतः आप इस गाय के अपराध के बदले मुझे दंड दीजिये और मुझे मारकर खा जाईये . सिंह ने रजा दिलीप को समझाते हुए कहा . हे राजन तुम इस देश के एक कुशल राजा हो तुम्हारे मरने से इस देश को बहुत हानि होगी . मुझे इस गाय को मरकर खा जाने दो . सिंह के लाख बहकावे  के बाद भी जब राजा दिलीप नहीं माने और आँख मुदकर सिंह के आहार के लिए उसके सामने लेट गए तो, कुछ देर बाद उन्हें विस्मय करने वाला एक  आवाज सुनाई दिया . राजा ने आँख खोलकर देखा तो वहां से सिंह गायब था . नंदी गाय ने बोला - राजन ये सब मेरी माया थी , मैं तुम्हारे सेवा से प्रसन्न हुई . मेरे कृपा से तुझे बहुत तेजश्वी संतान प्राप्त होगी . नंदनी गाय के आशीर्वाद से राजा दिलीप को पुत्र कि प्राप्ति हुई जिसका नाम रघु रखा गया . रघु सूर्य वंश के बहुत बड़े प्रतापी रजा हुए उनके नाम पर उनके कुल का नाम रघुवंश पड़ा .

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

उपाय है से जो सम्भव है वह पराक्रम से नही

उपायेन ही यत्सक्यम न तत्सक्यम पराक्रमै


राज सरोवर के किनारे वृहद् नाम का बरगद का पेड़ था. वह पेड़ बहुत विशाल था . इस पेड़ पर बहुत सारे पक्षी रहते थे. उस पेड़ पर एक वायस दम्पति (कौवे का जोड़ा) भी रहता था. उस पेड़ के कोटर में एक सांप भी रहता था. सांप पेड़ पर लगे घोसले में पक्षियों के अण्डों को खा लेता था. इससे पेड़ पर रहने वाले सभी पक्षी परेशान थे. सभी ने मिलकर इस समस्या से निपटने का फैसला किया. सभी पक्षियों में कौआ सबसे चालाक होता है. सबने मिलकर सर्व सम्मति जताई और कौवे के अगुआई में उस विषैले सांप से संघर्ष करने को तैयार हुए.

चालाक कौआ नीति का ज्ञाता भी था. उसने सभी पक्षियों को संबोधित करते हुए कहा.—साथियों उपाय से जो संभव है वह पराक्रम से नहीं. (“उपायेन ही यत सक्यम न तत सक्यम पराक्रमै”). हम सभी पक्षी पराक्रम कर इस भयानक सांप पर विजय नहीं प्राप्त कर सकते. हमें कोई उपाय सोचना होगा.

फिर कुछ देर सोचने के बाद कौआ बोला इस बरगद के पेड़ के पास राज सरोवर है जिसमे इस प्रदेश का राजा स्नान करने आता है. राजा स्नान करने से पहले अपने वस्त्र आभूषण सरोवर किनारे रख कर स्नान करता है. हमें राजा के सेवकों से नजर बचाकर राजा का कीमती हार उठा लेना होगा.

अपने दिनचर्या के अनुसार राजा सुबह सरोवर पर स्नान करने आये . राजा ने अपने सिपाहियों को अपने वस्त्र आभूषण देखने को कहा और सरोवर में स्नान करने उतर गए . कौआ राजा के सैनिकों से नजर बचाकर उनका हार चोंच में लेकर उड़ चला . रजा से सैनिक पैदल और घुड़सवार कौवे का पीछा करने लगे. कौआ बरगद के पेड़ के उस कोटर में जिसमे सांप रहता था उस हार को गिरा दिया. राजा के सैनिकों ने कौवे को कोटर में हार गिराते हुए देख लिया था. सैनिक शीघ्र कोटर के पास आ पहुंचे. सैनिकों ने कोटर में आकर देखा कि वहां एक विषैला सांप है. उन्होंने सांप को मार दिया और राजा का हार कोटर से निकाल कर लेते गए .

इसतरह कौवे की चतुराई से उसके अजेय दुश्मन सांप पर बरगद पर रहने वाले पक्षियों ने विजय प्राप्त की.


रविवार, 1 जनवरी 2017

आरुणि की गुरुभक्ति

पुराने ज़माने में छात्र गुरुकुल आश्रम में पढ़ा करते हैं। छात्र गुरुकुल आश्रम में रहकर गुरु की सेवा किया करते थे और अध्ययन भी किया करते थे। आश्रम में शिक्षा पूरी कर फिर छात्र अपने घर वापस जाते थे। छात्र गुरुभक्त हुआ करते थे। ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमे छात्रों की महान गुरुभक्ति को दिखाया गया है। ऐसा ही एक गुरुभक्त छात्र था आरुणि, आइये जानते हैं आरुणि की गुरुभक्ति को।


 आरुणि महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम  में रहता था। आश्रम में रहकर वह शिक्षा  ग्रहण कर रहा था और गुरु की सेवा भी कर रहा था। आश्रम में छात्रों को कई जिम्मेवारी  होती थी। छात्र आश्रम में कृषि कार्य  और पशुओं  के लिए चारा का भी व्यवस्था किया करते थे। बरसात का मौसम था और इस मौसम में धान की खेती होनी थी। धान की खेती के लिए खेत में पानी जमा होना जरुरी था। लोग  खेती के लिए बड़ी बेसब्री से बारिस का इन्तजार किया करते थे। एक दिन शाम को तेज बारिस होने लगी सभी  खुश थे कि धान की खेती के लिए प्रचुर मात्रा में पानी उपलब्ध  जायेगा।  लेकिन गुरु आयोदधौम्य चिंतित हुए की उनके एक खेत के  कमजोर होने से सुबह तक उसमे खेती के लिए पानी नहीं टिकेगा।

उन्होंने अपने भरोसेमंद छात्र आरुणि को बुलाया  और कहा --> बेटा आरुणि खेत पर जाओ और कोई ऐसा यत्न करों कि सुबह तक  खेत में पानी  टिका रहे। गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर  आरुणि खेत पर चल पड़ा। वहां  जाकर आरुणि ने देखा, खेत के कमजोर मेड़ों से पानी बह रहा है। उसने चारों मेड़ों को मरम्मत करने का प्रयास किया। तीन तरफ के मेड़ों का  पानी तो रु क गया लेकिन चौथे मेड से पानी नहीं  रुक रहा था। आरुणि पानी  रोकने का  बहुत प्रयास किया , अंत में जब पानी  नहीं रुका तो आरुणि ने मेड पर लेट जाने का निर्णय किया। मेड पर रुक जाने से  रुक गया लेकिन  सुबह तक पानी  रोके रखने के लिए आरुणि को रात भर मेड पर  लेटे रहना जरुरी था।

इधर गुरु जी  आरुणि का इन्तजार कर रहे थे। काफी  देर हो  गयी आरुणि वापस नहीं लौटा  तो गुरु जी को चिंता हुई। गुरूजी कुछ शिष्यों के साथ खेत की ओर चल पड़े। गुरु जी वहां पहुँच कर देखते हैं कि आरुणि खेत की मेड पर लेटा है। गुरु जी ने आरुणि को उठने को कहा तथा छात्रों की मदद से उस मेड की मरम्मति करवाई।
गुरु जी आरुणि की गरु भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए तथा उसे तेजस्वी और दीर्घायु होने का बरदान दिया

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