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सोमवार, 28 अगस्त 2017

धर्म की आड़ में ढोंगी, कलयुगी बाबा राम रहीम - kalyugi baaba raam rahim

हमारा भारत वर्ष सदियों से ऋषि मुनियों का देश रहा है. मोह और संशय का शमन करने के लिए लोग संतों के शरण में जाते रहे हैं .लेकिन कुछ पाखंडियों ने संत शब्द के मर्यादा का लाघव किया है .

यथार्त तो ये है कि संत मोह और संशय का शमन करने वाले नाश करने वाले होते हैं . लेकिन आजकल के ढोंगी संत संशय हरने वाले नहीं  लोगों को संशय में डालने वाले हैं . जो इन गुरुओं और बाबाओं के सरण में गया वो इनकी माया जाल में फँस कर रहा जाता है .

कलियुग के संतों में बारे में महाकवि तुलसीदास ने बताया है ->

नारी मरी गृह सम्पति नाशी | माथ मुडाई भये संस्यासी ||

कलियुग के संत स्वार्थ वश संत बनते हैं और लोगों के बीच ऐसा पाखण्ड करते हैं जैसे इनके अनुयाई को लगता है यही भगवान है जैसे हाल ही के बाबा  डेरा सच्चा सौदा प्रमुख पाखंडी "राम रहीम ".

तुलसीदास सूरदास जैसे महान संतों ने कभी अपने अनुयायियों से अपनी पूजा नहीं करवाई . उन्होंने अपने अनुयायियों को यही बताया की ईश्वर ही वन्दनीय है गुरु पथ प्रदर्शक है . तभी तो अरबों लोगों के जिह्वाग्र पर रहने वाले तुलसी दास एक संत हैं भगवान नहीं . सूरदास भी संत हैं भगवान नहीं .

अब इन कलियुग के भगवानों की सूचि पर ध्यान दीजिये 
१) बाबा रामपाल  
२) साईं बाबा 
३) राम रहीम 
४) सत्य साईं 
५) प्रेम साईं 
६ आसाराम 

सूचि तो काफी लम्बी है लेकिन उदाहरनार्थ इतने ही काफी है .

जैसे एक blanket begger साईं भगवान के रूप में लोगों में लोकप्रिय हुआ . वैसे ही बाबा राम रहीम अपने अनुयायिओं में लोकप्रियता पाने लगा था .

इन बाबा लोगों को प्रश्रय देता कौन है ?

सनातन विरोधी ब्राह्मण विरोधी जितने भी संस्कार हीन लोगों की भीड़ है वही इन बाबा लोगों के अंध भक्त बनते है .
गुरु बनाने की जो पुरानी परंपरा थी अगर हम उसका अनुसरण करते रहते तो आज हमारा समाज इतना पथ भ्रष्ट नहीं होता 

गृहस्थ का गुरु गृहस्थ और सन्यासी का गुरु सन्यासी होता है .

अब यदि गृहस्थो की भीड़ सन्यासियों के पास दीक्षा लेने पहुँच जायेगी तो अनर्थ होगा ही . सन्यासी की जीवन शैली अलग है गृहस्थ की जीवन शैली अलग है. दोनों के कर्त्तव्य पथ अलग हैं.   

गृहस्थ के कुल गुरु हुआ करते थे . जिससे गुरु की परपरा चलती थी . सभी लोगो इस परंपरा को तोड़ने में लगे हैं . एक घर में कई गुरु आ रहे है पत्नी के गुरु अलग पति के गुरु अलग और लड़का कोई गुरु अलग से लाता है .

ब्राह्मण पथ प्रदर्शक थे लेकिन आज कोई ब्राह्मणों की नहीं सुनेगा 

रविवार, 27 अगस्त 2017

राजा नहुष, स्वर्ग की प्रभुता, मद - इन्द्राणी से विवाह प्रस्ताव

वृत्रासुर का वध करने से इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा था . इस पाप से बचने के लिए इंद्र तपस्या करने जाने वाले थे . अब इन्द्रासन तो खाली रखा नहीं जा सकता अतः ऐसे योग्य राजा की खोज होने लगी जो इंद्र की अनुपस्थिति में कुछ दिन स्वर्ग की व्यवस्था देख सके.
धरती लोक पर नहुष उस समय बहुत प्रतापी राजा थे . नहुष के सामने सभी देवों ने स्वर्ग का कार्यभार सँभालने का प्रस्ताव रखा. नहुष ने इंद्र को यह कह कर माना कर दिया कि स्वर्ग के प्रभुता जनित मद से बचना मुश्किल है . पुनः देवतावों के बहुत विनती करने पर देवहित में रजा नहुष ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

पुरंदर नामक इंद्र राजा नहुष को स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर तपस्या को चले गए. नहुष राज काज देखने लगे . इन्द्र के सिंहासन के बगल में इन्द्राणी का सिंहासन भी था . इंद्र की अनुपस्थिति में इन्द्राणी का आसन खाली था . अस्थायी इंद्र बने नहुष ने मंत्रियों से इन्द्राणी को इंद्र की सिंहासन पर बैठने के लिए कहा . इसपर मंत्रियो ने कहा ये तभी संभव है जब आप इन्द्राणी ("शची") से विवाह कर लें और वो आपकी अर्धांगनी बने . नहुष ने शची के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा . इन्द्राणी इस प्रस्ताव से बहुत चिंतित हुई और वह इस सन्दर्भ में देवगुरु बृहस्पति  से परामर्श लेने पहुँच गयी .
गुरु बृहस्पति को समझते देर न लगी कि, नहुष के अन्दर  प्रभुता जनित अहंकार उत्पन्न हो गया है . इस अहंकार के निवारण से ज्यादा जरुरी था सती शची के सतीत्व के लिए यत्न करना .

देवगुरु ने इन्द्राणी को परामर्श दिया :-> अस्थायी इंद्र  नहुष से बोलो को वो अगर सप्तऋषियों से जुती हुई पालकी में आये तो मैं उनका वरण कर लुंगी . शची के तरफ से ऐसा सन्देश सुनकर नहुष ने शीघ्र ही सप्त ऋषियों को आपने सभा में बुलवा लिया तथा आदेश दिया की आपलोग मेरे पालकी को वहन कर इन्द्राणी तक ले चलें . राजा नहुष उस समय इंद्र थे और इंद्र राजा का बात नहीं मानना राज द्रोह होता सो ऋषियों ने इसे राजा का आदेश समझ स्वीकार कर लिया .

ऋषि कन्धों पर पालकी रखी गयी और नहुष इन्द्राणी की महल की ओर चल पड़े . इन्द्राणी के पास एक निश्चित समय तक पहुंचना था तभी नहुष का अभीष्ट सिद्ध हो पाता . लेकिन ऋषियों को शारीरिक श्रम करने की आदत नहीं थी अतः वो बार बार थक कर पालकी कंधे से उतारकर नीचे रख दे रहे थे .

नृप नहुष ऋषियों को बार बार बोलते "सर्प सर्प" ( 'तेज चलो तेज चलो ' ) . 

राजा के इस व्यवहार से ऋषि कुपित हो गए और उन्होंने राजा को शाप दिया . सर्प सर्प बोलता है जावो सर्प हो जाओ .  ऋषियों के शापवश नहुष विकराल अजगर बनकर धरती पर आ गिरे. महाभारत काल में इनका युधिष्ठिर के साथ प्रश्नोत्तर संवाद हुआ और इनका उद्धार हुआ .  

शिक्षा:-> अतः हमें धन सम्पदा और प्रभुता जनित मद ("अहंकार ") से बचना चाहिए .



सोमवार, 7 अगस्त 2017

सावन महीने के प्रसिद्धि की कहानी - Importance of the month of sawan

वसंत अगर ऋतुओं का राजा है तो वर्षा को ऋतुओं की रानी कहा गया है. और इस बरसात में भी सावन का महीना विशेष मनभावन होता है. सावन के महीने को कई बातों से महत्वपूर्ण माना जाता है . सावन के महीने की प्रसिद्धि की कहानी कुछ इसप्रकार है :->

पौराणिक संदर्भ
एक बार सनत कुमारों ने भगवन शिव से सावन के महीने की प्रसिद्धि का कारण पूछा. भगवन शिव ने संताकुमारों से दक्ष प्रजापति सुता सती की कहानी सुनाई. भगवन शिव ने कहा -> दक्ष यज्ञ में मेरा अपमान न सहन कर सकने के कारण सती ने योगाग्नि से शरीर जला लिया था. सती को प्रत्येक जन्म में मेरा ही सानिद्ध्य पाने का वरदान है . अतः सती ने अगले जन्म में पर्वत राज हिमालय के यहाँ पार्वती के रूप में जन्म लेकर कठोर तप किया और मुझे पुनः पति के रूप में प्राप्त किया . इससे इस महीने का विशेष महत्व है .
ऐसा भी कहा जाता है की समुद्र मंथन के बाद कालकूट विष भी इसी महीने में निकला था . भगवान शिव ने जन कल्याण के लिए इसी महीने में उस हलाहल का पान किया था .
मृकंदु ऋषि के पुत्र मार्कंडेय जी को आल्पयु योग था . भगवान शिव की कठोर तपस्या से उन्हें अमरत्व प्राप्त हुआ . मार्कंडेय जी जे सावन के पवित्र महीने में ही भगवन शिव की आराधना की थी .
सावन के महीने में सबसे ज्यादा वृष्टि होती है . जिससे भगवान भोले नाथ जिनका विष धारण करने से शरीर उष्ण बना रहता है सावन के फुहारों से ठंढक की अनुभूति होती है .
सावन के महीने से चातुर्मास व्रत का आरम्भ होता है . चातुर्मास व्रत भगवान विष्णु के अराधना को समर्पित है. इसी महीने में भाई बहन के प्यार का प्रतीक रक्षा बंधन का पवित्र त्यौहार आता है . योगी यति साधक इस पवित्र मास से अपने सुविधा अनुसार व्रत नियम का पालन करते हैं .    

ज्योतिषीय सन्दर्भ

पूर्णिमा तिथि को जो नक्षत्र होता है वही उस महीने का नाम होता है . सावन महींने के पूर्णिमा को श्रावणा नक्षत्र होता है इसीलिए इस महीने का नाम श्रावण पड़ा है . 

वरदराज की कहानी - story of varadraj

प्राचीन काल में छात्र गुरुकुल में ही रह कर पढ़ा करते थे . अब की तरह कान्वेंट school का चलन नहीं था . छात्र यज्ञोपवित संस्कार के बाद शिक्षा ग्रहण के लिए गुरुकुल में चले जाते थे . गुरुकुल में गुरु के समीप रह कर आश्रम की देख भाल किया करते थे और अध्ययन भी किया करते थे .

वरदराज एक ऐसा ही छात्र था . यज्ञोपवित संस्कार होने के बाद उसको भी गुरुकुल में भेज दिया गया . वरदराज आश्रम में जाकर अपने सहपाठियों के साथ घुलने मिलने लगा . आश्रम के छात्रों और सहपाठियों से उसके मित्रवत सम्बन्ध थे . वरदराज व्यावहारिक तो बहुत था लेकिन था जड़ मति का . जहा गुरु जी द्वारा दी गयी शिक्षा  को दुसरे छात्र आसानी से समझ जाते वहीँ वरदराज को काफी मेहनत करना पड़ता और वो समझ नहीं पाता .
गुरु जी वरदराज को आगे की पंक्ति में बैठाकर  विशेष ध्यान देने लगे . लेकिन फिर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता दिख रहा था . गुरूजी को वरदराज के अशिक्षा से बहुत दुःख होता गुरूजी उसके लिए विशेष प्रयत्न करते जाते . वरदराज के वर्ग के सारे साथी उच्च वर्ग में चले गए लेकिन वरदराज उसी वर्ग में पड़ा रहा . वरदराज के प्रति अपने सारे प्रयासों से थक कर गुरु जी उसे जड़मति मानकर एक दिन आश्रम से निकाल दिए .

अपने साथियों से अलग होता हुआ वरदराज भारी मन से गुरुकुल आश्रम से विदा होंने लगा . दुःख तो बहुत हो रहा था उसे इस वियोग का लेकिन वो कुछ कर नहीं सकता था .

अवसाद से उसके मुख सूखे जा रहे थे . वह पानी की तलाश में कोई जलाशय ढूढने लगा . मार्ग में कुछ दूर चलने पर उसे एक कुआं दिखाई दिया . कुवें के जगत पर चिंतामग्न जा कर बैठ गया .

वहां वह देखता है की कुए से एक चरखी लगी है जिसकें  सहारे एक मिटटी का पात्र बंधा है . कुए के जगत पर एक शिला पड़ी है जिसपर मिट्टी के बर्तन का गहरा निशान पड़ा है .
वरदराज के दिमाग में यह बात कौंध गयी . वह सोचने लगा . कैसे मिटटी का एक कमजोर पात्र(" क्षण क्षण जिसके टूटने का डर बना रहता है वह") एक कठोर पत्थर पर इतना बड़ा दाग बना दिया है ?
अवश्य ही मटके का यह निरंतर प्रयास है जिसके कारण यह संभव हुआ है .

जब के मिटटी का पात्र  बार बार के प्रयास से ऐसा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं . वह वापस आश्रम की वोर लौट गया . कहा जाता है वरदराज को आश्रम से उस कुए तक आने में जो समय लगा था उससे आधे समय में वह आश्रम वापस आ गया और गुरु जी के चरणों में लिपट गया .

गुरु जी ने उसे वापस आने का कारन पूछा तो वरदराज ने कुए के समीप में अपनी सारी आपबीती सुना दी . गुरु जी को वरदराज के मुख अब नया आत्मविश्वास दिखाई दे रहा था . उन्होंने उसे फिर से पढ़ाना शुरू किया .

अब वरदराज बदल चूका था . निरंतर अभ्यास से उसने जटिल से जटिल सूत्रों को समझ लिया . वह अपने साथियों को पाणिनि के व्याकरण सूत्रों को भाष्य कर समझाने लगा . आगे चलकर यही वरदराज लघुसिद्धांत 
कौमुदी नामक किताब लिखा .

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