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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

श्रद्धालु और ईर्ष्यालु की कहानी

ईर्ष्यालु व्यक्ति की कहानी।  
"श्रद्धालु" और "ईर्ष्यालु" नाम के दो पडोसी थे। दोनों में आपस में काफी घनिष्ठता थी। दोनों ने मिलकर तपस्या करने का विचार किया। दोनों तपस्या पर चले गए और भगवान शिव की आराधना करने लगे।  बहुत दिन तक तपस्या में लगे रहे। भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए।  भगवान शिव ने उन दोनों से वर मांगने को कहा ।

श्रद्धालु ने भगवान् शिव से वरदान माँगा -->
भगवन मैं जब भी आपकी पूजा  अर्चना करके आपसे कोई वरदान मांगू तो आप मुझपर प्रसन्न होकर वरदान को सफल बनाये। 
भगवान शिव ने कहा तथास्तु !

अब "ईर्ष्यालु" की बारी थी -->

"ईर्ष्यालु" ने भगवान शिव  से वरदान माँगा। भगवान आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जो कुछ वरदान में "श्रद्धालु" को मिले उससे दोगुना मुझे मिल जाए।  

भगवान आशुतोष ने एवमस्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए।



"श्रद्धालु" भगवान शिव की नित्य पूजा पाठ करता और अपने जरुरत के अनुसार शिव से वरदान माँग लेता। 

"श्रद्धालु" ने एक दिन पूजा करके भगवान शिव से अपने लिए एक सुन्दर सा घर माँगा। भोले नाथ के वरदान के अनुसार "श्रद्धालु" को  १ सुन्दर सा घर मिल गया साथ ही पडोसी "ईर्ष्यालु" को भी २ घर मिल गए। "श्रद्धालु" इस घर में सुख पूर्वक रहने लगा।  

कुछ दिन बाद "श्रद्धालु" ने अपने घर के पास एक मीठे जल के कुएं की याचना किये। शीघ्र ही शिवभक्त के घर के आगे एक कुआँ तैयार हो गया। वरदान की शर्त के अनुसार "ईर्ष्यालु" को भी २  कुआँ मिल गया। 

इसतरह भक्त "श्रद्धालु" जो कुछ भी मांगता "ईर्ष्यालु" को उससे  दोगुना मिल जाता। 

"श्रद्धालु" को इस बात से कोई परेशानी नहीं थी। "ईर्ष्यालु" को "श्रद्धालु" से सबकुछ दोगुना मिलने के बाद भी सुख देखा नहीं जा रहा था। "ईर्ष्यालु" अपने पडोसी "श्रद्धालु" के प्रति ईर्ष्या और कुटिलता दर्शाने लगा। "ईर्ष्यालु" के इस व्यवहार से "श्रद्धालु" को बहुत दुख होता। 

"श्रद्धालु" दिखने में भोला प्रतीत होता था लेकिन था बुद्धिमान।  उसने "ईर्ष्यालु" को सबक सिखाने की ठानी। 

शिव की पूजा अर्चना करके "श्रद्धालु" ने भगवान शिव से वरदान माँगा की भगवान मेरे एक आँख ले लो। 
भगवान शिव को अपने भक्त की इस याचना पर आश्चर्य तो जरूर हुआ।  लेकिन वरदान की शर्त के अनुसार "श्रद्धालु" की एक आँख की रोशनी चली गयी। साथ साथ पडोसी "ईर्ष्यालु" भी सुबह सुबह दोनों आंखों से अँधा हो गया। 

"ईर्ष्यालु" को अपने किये की सजा मिल गयी थी वो नेत्र विहीन हो गया था।
"ईर्ष्यालु" ने अपने बेटे को "श्रद्धालु" के घर झाँकने को कहा और उसकी स्थिति के बारे में पूछा। बेटे ने कहा -->पिता जी !  "श्रद्धालु " चाचा तो एक आँख से काने हो गए हैं।

"ईर्ष्यालु" को अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था। कही "श्रद्धालु" ऐसे ही एक दो और वरदान न मांग बैठे इसकी चिंता सता रही थी। इसलिए अपने बेटे की अंगुली पकड़ कर पडोसी के घर पहुँच गया तथा क्षमा याचना की और किये हुए कुकृत्यों का प्रायश्चित किया। 

इस प्रायश्चित से उसके सारे पाप धूल गए। "ईर्ष्यालु" के दोनों नेत्र तो वापस नहीं मिल पाए लेकिन ईर्ष्या की अग्नि जो उसे जला रही थी वो हरदम के लिए शांत हो चुकी थी। वो पहले से ज्यादा सुखी अनुभव कर रहा था।   

Moral -> ईर्ष्या से सुख नहीं मिलने वाला चाहे आपके पास जितनी सम्पति मिल जाए। 
   

  

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

लंगर की कहानी Reliance जियो के सन्दर्भ में


एक व्यक्ति नित्य लंगर चलाता था

लंगर मे खाने वालों की संख्या नित्य प्रतिदिन बढ़ती गयी ।

फ़िर एक दिन उस व्यक्ति ने लंगर के टेबल पर एक तरफ़ दान पेटी रख दी ।

दान पेटी पर लिखा था आप धर्मार्थ स्वैच्छिक दान दे सकते हैं ।

अब प्रसाद पाने के बहाने खाने आने वाले की संख्या दिन प्रति दिन घटने लगी ।

लंगर के आयोजक व्यक्ति समाज शास्त्री भी थे ।

भीड़ के इस व्यवहार से उन्हे अपने विषय पर शोध करने का अवसर भी मिल रहा था। कूछ दिन तक यूँ ही चलता रहा। फिर एक दिन अप शोध के क्रम में लंगर आयोजित करने वाले व्यक्ति ने दान पेटी को बदल दिया । अब दान पेटी पर लिखा था ।

धर्मार्थ न्यूनतम 1 रुपये दान पेटी मे डालें ।

लोग अब भी आते और jio की कस्टमर की तरह मुफ्त का खा कर चले जाते। लोग खाने के बाद सोचने पर मजबूर हो जाते कि दान पेटी मे पैसे डालूं या न डालूं । धीरे धीरे लोग दान पेटी मे 1 रुपये डालने लगे ।

वो लोग जिनको दान पेटी में 1 रुपये डालने में हिचकिचाह महसूस हो रही थी धीरे धीरे लंगर में आना छोड़ दिए .

यह कहानी jio के कुछ उपभोक्ताओं पर भी सार्थक सिद्ध होती दिखती है .

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सेठ का अपने बच्चे को सीख


कपडे का एक व्यापारी था।  वह बहुत मन लगाकर अपना व्यवसाय करता था।  अपने दिनचर्या का पालन करता था और नित्य सुबह दूकान पर पहुँच जाता था।  दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी   . सेठ अपने कपड़ों पर उचित लाभ रखकर विक्रय करता था। इससे उसके विश्वसनीय ग्राहकों की संख्या बढ़ते जा रही थी। सेठ के ईमानदारी का व्यवसाय खूब चला जिससे उसने काफी पैसे कमाए।


समय के साथ साथ सेठ भी बूढ़ा  हो गया।  उसके पास अपार धन सम्पदा थी किसी बात की कमी नहीं थी।  बस एक कमी थी कि उसका बेटा व्यावसायिक बुद्धि का नहीं था। सेठ बार बार अपने बेटे को व्यावसायिक शिक्षा देता था। अंत में मरते समय सेठ ने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और जीवन के अनुभवों को सारांश में अपने बेटे के सम्मुख कुछ पंक्तियों में ये बात कहा।


"साया साया आना बेटा साया साया जाना। मीठा खाना देना तो लेना मत।। "

उपरोक्त का मतलब अपने बुद्धि के अनुसार समझकर सेठ के लड़के ने घर से लेकर दूकान तक छाजन करा दिया। जिससे उसके सिर के ऊपर आते जाते समय धुप न लग सके।==> इस कार्य में उसके पिता द्वारा संचित बहुत से धन व्यर्थ ही खर्च हो गए।
"मीठा खाना" का अर्थ वणिक पुत्र ने कुछ इस प्रकार समझा --खाने में मीठा का सेवन करना है। अतः वह "गुड़" खाने लगा। ==> अधिक गुड़ के सेवन से उसका स्वास्थ्य विगड़ने लगा।
"देना तो लेना मत" - का अनुपालन कर सेठ के लड़के ने जिस जिस व्यक्ति को उधार में कपडे दिए उससे पैसे नहीं मांगे। ==> ज्यादा उधार होने के कारण उसके व्यवसाय की व्यवस्था विगड़ गयी।

वणिक पुत्र अपने पिता के सीख का गलत अर्थ निकालकर बहुत दुखी हुआ। एक दिन सेठ की दूकान पर  एक महात्मा जी आये। सेठ ने महात्मा जी से अपनी सारी व्यथा सुनाई। पिता के मरते समय दिए हुए सीख को भी महात्मा जी के समक्ष रखा तथा उन सीख का अपने मति के अनुसार किये गए अनुपालनो को भी बताया।

महात्मा जी बात को समझते देर न लगी उन्होंने सेठ द्वारा मरते समय दिए गए सीख का सही अर्थ लगा दिया।

"साया साया आना बेटा साया साया जाना"  से तात्पर्य है सुबह सुबह दूकान पर पहुँच जाना  और शाम को सूर्यास्त के बाद दूकान से घर आना। इसप्रकार वणिक पुत्र दूकान पर ज्यादा समय दे सकता है।

"मीठा खाना" का  आशय था खान पान मधुर रखना जिससे स्वास्थय सही रहे और वो नित्य प्रति दूकान पर जा सके।

"देना  तो लेना मत " से तात्पर्य है उधार का व्यवसाय नहीं करना। अर्थात उधार सामान देकर फिर  पैसे  मांगने के लिए बार बार क्रेता के घर नहीं जाना।

इसप्रकार माहत्मा द्वारा बताये गए सही अर्थो को समझ कर उनका अनुसरण करने से से सेठ के बेटे  का दुःख दूर हो गया।
   

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