भिखारी के कल्पना की कहानी

एक भिखारी था भिक्षाटन से जो कुछ भी धन मिलता उसे वो संचित करता और उस संचित धन से अपने भविष्य सुधारने की योयना बनाते रहता. पुराने ज़माने में भिक्षाटन करने वालों को भीख में आनाज ही मिला करता था. चावल और आटा जैसे अन्न जो क्षुधा निवारण के लिए सबसे उपयुक्त और सुलभ थे लोग भिक्षादान में अधिकांशत: उपयोग किया करते थे .

भिखारी दिन भर घूमता और लोगों से भीख में जो धन आदि मिलता उसे लाकर अपने कुटिया में खूंटी के ऊपर लटका देता. खूंटी पर लटकी अनाज की मटकी एक तो अन्न को चूहों से सुरक्षित रखती और दूसरी उस याचक के स्वप्नील कल्पना को बल भी प्रदान करती . इसी तरह उसने अपने कटिया में अनाजों की परिधि बना लिए. अबतो उसकी कुटिया में चारो तरफ मटकियाँ ही मटकियाँ लटकी थीं .

एक दिन भिखारी अपने कुतिया में लटके हुए मटकियों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ .अपने मन में वह अपने सुन्दर भविष्य के बारे में सोचने लगा. मेरे पास इतने अन्न हो गए हैं अब मैं इन्हें बेचकर बहुत सारी मुद्राएँ अर्जित कर सकता हूँ . इन मुद्राओं से में सुख और वैभव के बहुत से साधन खरीदूंगा . इसतरह मुझे कोई धनी व्यक्ति मुझे अपनी कन्या दे देगा . उस स्त्री के साथ मैं सुख पूर्वक रहूँगा. मुझे तरह तरह के छपन भोग खाने को मिलेंगे. अबतक मैं प्याऊ या अन्य धर्म स्थलों पर लोगों से पानी मांगकर पीते रहा हूँ. अब तो मेरी संताने होंगी मैं अपने बेटे से पानी मांग कर पिऊंगा . बेटा यदि पानी देने से मन करता है तो इसी लाठी से ऐसे ही घुमाकर एक लाठी मारूंगा.

भिक्षुक अपनी कल्पना में इतना खो गया था की अपने पास राखी लाठी को सच में कुटिया में घुमा मारा . इसतरह कुटिया में टंगी मटकियों के सारे अनाज आटा आदि बाहर बिखर गए..


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