बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सेठ का अपने बच्चे को सीख


कपडे का एक व्यापारी था।  वह बहुत मन लगाकर अपना व्यवसाय करता था।  अपने दिनचर्या का पालन करता था और नित्य सुबह दूकान पर पहुँच जाता था।  दूकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती थी   . सेठ अपने कपड़ों पर उचित लाभ रखकर विक्रय करता था। इससे उसके विश्वसनीय ग्राहकों की संख्या बढ़ते जा रही थी। सेठ के ईमानदारी का व्यवसाय खूब चला जिससे उसने काफी पैसे कमाए।


समय के साथ साथ सेठ भी बूढ़ा  हो गया।  उसके पास अपार धन सम्पदा थी किसी बात की कमी नहीं थी।  बस एक कमी थी कि उसका बेटा व्यावसायिक बुद्धि का नहीं था। सेठ बार बार अपने बेटे को व्यावसायिक शिक्षा देता था। अंत में मरते समय सेठ ने अपने बेटे को अपने पास बुलाया और जीवन के अनुभवों को सारांश में अपने बेटे के सम्मुख कुछ पंक्तियों में ये बात कहा।


"साया साया आना बेटा साया साया जाना। मीठा खाना देना तो लेना मत।। "

उपरोक्त का मतलब अपने बुद्धि के अनुसार समझकर सेठ के लड़के ने घर से लेकर दूकान तक छाजन करा दिया। जिससे उसके सिर के ऊपर आते जाते समय धुप न लग सके।==> इस कार्य में उसके पिता द्वारा संचित बहुत से धन व्यर्थ ही खर्च हो गए।
"मीठा खाना" का अर्थ वणिक पुत्र ने कुछ इस प्रकार समझा --खाने में मीठा का सेवन करना है। अतः वह "गुड़" खाने लगा। ==> अधिक गुड़ के सेवन से उसका स्वास्थ्य विगड़ने लगा।
"देना तो लेना मत" - का अनुपालन कर सेठ के लड़के ने जिस जिस व्यक्ति को उधार में कपडे दिए उससे पैसे नहीं मांगे। ==> ज्यादा उधार होने के कारण उसके व्यवसाय की व्यवस्था विगड़ गयी।

वणिक पुत्र अपने पिता के सीख का गलत अर्थ निकालकर बहुत दुखी हुआ। एक दिन सेठ की दूकान पर  एक महात्मा जी आये। सेठ ने महात्मा जी से अपनी सारी व्यथा सुनाई। पिता के मरते समय दिए हुए सीख को भी महात्मा जी के समक्ष रखा तथा उन सीख का अपने मति के अनुसार किये गए अनुपालनो को भी बताया।

महात्मा जी बात को समझते देर न लगी उन्होंने सेठ द्वारा मरते समय दिए गए सीख का सही अर्थ लगा दिया।

"साया साया आना बेटा साया साया जाना"  से तात्पर्य है सुबह सुबह दूकान पर पहुँच जाना  और शाम को सूर्यास्त के बाद दूकान से घर आना। इसप्रकार वणिक पुत्र दूकान पर ज्यादा समय दे सकता है।

"मीठा खाना" का  आशय था खान पान मधुर रखना जिससे स्वास्थय सही रहे और वो नित्य प्रति दूकान पर जा सके।

"देना  तो लेना मत " से तात्पर्य है उधार का व्यवसाय नहीं करना। अर्थात उधार सामान देकर फिर  पैसे  मांगने के लिए बार बार क्रेता के घर नहीं जाना।

इसप्रकार माहत्मा द्वारा बताये गए सही अर्थो को समझ कर उनका अनुसरण करने से से सेठ के बेटे  का दुःख दूर हो गया।
   
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